जानें नाम हटाने और फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर याचिका में क्या सवाल उठाए गए हैं?
कांग्रेस नेता एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. याचिका में निर्वाचन आयोग के कामकाज, एसआईआर से संबंधित निर्णयों की प्रक्रिया और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की गई है.याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि एसआईआर से जुड़े कुछ निर्णय मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की जानकारी, सहमति या मंजूरी के बिना लिए गए. उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि देशव्यापी एसआईआर शुरू करने के निर्णय से संबंधित संपूर्ण आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि होना अभी बाकी है.निर्वाचन आयोग ने पूर्व में संबंधित मीडिया रिपोर्टों को एकतरफा बताते हुए कहा था कि आयोग में विचारों के मतभेद सामान्य हैं और उसके निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे.याचिका में ऑनलाइन फॉर्म-6 में कथित तौर पर किए गए बदलाव पर भी आपत्ति जताई गई है.

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, जुलाई 2026 में फॉर्म में पुराने एसआईआर की मतदाता सूची में आवेदक या उसके परिजनों की मौजूदगी से संबंधित घोषणा जोड़ी गई, जबकि संबंधित नियमों में संशोधन नहीं किया गया था. याचिका में कहा गया है कि इससे पहली बार मतदाता बनने वाले पात्र नागरिकों सहित अन्य लोगों को पंजीकरण में परेशानी हो सकती है.इसके अलावा, ईसीआईनेट और ईआरओनेट डिजिटल प्रणालियों में मतदाता सूची के रिकॉर्ड तक पहुंच, उनमें बदलाव करने की अनुमति और गलत तरीके से हटाए गए नामों को दोबारा बहाल करने की व्यवस्था की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराने की मांग की गई है.याचिका में एक अन्य लंबित मामले का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि एसआईआर के दौरान विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 13 करोड़ नाम मतदाता सूचियों से हटाए जाने की प्रक्रिया में चिह्नित किए गए. वहीं, निर्वाचन आयोग का कहना है कि यह संख्या उन मतदाताओं की है जिन्हें प्रारूप सूची के स्तर पर अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरे पंजीकरण वाला चिह्नित किया गया था. आयोग के अनुसार, इसे अंतिम रूप से हटाए गए नामों की संख्या नहीं माना जाना चाहिए.याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि कुछ मामलों में पात्र मतदाताओं को पर्याप्त सूचना और सुनवाई का अवसर नहीं मिलने तथा नाम बहाल कराने में कठिनाइयों की आशंका है. उन्होंने प्रत्येक मतदाता का नाम हटाने के कारण सार्वजनिक करने और त्रुटियों को सुधारने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने की मांग की है.याचिका में पंजाब की प्रारूप मतदाता सूची का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जून 2026 में लगभग 2.14 करोड़ मतदाताओं की संख्या के मुकाबले 13 अगस्त 2026 को प्रकाशित प्रारूप सूची में करीब 20.66 लाख नाम कम दर्ज हुए. इसके अतिरिक्त, लगभग 12.80 लाख मतदाताओं के वर्ष 2003 की मतदाता सूची से मिलान नहीं हो पाने का भी उल्लेख किया गया है.याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई है कि समय रहते सुधार की प्रभावी व्यवस्था नहीं होने पर पात्र नागरिक आगामी चुनावों में मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं.याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह निर्वाचन आयोग को एसआईआर से संबंधित फाइलें, बैठक की कार्यवाही, अधिकारियों की टिप्पणियां, निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियां और डिजिटल प्रणालियों के एक्सेस लॉग प्रस्तुत करने का निर्देश दे. साथ ही, सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में तकनीकी विशेषज्ञों वाली स्वतंत्र समिति गठित कर मतदाता सूची में बदलाव, नाम हटाने की प्रक्रिया और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की कार्यप्रणाली की समीक्षा कराने की मांग की गई है.याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा है कि निर्वाचन आयोग के प्रत्येक निर्णय में संबंधित कानून और निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए. मतदाता सूची से किसी भी पात्र मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे सूचना और उचित सुनवाई का अवसर दिया जाए तथा पात्र नागरिकों को कानून के तहत निर्धारित अंतिम तिथि तक नाम शामिल कराने का अवसर मिले।
