हेमंत कैबिनेट का होगा विस्तार,झारखंड में इन्हें मिल सकता है मंत्री पद!

 हेमंत कैबिनेट का होगा विस्तार,झारखंड में इन्हें मिल सकता है मंत्री पद!
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झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार में एक बार फिर कैबिनेट विस्तार की चर्चा तेज हो गई है. मंत्री और गिरिडीह विधायक सुदिव्य कुमार सोनू के असमय निधन के बाद हेमंत कैबिनेट में मंत्रियों की संख्या 10 से घटकर 9 रह गई है. इससे पहले अगस्त 2025 में घाटशिला से विधायक और तत्कालीन शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन के निधन के बाद भी कैबिनेट में एक पद खाली हुआ था. अब सुदिव्य कुमार सोनू के निधन से सरकार के सामने मंत्रिमंडल में रिक्त पद भरने की चुनौती खड़ी हो गई है.संवैधानिक प्रावधान के तहत झारखंड में मुख्यमंत्री समेत अधिकतम 12 सदस्यीय मंत्रिपरिषद हो सकती है. सीएम के अलावा अधिकतम 11 मंत्री बनाए जा सकते हैं. मौजूदा स्थिति में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अलावा 9 मंत्री हैं, ऐसे में सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद एक और मंत्री को शामिल करने की गुंजाइश बरकरार है.अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस रिक्त पद को कैसे भरेंगे? क्या दिवंगत सुदिव्य कुमार सोनू के परिवार को राजनीतिक जिम्मेदारी देकर मधुपुर और डुमरी का पुराना फॉर्मूला दोहराया जाएगा या पार्टी किसी नए चेहरे पर दांव लगाएगी?

