बिहार की इकोनॉमी की हाल हुई बेहाल,घाटे में चल रही सम्राट सरकार!

 बिहार की इकोनॉमी की हाल हुई बेहाल,घाटे में चल रही सम्राट सरकार!
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बिहार अभी कंगाल हो गया है? ऐसा हम नहीं कह रहे हैं बल्कि बिहार की पॉलिटिक्स में इन दिनों इस पर जमकर बहस हो रही है. इस बहस को जन्म नेता प्रतिपक्ष RJD के लीडर तेजस्वी यादव ने दिया है. उनका कहना है कि सरकार की वित्तीय स्थिति एकदम खराब हो गई है. बिहार आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है और सरकार के पास कर्मचारियों के वेतन और सामाजिक योजनाओं को चलाने तक के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं बच रहे हैं. विपक्ष सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार का दावा है कि बिहार की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है और विकास की रफ्तार पहले से तेज हुई है. क्या बिहार फिर से कंगाल हो गया है इस पर भी बात होने लगी है. आइए हम आपको 5 आंकड़ों के जरिए हकीकत बताते हैं.इस बहस के केंद्र में कुछ ऐसे आंकड़े और घटनाएं हैं जिन्होंने लोगों के मन में सवाल खड़े किए हैं. राजस्व घाटे में अचानक बड़ा उछाल, राजकोषीय घाटे का बढ़ना, सामाजिक पेंशन के भुगतान के लिए आपात कोष के इस्तेमाल की खबरें और कर्मचारियों के वेतन में देरी जैसे मुद्दों ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दिया है. हालांकि दूसरी तरफ सरकार इन परिस्थितियों को अस्थायी और तकनीकी बताकर राज्य की आर्थिक स्थिति को स्थिर और मजबूत बता रही है. ऐसे में सवाल यही है कि क्या बिहार वास्तव में आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है या फिर यह केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा है.बिहार सरकार का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में राज्य को 1,143 करोड़ रुपये का रेवेन्यू सरप्लस मिलेगा, जो राज्य की जीएसडीपी का 0.1 प्रतिशत होगा. लेकिन इसके ठीक पहले वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमान एक अलग तस्वीर दिखाते हैं. इनके अनुसार राज्य को 76,315 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा होने का अनुमान है, जो जीएसडीपी का 6.7 प्रतिशत बैठता है. रेवेन्यू सरप्लस का मतलब होता है कि सरकार की आमदनी उसके नियमित खर्चों से अधिक है, जबकि राजस्व घाटा इसके उलट स्थिति को दर्शाता है. ऐसे में एक ही साल के भीतर इतना बड़ा अंतर विपक्ष के सवालों की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है.

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राजकोषीय घाटा किसी भी राज्य की वित्तीय सेहत का अहम पैमाना माना जाता है. बिहार सरकार ने 2025-26 के बजट में राजकोषीय घाटे को जीएसडीपी के 3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा था. लेकिन संशोधित अनुमानों के अनुसार यह बढ़कर 11.8 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है.यानी सरकार को अपनी आय की तुलना में कहीं अधिक खर्च करना पड़ा है और इसके लिए अतिरिक्त संसाधनों या उधारी का सहारा लेना पड़ा होगा. विपक्ष इसी आंकड़े को आधार बनाकर सरकार पर वित्तीय अनुशासन खोने का आरोप लगा रहा है. आर्थिक जानकार भी मानते हैं कि लंबे समय तक ऊंचा राजकोषीय घाटा किसी भी राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ा सकता है.विवाद को और हवा उस समय मिली जब यह बात सामने आई कि सामाजिक सुरक्षा पेंशन के भुगतान के लिए सरकार को आपात कोष का इस्तेमाल करना पड़ा. आमतौर पर आपात कोष का उपयोग प्राकृतिक आपदा, अप्रत्याशित संकट या असाधारण परिस्थितियों में किया जाता है. इस पर आरोप लग रहे हैं कि अगर नियमित योजनाओं के भुगतान के लिए भी आपात संसाधनों का सहारा लेना पड़े तो यह वित्तीय दबाव का संकेत माना जा सकता है. हालांकि सरकार की ओर से इसे प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन का हिस्सा बताया गया है और कहा गया है कि लाभार्थियों तक समय पर पैसा पहुंचाना प्राथमिकता थी.सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के वेतन में देरी भी इस बहस का बड़ा कारण बनी. अप्रैल और फरवरी के महीनों में कई कर्मचारियों को समय पर सैलरी नहीं मिल सकी, जिसके बाद सरकार की वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठने लगे. विपक्ष ने इसे राज्य के खजाने पर बढ़ते दबाव का संकेत बताया. हालांकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वेतन भुगतान में देरी तकनीकी कारणों और प्रक्रिया संबंधी दिक्कतों की वजह से हुई थी, न कि फंड की कमी के कारण. बावजूद इसके, लगातार दो महीनों में वेतन भुगतान को लेकर पैदा हुई स्थिति ने बहस को और तेज कर दिया.इन तमाम आरोपों और सवालों के बीच राज्य सरकार का रुख पूरी तरह अलग है. सरकार का कहना है कि बिहार की अर्थव्यवस्था लगातार विस्तार कर रही है और विकास परियोजनाओं पर खर्च भी बढ़ा है. सरकार का तर्क है कि सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर बढ़ते निवेश की वजह से सरकारी खर्च बढ़ा है, जिसे आर्थिक कमजोरी नहीं बल्कि विकास की रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए. सरकार का यह भी कहना है कि बड़े पैमाने पर विकास कार्यों के कारण अस्थायी वित्तीय दबाव पैदा होना असामान्य नहीं है और आने वाले वर्षों में इसका सकारात्मक असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा.

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