गांधी जी के अंदर किसने डाला था सेकुलरिज्म का संस्कार,आखिर कौन थे अब्दुल्ला सेठ?
मोहनदास करमचंद गांधी 20वीं सदी के इतिहास में वह शख्सियत थे जिन पर देश का आम मुसलमान पक्की तौर पर भरोसा करता था. मगर कुछ सिरफिरे तत्त्वों के कारण पाकिस्तान बना और न चाहते हुए भी बहुतेरे मुसलमान हिंदुस्तान छोड़कर पाकिस्तान चले गए और फिर पछताए. फिर कुछ वापस भी आना चाहते थे लेकिन दो देश बन जाने की वज़ह से कुछ नामी-गिरामी लोगों को छोड़कर पाकिस्तान में उन्हें अनिच्छा पूर्वक रहना पड़ा. अब उनके अंदर भारत के प्रति एक दुराग्रह भी है और एक ललक भी.औसत भारतीय की माली हालत औसत पाकिस्तानी से बेहतर है. शिक्षा, स्वास्थ्य और नागरिक अधिकारों की बेहतर स्थिति दक्षिण एशिया में सिर्फ़ भारत में है. इसीलिए भारत से पश्चिम की ओर भागने की प्रवृत्ति पाकिस्तान की तुलना में कम है. और तो और अब तो पाकिस्तान के कुछ इतिहासकार भी राजा दाहिर को अपना पुरखा बता रहे हैं.यही गांधी की बड़ी जीत है कि उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो जहर अंग्रेजों ने बोया था, उसे खत्म करने की दिशा में बहुत बड़ा काम किया. गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास कर्मचंद गांधी का बचपन एक अति धार्मिक हिंदू परिवार में गुजरा. किंतु लंदन से बैरिस्टरी की परीक्षा पास करने के बाद जब वे वकालत के लिए भारत लौटे तो शुरू में उन्हें कोई काम नहीं मिला.

किंतु गुजरात के अब्दुल्ला सेठ दक्षिण अफ़्रीका में कारोबार करते थे. उन्हें एक हिंदुस्तानी वकील की जरूरत थी.गांधी जी के बड़े भाई ने उनको उनकी फ़ार्म में काम करने के लिए दक्षिण अफ़्रीका भेजा. और इन्हीं अब्दुल्ला सेठ ने गांधी जी के अंदर सेकुलरिज्म के पुख्ता संस्कार डाले. गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका में अब्दुल्ला सेठ के वकील बन कर गए तब उन अब्दुल्ला सेठ ने अपने वकील मोहनदास कर्मचंद गांधी को हिन्दुस्तानियों के हित के लिए लड़ने को प्रेरित किया.गांधी जी अपनी आत्म कथा में लिखते हैं, इससे अब्दुल्ला सेठ को निजी तौर पर नुकसान हुआ लेकिन उन्होंने गांधी जी से कहा तुम मेरे हितों की परवाह मत करो. स्वयं गांधी जी ने उन अब्दुल्ला सेठ के बारे में काफी कुछ लिखा है. मज़े की बात कि ये वही अब्दुल्ला सेठ थे जिन्होंने गांधी जो को दक्षिण अफ्रीका बुलाया था अपने मुकदमे की पैरवी के लिए. पर अब्दुल्ला सेठ को मुकदमे से ज्यादा लगाव अपने वकील मोहनदास कर्मचंद गांधी की देसी ठसक पर था. इसीलिए अपने मुकदमे की वाट लगाकर भी सेठ ने गांधी जी को अपने स्वाभिमान के लिए लड़ना सिखाया.स्वयं गांधी जी उन्हीं अब्दुल्ला सेठ के बारे में लिखा है, अब्दुल्ला सेठ पढ़े-लिखे बहुत कम थे. अक्षर-ज्ञान कम था पर अनुभव-ज्ञान बहुत बड़ा था. उनकी बुद्धि तेज थी और वह खुद भी इस बात को जानते थे. अभ्यास से अंग्रेजी इतनी जान ली थी कि बोलचाल का काम चला लेते.