यूपी चुनाव में कितने प्रभावशाली हैं आजम खान?सरकार के सामने बेबस हुए सपा नेता!

 यूपी चुनाव में कितने प्रभावशाली हैं आजम खान?सरकार के सामने बेबस हुए सपा नेता!
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समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान का ड्रीम प्रोजेक्ट कहलाने वाला जौहर यूनिवर्सिटी अब संकट में है. रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) ने मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को बिना स्वीकृत नक्शे के बना हुआ बताते हुए धवस्त करने का आदेश दे दिया है. RDA के मुताबिक जौहर यूनिवर्सिटी की सिर्फ दो ही इमारतें, अकादमिक भवन और मेडिकल भवन का ही नक्शा वैध है.जौहर यूनिवर्सिटी की नींव साल 2006 में रखी गई थी. इसे मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट ने स्थापित किया है. धीरे-धीरे यहां मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग, शिक्षा, कृषि, लाइब्रेरी, हॉस्टल और अन्य एकेडमिक बिल्डिंग्स तैयार किए गए. इस यूनिवर्सिटी नींव बाद से ही इसपर जमीन आवंटन, लीज, वक्फ संपत्ति और निर्माण अनुमति को लेकर विवादों में घिरा रहा है. साल 2017 में बीजेपी की सरकार आने के बाद इसको लेकर कार्रवाई तेज हो गई. इलाहाबाद हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में भी इससे जुड़े कई मामले पहुंचे.आजम खान ने लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान तत्कालीन जिलाधिकारी (DM) और अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए ‘तनखैया’ शब्द का इस्तेमाल किया था और कहा था कि चुनाव बाद वे इन अधिकारियों से अपने जूते साफ करवाएंगे.

