BRICS के मंच पर मोदी-पुतिन-जिनपिंग आएंगे साथ,भारत और रूस के बीच होंगे कई समझौते
दुनिया का सुपरपावर बताने वाले अमेरिका के लिए कूटनीतिक दवाई का डोज है, बदलता ग्लोबल ऑर्डर और कई फ्रंट पर छिड़े युद्धों के बीच भारत का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, क्योंकि अगले कुछ घंटों में भारत में लगने वाला है महाशक्तियों का वो मंच, जो अमेरिका के लिए संदेश है कि दुनिया में उसकी दादागीरी नहीं चलने वाली और पीएम मोदी ने BRICS समिट का ट्रेलर अभी से दिखा दिया है कि भारत पूरी तरह से तैयार है..इस कूटनीतिक महामंच के 3 सबसे बड़े किरदार हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग. ये वो शक्ति सम्मेलन है, जिसकी मेजबानी भारत कर रहा है, लेकिन इसकी गूंज दिल्ली से लेकर वॉशिंगटन तक सुनाई दे रही है.12 और 13 सितंबर को दिल्ली में BRICS का महामंच सजेगा. प्रधानमंत्री मोदी से मिलने के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिल्ली पहुंच रहे हैं तो वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी सात वर्ष बाद भारत की धरती पर कदम रखने जा रहे हैं.. दुनिया की लगभग आधी आबादी अब BRICS के साथ खड़ी है.. भारत, रूस और चीन जैसे देश मिलकर अब दुनिया के नए नियम लिख रहे हैं.

दिल्ली की धरती से निकलने वाला संदेश सीधे अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है, जिस समय वर्ल्ड ऑर्डर में उथल-पुथल मची हुई है, उस समय पुतिन और जिनपिंग की भारत यात्रा से साफ संकेत मिल रहे हैं कि वैश्विक राजनीति की धुरी अब पश्चिम से हटकर भारत की तरफ घूम चुकी है.पश्चिमी दबावों को दरकिनार कर भारत जिस तरह से रूस और चीन को एक ही मंच पर ला रहा है, उसने वाशिंगटन को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि भारत को अपने हिसाब से चलाना अब संभव नहीं है. आखिर इसकी वजह क्या है.. बड़ी बातें जान लीजिए.BRICS से पहले पीएम मोदी और पुतिन की हाईलेवल द्विपक्षीय मीटिंग होगी तो वहीं इसके कुुछ घंटे बाद शी जिनपिंग भी अपने पूरे काफिले के साथ दिल्ली पहुंच रहे हैं. रूस से मुलाकात को लेकर एक बात तो तय है कि भारत को हथियारों पर शुभ समाचार मिलने वाला है तो वहीं गलवान झड़प के बाद जिनपिंग का ये पहला भारत दौरा है, जो दोनों देशों के बीच ट्रैक पर आते संबंधों का संकेत है.रूस से मीटिंग के वक्त घातक हथियारों के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी बात हो सकती है तो वहीं चीन से चीनी निवेश और तकनीकी आयात पर पाबंदियों की समीक्षा हो सकती है.बड़ी खबर ये है कि भारत में रूस का न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाने पर बात हो सकती है तो वहीं भारत-चीन के बीच सीधी उड़ान की शुरुआत हो सकती है. बड़ी बात ये है कि भारत-रूस में रूपया और रूबल में व्यापार बढ़ाने पर बात हो रही है. सवाल है क्या इससे डॉलर का तोड़ निकलेगा तो वहीं चीन से सीमा पार आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा पर बात हो सकती है. इससे पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ना तय है.अमेरिकी डॉलर का दबदबा कमजोर हो सकता है.भारत-रूस में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और न्यूक्लियर डील से US प्रतिबंध बेकार हो सकते हैं.ट्रंप की इंडो-पैसिफिक रणनीति कमजोर पड़ सकती है.BRICS से ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के लिए कूटनीतिक संतुलन बड़ी चुनौती बन जाएगा.ये पश्चिमी देशों के खिलाफ सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है.. ये भी ट्रंप को बहुत दर्द पहुंचा रहा होगा.यानी जब दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं अमेरिका की नहीं, बल्कि दिल्ली की मेज पर बैठकर ग्लोबल गवर्नेंस के नए नियम तय कर रही हों, तो वाशिंगटन की बेचैनी बढ़ना लाजिमी है.