गांधी जी लिखते हैं कि अब्दुल्ला सेठ बैंक में मैनेजरों से बात कर लेते. योरोपियन व्यापारियों से सौदा कर लेते, वकीलों को अपना मामला समझा देते. हिन्दुस्तानियों में उनका काफी मान था. उनकी पेढ़ी उस समय हिंदुस्तानियों में सबसे बड़ी तो नहीं तो, बड़ी पेढिय़ों में अवश्य थी. उनका स्वभाव वहमी था. वह इस्लाम का बड़ा अभिमान रखते थे. तत्वज्ञान की बातों के शौकीन थे. अरबी नहीं जानते थे फिर भी कुरान-शरीफ तथा आमतौर पर इस्लामी धर्म साहित्य की वाकफियत उन्हें अच्छी थी.दृष्टान्त तो जबान पर हाजिर रहते थे. उनके सहवास से मुझे इस्लाम का अच्छा व्यावहारिक ज्ञान हुआ. जब हम एक-दूसरे को जान-पहचान गए तब वह मेरे साथ बहुत धर्म-चर्चा किया करते. दूसरे या तीसरे दिन मुझे डरबन अदालत दिखाने ले गए. वहां कितने ही लोगों से परिचय कराया. अदालत में अपने वकील के पास मुझे बिठाया.मजिस्ट्रेट मेरे मुंह की ओर देखता रहा. उसने कहा- अपनी पगड़ी उतार लो! मैने इंकार कर दिया और अदालत से बाहर चला आया. मेरे नसीब में तो यहां भी लड़ाई लिखी थी. पगड़ी उतरवाने का रहस्य मुझे अब्दुल्ला सेठ ने समझाया. मुसलमानी लिबास पहनने वाला अपनी पगड़ी यहां पहन सकता है. किंतु दूसरे भारतवासियों को अपनी पगड़ी उतार लेनी चाहिए.पगड़ी उतार देने का अर्थ था मान-भंग सहन करना. सो मैने तो यह तरकीब सोची कि हिन्दुस्तानी पगड़ी को उतार कर अंग्रेजी टोप पहना करूं, जिससे उसे उतारने में मान-भंग का सवाल न रह जाए और मैं इस झगड़े से भी बच जाऊं. पर अब्दुल्ला सेठ को यह तरकीब पसंद न आई. उन्होंने कहा- यदि आप इस समय ऐसा करेंगे तो उसका उल्टा अर्थ होगा. जो लोग देशी पगड़ी पहने रहना चाहते होंगे उनकी स्थिति विषम हो जाएगी. आप अगर अंग्रेजी टोपी लगाएंगे तो लोग “वेटर” समझेंगे.अब्दुल्ला सेठ के अंदर देशाभिमान कूट-कूट कर भरा था किंतु उनके चितन संकुचित भी था. संकुचितता के बिना वेटर की उपमा नहीं सूझती. गिरमिटिया भारतीयों में हिन्दू, मुसलमान और ईसाई तीन विभाग थे. जो गिरमिटिया ईसाई हो गए, उनकी संतति ईसाई थी. 1893 ईस्वी में भी उनकी संख्या बढ़ गई थी. वे सब अंग्रेजी लिबास में रहते. उनका अच्छा हिस्सा होटलों में नौकरी करके जीविका उपार्जन करता.इसी समुदाय को लक्ष्य करके अंग्रेजी टोपी पर अब्दुल्ला सेठ ने यह टीका की थी. उनके अंदर वह भाव था कि होटल में “वेटर” बनकर रहना हल्का काम है. पर अब्दुल्ला सेठ की बात मुझे अच्छी प्रतीत हुई. मैने पगड़ीवाली घटना पर पगड़ी का तथा अपने पक्ष का समर्थन अखबारों में किया. अनवेलकम विजिटर- अनचाहा अतिथि- के नाम से मेरा नाम अखबारों में आया और तीन ही चार दिन के अंदर अनायास ही दक्षिण अफ्रीका में मेरी ख्याति हो गई. (आत्म कथा 1927)गांधी जी ने दिल्ली के हकीम अजमल खां के बारे में भी काफी कुछ लिखा है. वे लिखते हैं कि हकीम अजमल अजमल खां बड़े हकीम तो थे ही बड़े स्वप्नदृष्टा भी थे. जामिया मिलिया को दिल्ली लाने का श्रेय हकीम साहब को ही है. एक जमाना था, शायद सन् 15 की साल में, जब मैं दिल्ली आया था, हकीम साहब से मिला और डॉक्टर अंसारी से भी. मुझसे कहा गया कि हमारे दिल्ली के बादशाह अंग्रेज नहीं हैं, बल्कि ये हकीम साहब हैं.