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सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद सबसे ज्यादा चर्चा उनकी पत्नी श्वेता शर्मा को लेकर हो रही है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सुदिव्य और सोरेन परिवार के बीच बेहद करीबी राजनीतिक संबंध रहे हैं. ऐसे में परिवार के किसी सदस्य को राजनीतिक जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.वरिष्ठ पत्रकार चंदन मिश्र के मुताबिक, सुदिव्य कुमार सोनू के साथ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बेहद अच्छे संबंध थे. इसके अलावा गिरिडीह सीट झामुमो के लिए खास है. इसी गिरिडीह जिले की गांडेय विधानसभा सीट से कल्पना सोरेन विधायक हैं.हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद जब गांडेय विधानसभा उपचुनाव में कल्पना सोरेन मैदान में उतरी थीं, उस समय सुदिव्य कुमार सोनू ने उनके चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी. ऐसे में सुदिव्य की पत्नी को जिम्मेदारी देने का फैसला राजनीतिक और भावनात्मक, दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा सकता है. श्वेता शर्मा पढ़ी-लिखी हैं. हालांकि वे अब तक सक्रिय राजनीति में नहीं रही हैं और गृहिणी के तौर पर परिवार की जिम्मेदारी संभालती रही हैं. बावजूद इसके, राजनीतिक परिस्थितियां उन्हें सीधे राजनीति के मैदान में ला सकती हैं.गिरिडीह सीट और कैबिनेट में संभावित फेरबदल को लेकर झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय का कहना है कि संकट की इस घड़ी में पूरी पार्टी दिवंगत सुदिव्य कुमार सोनू के परिवार के साथ खड़ी है. फिलहाल प्राथमिकता क्रिया-कर्म की प्रक्रिया पूरी करने की है. गिरिडीह विधानसभा सीट के नेतृत्व और कैबिनेट विस्तार को लेकर अंतिम फैसला मुख्यमंत्री और पार्टी सुप्रीमो हेमंत सोरेन ही करेंगे. उनका कहना है कि सही समय पर सही फैसला सामने आएगा.दरअसल, साल 2019-2024 वाले हेमंत सोरेन के कार्यकाल में कोरोना संक्रमण के दौरान अक्टूबर 2020 को मंत्री हाजी हुसैन अंसारी का निधन हो गया था. तब मुख्यमंत्री ने उनके बेटे हफीजुल हसन को मधुपुर उपचुनाव से पहले ही मंत्री बना दिया था. इसका फायदा 2024 के चुनाव में दिखा और हफीजुल हसन दोबारा चुनाव जीत गए.इसी तरह पिछले कार्यकाल में ही अप्रैल 2023 में जगरनाथ महतो का निधन हो गया था. उस वक्त भी मंत्री ने दिवंगत जगरनाथ महतो की पत्नी बेबी देवी को मंत्री बनाया और उपचुनाव में उन्होंने डुमरी सीट जीत भी ली. हालांकि 2024 का चुनाव नहीं जीत पाई.सबसे खास बात ये है कि हेमंत सोरेन के वर्तमान कार्यकाल में भी अब तक दो मंत्री चल बसे हैं. अगस्त 2025 में घाटशिला विधायक और शिक्षा मंत्री रहे रामदास सोरेन का निधन हुआ था, लेकिन सीएम ने उनके बेटे को बिना मंत्री बनाए उपचुनाव में उतारा था. यह जानते हुए भी कि सोमेश चंद्र सोरेन का सामना पूर्व सीएम चंपाई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन के साथ था. इसके बावजूद सोमेश चंद्र सोरेन चुनाव जीतने में सफल रहे.अब गिरिडीह में भी इसी तरह की राजनीतिक रणनीति अपनाने की चर्चा है, लेकिन यहां एक बड़ी चुनौती है. सुदिव्य कुमार सोनू के बेटे की उम्र महज 12 साल है. उनकी बड़ी बेटी एमबीए की पढ़ाई कर रही हैं, जबकि छोटी बेटी इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रही हैं. ऐसे में तत्काल राजनीतिक जिम्मेदारी के लिए परिवार से सबसे संभावित चेहरा उनकी पत्नी श्वेता शर्मा को माना जा रहा है, हालांकि इस सवाल का जवाब सिर्फ मुख्यमंत्री के पास है.15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य के समय गिरिडीह सीट से भाजपा के चंद्रमोहन प्रसाद विधायक थे. उन्होंने राजद के निर्भय कुमार शाहाबादी को हराया था, लेकिन 2005 में झामुमो के मुन्नालाल ने भाजपा के चंद्रमोहन प्रसाद को हरा दिया था. इस सीट पर 2009 में समीकरण बदल गया. यहां से जेवीएम की टिकट पर निर्भय कुमार शाहाबादी चुनाव जीत गए.उन्होंने बतौर निर्दलीय मैदान में उतरे मुन्नालाल को हराया था. फिर 2014 में बीजेपी ने निर्भय कुमार शाहाबादी को टिकट दिया. उनका सामना झामुमो के सुदिव्य कुमार सोनू से था. इस चुनाव में शाहाबादी लगातार दूसरी बार जीत गये, लेकिन 2019 में सुदिव्य कुमार सोनू ने वापसी की और भाजपा के निर्भय शाहाबादी को 15,884 वोट के अंतर से हराकर अपनी हार का बदला ले लिया. फिर 2024 में भी सुदिव्य लगातार दूसरी बार भाजपा के निर्भय शाहाबादी को हराने में सफल रहे, हालांकि इस जीत का अंतर 3,838 वोट रहा. नतीजे बताते हैं कि गिरिडीह सीट पर झामुमो का दबदबा रहा है.सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक उपयोगिता सिर्फ गिरिडीह विधानसभा सीट तक सीमित नहीं थी. जनवरी 2024 में हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद जब झामुमो और सोरेन परिवार के सामने बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हुआ, तब सुदिव्य कुमार सोनू ने पार्टी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.गांडेय के तत्कालीन विधायक सरफराज अहमद के इस्तीफे के बाद जब कल्पना सोरेन ने गांडेय विधानसभा उपचुनाव के जरिए सक्रिय राजनीति में कदम रखा, तब सुदिव्य कुमार सोनू ने उनके चुनाव प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.सुदिव्य की सक्रियता का नतीजा कल्पना सोरेन की जीत के रूप में सामने आया. 2024 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने कल्पना सोरेन के कैंपेन में अहम भूमिका निभाई. इसके बाद हेमंत सोरेन ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में जगह दी. उन्हें नगर विकास एवं आवास, उच्च शिक्षा, पर्यटन, खेलकूद एवं कला संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली.सुदिव्य कुमार सोनू को हेमंत सोरेन का बेहद करीबी और भरोसेमंद नेता माना जाता था. उनके निधन के बाद मुख्यमंत्री ने इसे अपनी व्यक्तिगत क्षति बताया था. सुदिव्य की अंतिम यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भावुक नजर आए और अपने आंसू नहीं रोक पाए. यह तस्वीर बताती है कि दोनों नेताओं के बीच सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि व्यक्तिगत संबंध भी कितने गहरे थे.छात्र आंदोलन से लेकर विधानसभा के भीतर सरकार का पक्ष रखने तक सुदिव्य कुमार सोनू लगातार सक्रिय रहे. स्टूडेंट्स प्रोटेस्ट के दौरान सरकार और छात्रों के बीच वार्ता में भी उन्हें महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी. विधानसभा में विपक्ष के हमलों का जवाब देने वाले प्रमुख नेताओं में भी सुदिव्य कुमार सोनू शामिल थे. यही वजह है कि उनके निधन से झामुमो ने सिर्फ गिरिडीह का एक विधायक नहीं खोया है, बल्कि सरकार ने एक ऐसे मंत्री और रणनीतिक राजनीतिक सहयोगी को खोया है, जिस पर मुख्यमंत्री को भरोसा था.सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद मुख्यमंत्री के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं. पहली चुनौती है कैबिनेट में रिक्त पद भरना. सरकार को तय करना होगा कि खाली हुई मंत्री पद की जगह किसे दी जाए. दूसरी चुनौती है गिरिडीह सीट को सुरक्षित रखना. गिरिडीह झामुमो के लिए महत्वपूर्ण सीट है और सुदिव्य की अनुपस्थिति में पार्टी को यहां नया राजनीतिक चेहरा खड़ा करना होगा.तीसरी चुनौती है सोरेन परिवार और सुदिव्य परिवार के रिश्ते को राजनीतिक दिशा देना. अगर सुदिव्य की पत्नी श्वेता शर्मा को राजनीतिक जिम्मेदारी दी जाती है, तो यह परिवार के प्रति सम्मान के साथ-साथ गिरिडीह में पार्टी की पकड़ बनाए रखने में अहम कड़ी साबित हो सकती है.

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