BJP का आत्मविश्वास साबित हो सकता है गलत,बांकीपुर सीट पर प्रशांत ने बढ़ाई मुश्किलें

 BJP का आत्मविश्वास साबित हो सकता है गलत,बांकीपुर सीट पर प्रशांत ने बढ़ाई मुश्किलें
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बिहार में हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने एक अहम राजनीतिक बयान दिया है. सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट में उन्होंने दावा किया कि मौजूदा हालात को देखते हुए, जन ​​सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर इस मुकाबले में बढ़त बनाए हुए दिख रहे हैं. उन्होंने बीजेपी और महागठबंधन, दोनों की चुनावी रणनीतियों पर भी सवाल उठाए.शिवानंद तिवारी ने कहा कि बांकीपुर लंबे समय से बीजेपी का गढ़ रहा है. पहले नवीन किशोर और बाद में नितिन नवीन लगातार यह सीट जीतते रहे हैं. हालांकि, उन्होंने गौर किया कि अब हालात वैसे नहीं रहे और चुनावी समीकरण बदलते दिख रहे हैं. यह भी धारणा रही है कि यहां कायस्थ मतदाताओं का प्रभाव सबसे अधिक है और लंबे समय से इसी सामाजिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं. लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ अलग नजर आ रही हैं. शिवानंद तिवारी ने कहा कि एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में इस चुनाव में प्रशांत किशोर का पलड़ा मुझे भारी दिखाई दे रहा है.शिवानंद तिवारी ने इसके पीछे पहला कारण महागठबंधन की स्थिति का बताया है.

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राष्ट्रीय जनता दल ने फिर उसी महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, जो पिछला चुनाव हार चुकी थीं. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव के सबसे निर्णायक समय में महागठबंधन के प्रमुख नेता विदेश प्रवास पर चले गए हैं. जब किसी दल का शीर्ष नेतृत्व अपने उम्मीदवार के चुनाव प्रचार को प्राथमिकता नहीं दे रहा है तो उसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल और मतदाताओं के विश्वास पर पड़ना स्वाभाविक है. राजनीति केवल संगठन का ही नहीं, बल्कि मनोविज्ञान का भी खेल है.शिवानंद तिवारी ने कहा कि दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने भी उम्मीदवार चयन में जिस प्रकार का भ्रम और असमंजस दिखाया, उसने कई सवाल खड़े किए हैं. यह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा खाली की गई प्रतिष्ठित सीट है. पहले घोषित उम्मीदवार को हटाना पड़ा और फिर दूसरे उम्मीदवार को सामने लाया गया. उनको सुनने के बाद भाजपा पर आश्चर्य होता है. कहा जाता है कि सबसे ज्यादा प्रबुद्ध मतदाता इस विधानसभा क्षेत्र में रहते हैं. ऐसे क्षेत्र से ऐसे उम्मीदवार का चयन तो उन प्रबुद्ध मतदाताओं का अपमान है. इतनी महत्वपूर्ण सीट पर इस प्रकार की स्थिति भाजपा जैसी संगठित पार्टी से अपेक्षित नहीं थी.शिवानंद तिवारी ने प्रशांत किशोर का पलड़ा भारी बताया है. उन्होंने कहा कि महागठबंधन और बीजेपी के विपरीत प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी ताकत उनकी राजनीतिक रणनीति और चुनावी प्रबंधन का लंबा अनुभव है. उन्होंने कई राज्यों में चुनावी रणनीतिकार के रूप में सफल अभियान चलाए हैं. इसलिए यह मानना कठिन है कि उन्होंने बिना गहन अध्ययन और ठोस राजनीतिक गणना के बांकीपुर जैसी सीट से स्वयं चुनाव लड़ने का निर्णय लिया होगा. यह निश्चित रूप से एक बड़ा जोखिम है, क्योंकि अब तक भाजपा यहां 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करती रही है. लेकिन बड़े राजनीतिक परिवर्तन अक्सर ऐसे ही जोखिमों से शुरू होते हैं.तिवारी ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा इस चुनाव को लेकर कुछ अधिक आत्मविश्वास में है. यह मान लेना कि केवल सामाजिक समीकरणों के आधार पर यह सीट आसानी से जीत ली जाएगी, शायद गलत साबित हो सकता है. यह सही है कि यहां कायस्थ मतदाताओं का प्रभाव है, लेकिन सिर्फ कायस्थ ही मतदाता भाजपा को चुनाव जीत दिलवाते हैं, ऐसा भी नहीं है. इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी रहते हैं, जिन्हें आज भी बुनियादी नागरिक सुविधाएं पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं.तिवारी ने कहा कि प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को केवल भाजपा के उम्मीदवार के विरुद्ध नहीं, बल्कि पूरी राज्य सरकार के खिलाफ जनमत संग्रह के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है. वे लगातार कह रहे हैं कि उनका मुकाबला किसी एक प्रत्याशी से नहीं, बल्कि सरकार से है. इस रणनीति ने चुनाव को स्थानीय मुकाबले से ऊपर उठाकर व्यापक राजनीतिक विमर्श का विषय बना दिया है.शिवानंद तिवारी ने कहा कि यदि प्रशांत किशोर यह चुनाव जीतते हैं, तो उसके राजनीतिक प्रभाव केवल बांकीपुर तक सीमित नहीं रहेंगे. आगामी विधानसभा चुनाव में विपक्ष की धुरी बदल सकती है और प्रशांत किशोर एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभर सकते हैं. हालांकि, अपनी पोस्ट के आखिर में शिवानंद तिवारी ने यह भी साफ किया कि उनका आकलन किसी सर्वे पर आधारित नहीं है, बल्कि यह एक अनुभवी राजनीतिक कार्यकर्ता के अनुभव और समझ पर आधारित उनका निजी राजनीतिक विश्लेषण है.

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