भरत तिवारी मामले में कार्रवाई से खुश नहीं है मां,आत्मसमर्पण के दावे को लेकर शुरू हुई नई विवाद
बिहार के चर्चित भरत तिवारी पुलिस मुठभेड़ प्रकरण में न्याय की लड़ाई अभी भी जारी है. बेटे को खो चुकी मां आशा देवी इंसाफ की उम्मीद लेकर बुधवार को शाहाबाद परिक्षेत्र के डीआईजी सत्य प्रकाश के पास पहुंचीं. आंखों में आंसू और मन में न्याय की आस लिए उन्होंने मामले में नामजद सभी आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. परिजनों का आरोप है कि घटना को तीन महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी केवल एक आरोपी की गिरफ्तारी हुई है, जबकि अन्य आरोपियों के विरुद्ध अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है.बुधवार को भरत तिवारी की मां आशा देवी अपने पुत्र चंदन तिवारी और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह के साथ शाहाबाद परिक्षेत्र के पुलिस उपमहानिरीक्षक सत्य प्रकाश से मिलीं. प्रतिनिधिमंडल ने डीआईजी को आवेदन सौंपते हुए मामले की अब तक हुई कार्रवाई की समीक्षा कराने और लंबित कार्रवाई को आगे बढ़ाने का अनुरोध किया. परिजनों ने कहा कि घटना से जुड़े सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

परिवार का कहना है कि इस मामले में कुल 11 लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया है, लेकिन अब तक केवल एसटीएफ जवान अक्षय कुमार की गिरफ्तारी हुई है. परिजनों ने तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक राजेश कुमार शर्मा, तत्कालीन थानाध्यक्ष राजेश कुमार मालाकार समेत अन्य नामजद आरोपियों के विरुद्ध भी कार्रवाई की मांग की. उनका कहना है कि जब प्राथमिकी में कई लोगों को नामजद किया गया है तो जांच और कार्रवाई भी सभी के संबंध में निष्पक्ष रूप से आगे बढ़नी चाहिए.मामले में नाम आने के बाद एसटीएफ जवान अक्षय कुमार को जुलाई 2026 में गिरफ्तार किया गया था. उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, उन पर भरत तिवारी को गोली मारने के आरोप से जुड़े मामले में कार्रवाई की गई थी. हालांकि परिवार का कहना है कि केवल एक गिरफ्तारी से न्याय की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जा सकती।गौरतलब है कि 17 जून 2026 को भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में पुलिस मुठभेड़ के दौरान भरत भूषण तिवारी की मौत हो गई थी. घटना के बाद परिजनों ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे हत्या बताया था. मृतक की मां आशा देवी के बयान पर पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज की गई थी.परिजनों का दावा है कि मुठभेड़ के दौरान भरत तिवारी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए अपना हथियार फेंक दिया था. उनका आरोप है कि इसके बावजूद उसे गोली मार दी गई. हालांकि इस दावे की सत्यता की जांच जारी है और मामले के अंतिम तथ्य जांच एजेंसियों तथा न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्ष के बाद ही स्पष्ट होंगे।घटना के बाद राज्य सरकार ने मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए न्यायिक आयोग के गठन का निर्णय लिया था. उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित आयोग के समक्ष मृतक के माता-पिता सहित अन्य पक्षों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं. इसके अतिरिक्त पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों को भी आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है.न्यायिक जांच के दौरान तत्कालीन डीएसपी राजेश कुमार शर्मा, तत्कालीन थानाध्यक्ष राजेश मालाकार सहित मुठभेड़ से जुड़े अन्य पुलिस अधिकारियों और कर्मियों को भी आयोग के समक्ष उपस्थित होना पड़ा. जुलाई में आयोग द्वारा करीब 15 पुलिसकर्मियों को गवाही के लिए समन जारी किए जाने की जानकारी सामने आई थी. इससे संकेत मिले कि आयोग मामले के सभी पहलुओं की विस्तार से जांच कर रहा है।भरत तिवारी की मां आशा देवी का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी निर्दोष व्यक्ति को परेशान करना नहीं है. उनकी मांग केवल यह है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और जांच में जिस व्यक्ति की भूमिका सामने आए, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए.प्रतिनिधिमंडल ने शाहाबाद परिक्षेत्र के डीआईजी सत्य प्रकाश से मामले में शीघ्र हस्तक्षेप करने तथा अब तक हुई कार्रवाई की समीक्षा कराने का आग्रह किया. परिजनों के अनुसार, डीआईजी ने आवेदन के आधार पर आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है. परिजनों ने कहा कि मामला अत्यंत संवेदनशील है. इसलिए जांच और कार्रवाई में अनावश्यक विलंब नहीं होना चाहिए. परिवार की मांग है कि न्यायिक जांच, प्राथमिकी और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा की जाए तथा कानून के अनुरूप आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की।