डॉक्टर अंसारी तो बड़े बुजुर्ग थे, बहुत बड़े सर्जन थे, वैद्य थे. वह भी हकीम साहब को जानते थे, उनके लिए उनके दिल में बहुत कद्र थी. हकीम साहब भी मुसलमान थे, लेकिन वे तो बहुत बड़े विद्वान थे, हकीम थे. यूनानी हकीम थे, लेकिन आयुर्वेद का उन्होंने कुछ अभ्यास किया था. उनके यहां हजारों मुसलमान आते थे और हजारों गरीब हिन्दू भी आते थे.दूसरी तरफ बड़े साहूकार, धनी-मानी मुसलमान और खूब सम्पन्न हिन्दू भी आते थे. और एक दिन का हजार रुपये उनको देते थे. जहां तक मैं हकीम साहब को मैं पहचानता था, उनहें रुपयों की नहीं पड़ी थी, लेकिन उनकी खिदमत की खातिर उनका पेशा था. वह तो बादशाह जैसे थे. आखिर में उनके बाप-दादा तो चीन में रहते थे, चीन के मुसलमान थे, लेकिन बड़े शरीफ थे.हकीम जी कोरे स्वप्नदृष्टा ही नहीं थे. उन्हें विश्वास था कि मेरा स्वप्न एक दिन पूरा होगा ही. जिस तरह तिब्बी कालेज के द्वारा उनका देशी चिकित्सा का स्वप्न फला, इसी तरह अपना राजनीतिक स्वप्न भी उन्होंने जामिया मिलिया के जरिए पूरा करने की कोशिश की. जबकि जामिया मरणासन्न हो रही थी, उस समय हकीम साहब ने प्राय: अकेले ही उसे अलीगढ़ से दिल्ली लाने का सारा भार उठाया.दिल्ली के जिन मुस्लिम नेताओं ने गांधी जी को प्रभावित किया उनमें हकीम अजमल खां के बाद डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी का नाम प्रमुख है. गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से वापस आए तो हिन्दुस्तान की राजनीति में दिल्ली के दो मुस्लिम नेता राजनीतिक क्षितिज पर छाए हुए थे. हकीम अजमल खां और डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी. यूपी के गाजीपुर जिले की मोहम्मदाबाद तहसील के गांव यूसुफ पुर के मूल निवासी डॉक्टर अंसारी उन दिनों लंदन से एमएस और एमडी की डिग्री लेकर आए थे और डाक्टरी विद्या के वे प्रचंड ज्ञाता थे.मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों में ही वे एक्टिव थे. पर जब मुहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस से दूरी बरतने लगे तो डाक्टर अंसारी मुस्लिम लीग छोड़कर गांधी व नेहरू के साथ आ गए. वे 1927 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे. गांधी जी ने उनकी अध्यक्षी के लिए मार्मिक अपील भी की थी. गांधी जी द्वारा की गई अपील के अंश-आगामी वर्ष के लिए डॉ. अंसारी का महासभा के अध्यक्ष-स्थान के लिए चुनाव होना प्राय: निश्चित-सा है. राष्ट्रीय क्षितिज पर इस चुनाव में आपत्ति करने वाला कोई नहीं है. डॉ. अंसारी जितने अच्छे मुसलमान हैं, उतने ही अच्छे भारतीय भी हैं. उनमें धर्मोन्माद की तो किसी ने शंका ही नहीं की है. वर्षों तक वे एक साथ महासभा के सह मंत्री रहे हैं.