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इस बयान को भड़काऊ भाषण और आचार संहिता का उल्लंघन माना गया था.साल 2022 के समाजवादी पार्टी (SP) के वरिष्ठ नेता आजम खान पहली बार जेल से चुनाव लड़ने को लेकर चर्चा में रहे. इस चुनाव में जीत हासिल कर वह रामपुर से 10वीं बार विधायक निर्वाचित हुए थे.आजम खान की पसंद के चलते समाजवादी पार्टी ने मुरादाबाद से अपने मौजूदा सांसद एस.टी. हसनका टिकट काटकर रुची वीरा को उम्मीदवार बना दिया था. इस बदलाव से पार्टी के अंदर काफी खींचतान देखने को मिली थी. इसके अलावा विधानसभा चुनाव से 5 से 6 महीने पहले ही उन्हें अब्दुल्ला आजम के फर्जी जन्म प्रमाण पत्र के मामले में सजा भी सुनाई गई थी.जौहर यूनिवर्सिटी पर कार्रवाई और अवैध निर्माण का मुद्दा फिर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया. फिलहाल, आजम खान जेल में है. लेकिन उनपर और उनके ड्रीम प्रोजेक्ट कहलाने वाले जौहर यूनिवर्सिटी को ध्वस्त करने को लेकर यूपी में राजनीति शुरू हो गई है.आजम खान ने 70 के दशक के अंतिम साल तक राजनीति में एंट्री ले ली थी. वह पहली बार 1980 में जनता पार्टी (सेक्युलर) के टिकट पर विधायक बने थे. साल 1993 में वह में समाजवादी पार्टी से जुड़े और मुलायम सिंह यादव सरकार में मंत्री बने. उत्तर प्रदेश सरकार में कई बार नगर विकास, संसदीय कार्य और अल्पसंख्यक कल्याण जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले. वह तकरीबन 10 बार रामपुर से विधायक रहे. दो बार रामपुर से सांसद रहे.वह 1980, 1985, 1989, 1991, 1993, 1996, 2002, 2007, 2017, 2022 के विधानसभा चुनाव में रामपुर से जीत हासिल कर विधायक बनें. हालांकि, उनकी 10वीं बार की विधायकी की सदस्यता जेल जाने के बाद समाप्त हो गई.आज़म खान 2 बार रामपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए. वह 2014 में 16वीं लोकसभा और 2019 में 17वीं लोकसभा के लिए रामपुर से सांसद निर्वाचित हुए थे.आजम खान इस वक्त दोहरे पैन कार्ड रखने के मामले में 10 साल की सजा रामपुर जेल में काट रहे हैं. वहीं, उनके बेटे अब्दुल्ला आजम भी इसी मामले में पिता के साथ कैद हैं. उन्हें 7 साल की सजा सुनाई गई है.2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान अधिकारियों के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने और उन्हें ‘तनखइया’ कहने के मामले में रामपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने उन्हें 2 साल की जेल की सजा और 5,000 रुपये का जुर्माना सुनाया है इसके अलावा रामपुर के डूंगरपुर में ‘आसरा आवास योजना’ बनाने के लिए गरीबों के घरों को तोड़े जाने और लूटपाट करने का आरोप में भी एमपी-एमएलए कोर्ट आजम खान को 10 साल की सजा सुनाई थी. हालांकि, सितंबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस सजा पर रोक लगाकर उन्हें जमानत दी थी. फिलहाल, अब आजम खान अपने सबसे बड़े और ड्रीम प्रोजेक्ट को लेकर चर्चा में हैं.आजम खान मुस्लिम राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में लंबे समय तक शामिल रहे. 2019 के बाद कई आपराधिक मामलों, जेल और कानूनी विवादों के कारण राजनीतिक प्रभाव में गिरावट आई. लेकिन अब भी वह पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है. आजम खान का सीधा प्रभाव रामपुर जिले की 5 विधानसभा सीटों रामपुर सदर, सुआर, चमरौआ, बिलासपुर और मिलक) पर है. इसके अलावा, पड़ोसी जिलों की करीब 10-12 अन्य सीटों जैसे मुरादाबाद, संभल और बरेली के मुस्लिम बहुल इलाकों में भी उनकी रैलियों और भाषणों का बड़ा असर पड़ता है.इसका साफ मतलब हुआ कि आजम खान अब भी अपने दम पर अकेले 17 से 18 सीटों के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं. इसके अलावा पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक पर आज भी उनकी पकड़ है. यही वजह है कि नए मुस्लिम चेहरों को लाने और पार्टी से आजम खान की दूरियों के चर्चाओं के बावजूद अखिलेश यादव ने उन्हें समाजवादी पार्टी को छोड़ने नहीं दिया. वह अब भी पूरे यूपी में किसी भी पार्टी के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरों में शुमार हैं. हालांकि, लंबे वक्त से जेल और कानूनी मामलों में उलझने से उनकी समाजवादी पार्टी में संगठनात्मक स्थिति कमजोर हुई हैं.जौहर यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर कार्रवाई के जरिए सरकार आम जनता के दिमाग में यह बात स्थापित करना चाहती है कि यह निर्माण अवैध है और कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है. यही वजह रामपुर विकास प्राधिकरण ने कार्रवाई को लेकर तर्क दिया था. मामला पूरी तरह अवैध निर्माण और भवन मानचित्र की स्वीकृति का है. कार्रवाई कानून और शहरी विकास नियमों के तहत की जा रही है.हालांकि, अगर जौहर यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर कार्रवाई होती है, तो इसका फायदा आजम खान और समाजवादी पार्टी उठाने की कोशिश कर सकते हैं. दरअसल, समाजवादी पार्टी यह जताने की कोशिश कर सकती है कि शिक्षा संस्थान को निशाना बनाया जा रहा है. आजम खान को जानबूझकर लगातार परेशान किया जा रहा है. अल्पसंख्यक संस्थान पर दबाव बनाया जा रहा है. अल्पसंख्यकों को दबाया जा रहा है.समाजवादी पार्टी इस रवैये के जरिए मुस्लिम मतों को एकजुट रखने की कोशिश जरूर करेगी. समाजवादी पार्टी इन वोटों का बिखराव बसपा समेत अन्य पार्टियों की तरफ नहीं होने देना चाहेगी, जिससे उसे चुनाव में नुकसान हो. ऐसे में मुस्लिम समुदाय में आजम खान अपने लिए सहानुभूति पैदा कर, इस वोट बैंक को सपा के पक्ष में ला सकते हैं.हालांकि, अगर जौहर यूनिवर्सिटी के मामले में आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू होता है, तो वोटों के ध्रुवीकरण की स्थिति बन सकती है. इसका लाभ बीजेपी उठा सकती है. वैसे भी पिछले हर चुनाव आजम खान यूपी की राजनीति में हॉट टॉपिक बने रहे हैं. फिर चाहे उसके पीछे की वजह उनके बयान हो या उनके खिलाफ की गई कार्रवाईयां हों. आजम खान हमेशा यूपी की सियासत में एक मुद्दा रहे हैं.

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