बिहार में 8 सीटों पर होने वाले MLC चुनाव में जानिए किसका पलड़ा है भारी?

 बिहार में 8 सीटों पर होने वाले MLC चुनाव में जानिए किसका पलड़ा है भारी?
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8 सीटों पर होने वाले बिहार विधान परिषद चुनाव को लेकर सूबे की सियासत गरमायी हुई है. एनडीए पर जीत को बरकरार रखने दबाव है तो महागठबंधन के लिए विधानसभा चुनाव में मिली हार से उबरने की चुनौती है. वहीं, बांकीपुर उपचुनाव में जीत से उत्साहित प्रशांत किशोर सभी सीटों पर जीत का दावा ठोक रहे हैं. कई सीटों पर अपने भी विरोध में हैं. ऐसे में खेला होने से इंकार नहीं किया जा सकता है. इस चुनाव में शिक्षक और स्नातक के कई मुद्दे हैं लेकिन सबसे खास स्नातकों के लिए नौकरी और रोजगार का मुद्दा है.बीजेपी को छोड़ सभी प्रमुख दलों ने अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है. एनडीए में जेडीयू ने भी चार उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. प्रशांत किशोर ने पहले पांच और फिर तीन यानी 8 सीटों पर सभी उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. आरजेडी ने 6 सीटों पर उम्मीदवार की घोषणा की है, जबकि एक सीट कांग्रेस (पूर्व अध्यक्ष मदन मोहन झा) और एक सीट सीपीआई (प्रो. संजय कुमार सिंह) के लिए छोड़ दी है।पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार की मुश्किल मोकामा के विधायक अनंत सिंह ने बढ़ा दी है. उन्होंने अनुज सिंह को नीरज कुमार के खिलाफ खड़ा कर दिया है. जिस अनुज सिंह का अनंत सिंह समर्थन कर रहे हैं, उनको जन सुराज का टिकट मिल गया है.दूसरी तरफ पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से पांच बार चुनाव जीत चुके भाजपा के नवल यादव के खिलाफ आरजेडी ने जेडीयू के पूर्व विधायक डॉ. संजीव सिंह को उतारा है, जिन्होंने बीजेपी के मौजूदा विधान पार्षद की चुनौती बढ़ा दी है.

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30 साल का एंटी-इनकंबेंसी तो उसका नुकसान बीजेपी उम्मीदवार को उठाना पड़ सकता है.विधान परिषद की 8 सीटों में से दो सीट महागठबंधन के पास है. दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र और तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र दोनों पर महागठबंधन का फिलहाल कब्जा है हालांकि 8 सीटों में राजद के पास एक भी सीट नहीं है. दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा एक बार फिर से चुनाव प्रचार में अपनी ताकत झोंक दी है।वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एकमात्र विधान पार्षद तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से हैं. संजय सिंह 2014 में और फिर 2020 में चुनाव जीत चुके हैं. अब तीसरी बार भाग्य आजमा रहे हैं और चुनाव प्रचार में पूरी ताकत लगा रहे हैं. कांग्रेस और सीपीआई के उम्मीदवार को एनडीए के साथ प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज से भी टक्कर मिल रहा हैतिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में अभिषेक झा को जेडीयू ने एक बार फिर से मौका दिया है. पिछली बार उपचुनाव में शिक्षक नेता बंशीधर बृजवासी ने जीतकर सबको चौंका दिया था, इस बार भी वह चुनावी मैदान में हैं. प्रशांत किशोर की पार्टी के लिए यह सीट भी महत्वपूर्ण है. जन सुराज ने डॉ. विमोहन कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया है।बीजेपी ने भले ही अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है लेकिन किस सीट पर कौन लड़ेगा, इसको लेकर तस्वीर साफ हो चुकी है. पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार पांच बार चुनाव जीतने वाले नवल यादव का कहना है कि छठी बार भी रिकॉर्ड बनाएंगे.वहीं, आरजेडी का कहना है कि नौकरी और रोजगार हमारे लिए बड़ा मुद्दा रहा है. उनके नेता तेजस्वी यादव ने डिप्टी सीएम रहते हुए युवाओं के लिए कई फैसले लिए थे. खासकर नौकरी और रोजगार के लिए काफी काम किया था. जिसका फायदा हमें जरूर मिलेगा. इस बार हमलोग अच्छा करेंगे.जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने विधान परिषद के 8 सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर एनडीए का मुद्दा स्पष्ट कर दिया है. उन्होंने कहा, ‘मुख्यमंत्री सम्राट चैधरी के नेतृत्व में एनडीए सरकार नीतीश माॅडल के तहत बिहार के विकास की इसी गति को आगे बढ़़ा रही है. शिक्षकों और स्नातकों की अपेक्षाओं के अनुरूप शिक्षा और युवा विकास को नई गति देने के लिए एनडीए सरकार प्रतिबद्ध है.दरअसल में सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद विधान परिषद के उपचुनाव और विधान परिषद विधानसभा का चुनाव में एनडीए को हार मिल चुकी है. बाकीपुर उपचुनाव तो सबसे बड़ा झटका है क्योंकि यह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट रही है. ऐसे में बीजेपी और सीएम के लिए विधान परिषद की आठों सीट प्रतिष्ठा का विषय बनी हुई है. कम से कम जो विनिंग सीट है, उसे बचाना भी बड़ा चैलेंज होगा. वहीं निशांत के लिए भी पहला बड़ा चुनाव होगा. महागठबंधन के साथ जन सुराज के लिए भी चुनौती बड़ी है।दूसरी तरफ महागठबंधन में घटक दलों के बीच आपसी खींचतान है. कहीं एकजुटता नहीं दिख रही है. प्रशांत किशोर की ओर से आठों सीटों पर उम्मीदवार देने के कारण यह मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है. एनडीए की सरकार होने के कारण एनडीए उम्मीदवारों का पलड़ा भारी जरूर है लेकिन इस साल हुए लगातार दो चुनाव में मिली हार से एनडीए के लिए आठों सीट जीतना चुनौती भी बनी हुई है. एक तरफ सीटिंग सीट बचाने की चुनौती है तो दूसरी तरफ खाता खोलने की. अब देखना है कि स्नातक और शिक्षक किस पर भरोसा जताते हैं?

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