हाल ही में एकता के लिए किए गए उनके प्रयत्नों को तो सब कोई जानते हैं और सच्ची बात तो यह है कि अगर बेलगांव में मैं, कानपुर में श्रीमती सरोजनी नायडू और गोहाटी में श्रीयुत आयंगर मार्ग में न आते तो इनमें से किसी भी अधिवेशन के अध्यक्ष डॉ. अंसारी ही चुने जाते, क्योंकि जब ये चुनाव हो रहे थे तब उनका नाम प्रत्येक आदमी की जबान पर था, परन्तु कुछ खास कारणों से डॉ. अंसारी का हक आगे बढ़ा दिया गया और ज्ञात होता है कि विधि ने उनके चुनाव को इसीलिए आगे धकेल दिया था कि वे ऐसे मौके पर आवें.जब देश को उनकी सबसे अधिक जरूरत हो. अगर हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोई योजना दोनों पक्षों को ग्रहण करने योग्य मालूम हो तो नि:संदेह डॉ. अंसारी ही उसे महासभा के द्वार पर ले जा सकते हैं. …अकेली यही बात (सर्वसम्मति से और हृदय से एक मुसलमान को अपना अध्यक्ष चुनना) हिन्दुओं की ओर से इस बात का साफ प्रमाण होगा कि हिन्दू एकता को दिल से चाहते हैं, और राष्ट्रीय विचारों वाले मुसलमानों में डॉ. अंसारी की अपेक्षा साधारणतया मुसलमान जनता में अधिक आदृत कोई नहीं है.इसलिए मेरे ख्याल से तो यही अच्छा है कि अगले साल के लिए डॉ. अंसारी ही राष्ट्रीय महासभा के कर्णधार हों, क्योंकि केवल किसी योजना को मंजूर कर लेना ही हमारे लिए काफी नहीं है. दोनों पक्षों द्वारा उसे मंजूर कराने की बनिस्बत उसे कार्य में परिणित करना शायद कहीं अधिक जरूरी है. (हि. न. 21.07.1927)बापू ने यह लेख डॉ. अंसारी की मृत्यु पर शोक जताते हुए लिखा था- वह निसंदेह हकीम अजमल खां की तरह ही हिन्दू-मुस्लिम एकता के एक प्रतिरूप थे. कड़ी से कड़ी परीक्षा के समय भी वह अपने विश्वास से कभी डिगे नहीं. वह एक पक्के मुसलमान थे. हजरत मुहम्मद साहब की जिन लोगों ने जरूरत के वक्त मदद की थी, वह उनके वंशज थे और उन्हें इस बात का गर्व था. इस्लाम के प्रति उनमें जो दृढ़ता थी और उसका उन्हें जो प्रगाढ़ ज्ञान था उस दृढ़ता और उस ज्ञान ने ही उन्हें हिन्दू-मुस्लिम एकता में विश्वास करने वाला बना दिया था.अगर यह कहा जाए कि जितने उनके मुसलमान मित्र थे उतने ही हिन्दू मित्र थे तो इसमें कोई अतिशयोक्ति न होगी. सारे हिन्दुस्तान के काबिल-से-काबिल डाक्टरों में उनका नाम लिया जाता था. किसी भी कौम का गरीब आदमी उनसे सलाह लेने जाए, उसके लिए बेरोकटोक उनका दरवाजा खुला रहता था. उन्होंने राजा-महाराजाओं और अमीर घरानों से जो कमाया वह अपने जरूरतमंद दोस्तों में दोनों हाथों से खर्च किया. (महात्मा गांधी के इन सपनों को साझा करने के लिए मैने सर्व सेवा संघ प्रकाशन की पुस्तक गाँधी साहित्य जैसा मैंने उन्हें जाना समझा की मदद ली है.)