जब भारत और रूस की हथियार वाली दोस्ती की बात हो रही है, तो आपको ये भी बता दें रूस के साथ किन हथियारों को लेकर समझौते संभव हैं….वो कौन से हथियार हैं जो पाकिस्तान में आजकल ट्रेंड कर रहे हैं..ये जानना भी जरूरी है.मिल रही जानकारी के अनुसार भारत और रूस के बीच S-500 पर चर्चा हो सकती है,जो पाकिस्तान S 400 से हार चुका है, जो पाकिस्तान S-400 को भेद नहीं पाया वो इस बात से परेशान है कि S 500 वाली डील होगी तो क्या होगा?दूसरे हथियार का नाम है Su-57 फाइटर जेट, बताया ये भी जा रहा है कि भारत रूस से 75 सुखोई 57 हथियार खरीद सकता है. इससे भी पाकिस्तान डरा हुआ है.ब्रह्मोस के नए वर्जन बनाने पर भी डील हो सकती है. वैसे भी ब्रह्मोस पाकिस्तान के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है…जब ब्रह्मोस के नए वर्जन वाली डील होगी तो सोचिए पाकिस्तान का क्या होगा?इसके अलावा Su-30MKI के लिए लेटेस्ट वॉरफेयर वाली डील भी संभव है. पाकिस्तान के लिए चुनौती ये है कि 200 किलोमीटर वाली मिसाइलों को चाइनीज सिस्टम कैसे रोकेगा.इस बीच एक और नाम की चर्चा हो रही है, वो है ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन की. शुक्रवार को पीएम मोदी और ईरान के राष्ट्रपति की मुलाकात होने वाली है. अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के बीच ब्रिक्स में ईरान की उपस्थिति ये दर्शाती है कि वो कूटनीतिक रूप से अलग-थलग नहीं है.चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 7 वर्ष बाद भारत दौरे पर आ रहे हैं. ये दौरा दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के बाद रिश्ते सुधारने की कोशिश के बीच हो रहा है.. ऐसे में ये समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर ये दौरा इतना खास क्यों है?जिनपिंग आखिरी बार वर्ष 2019 में भारत आए थे.शी के साथ करीब 400 अधिकारियों का दल आ सकता है.जिनपिंग के साथ विदेश मंत्री वांग यी और वाणिज्य मंत्री वांग वेंताओ भी होंगे.जबकि 2019 में जिनपिंग अपने साथ लगभग 200 अधिकारी लाए थे.पिछले वर्ष ही पीएम मोदी SCO समिट के लिए चीन गए थे.इस वर्ष मार्च में भारत ने 2020 के बाद लगाए गए कुछ निवेश प्रतिबंधों पर राहत दी थी.जिनपिंग के दौरे के पर कुछ उद्योगों में भारत-चीन जॉइंट वेंचर पर भी विचार हो रहा है.पिछले महीने अजित डोभाल ने चीन के उपराष्ट्रपति से मुलाकात की.यह जानना चाहिए कि भारत-चीन रिश्तों को ट्रैक पर लाने की कोशिशें तो हो रही हैं, लेकिन अब भी सबकुछ सामान्य नहीं हुआ है.भारत-चीन में कागजों पर रिश्ते सुधर रहे हैं, लेकिन व्यापार में दिक्कतें हैं.निवेश फंसा है.., और मशीनरी पर पाबंदियां हैं.भारत चाहता है चीन अपने एक्सपोर्ट कंट्रोल पर राहत दे.चीन चाहता है भारत निवेश पर और छूट दे.सीमा विवाद से जुड़े कई पुराने मुद्दों पर टकराव है.दोनों देशों में वीजा, सीधी उड़ानें और आवाजाही अब भी सामान्य नहीं हुई है.इन मुद्दों पर पीयूष गोयल और चीनी वाणिज्य मंत्री के बीच साइडलाइन बातचीत हो सकती है.इसके अलावा सीमा पर शांति बनाए रखने, नई हॉटलाइन और कमांडर बैठकें करने पर भी बात हो सकती है.BRICS की इतनी चर्चा इसलिए हो रही है, क्योंकि ग्लोबल ऑर्डर में ये संगठन बहुत भारी पड़ने लगा है. एक अनुमान के अनुसार ब्रिक्स देश दुनिया की करीब 50 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करती है. .संख्या में ये लगभग 390 करोड़ है. क्षेत्रफल की बात करें तो 36 प्रतिशत हिस्सा ब्रिक्स देशों का है.. लगभग 4 करोड़ वर्ग किलोमीटर, इन देशों की GDP वैश्विक GDP का करीब 35 से 40 प्रतिशत है, जो 32 ट्रिलियन डॉलर है.इससे भी बड़ी बात अंतरराष्ट्रीय व्यापार के करीब 23 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व BRICS के सदस्य देश करते हैं.. इससे इसकी शक्ति और भारत की कूटनीतिक धमक का अंदाजा आप लगा सकते हैं.
