ब्राह्मणों के साथ मिलकर सत्ता तक पहुंचेगी मायावती,चुनाव से पहले बनाया नया प्लान
यूपी के चुनाव में ब्राह्मण समाज के सहारे सत्ता में वापसी का सपना देख रहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने जारी किए गए एक बयान में ब्राह्मण समाज से बसपा से जुड़ने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बसपा खासकर ब्राह्मण समाज को यह भी विश्वास दिलाना चाहती है कि वे अपनी पूरी मजबूती के साथ पार्टी से जुड़े रहें। उन्हें हर चुनाव में उनकी तैयारी के आधार पर उनकी भागीदारी यानी चुनावी उम्मीदवार बनाने और सरकार बनने पर सन 2007 की तरह ही उचित मान-सम्मान दिया जाएगा।जैसाकि सर्वविदित है कि बीएसपी ’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ की नीतियों एवं सिद्धान्त पर चलने वाली विशिष्ट पहचान वाली पार्टी है, जो किसी भी समाज के व्यक्ति विशेष से ज्यादा, परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के पवित्र संविधान की सच्ची मंशा के मुताबिक, सर्वसमाज के हित व कल्याण के लिये समर्पित है और इसीलिये पार्टी में नेताओं की नहीं बल्कि पूरे तन, मन, धन से समर्पित अम्बेडकरवादी कार्यकर्ताओं की ही फौज हर स्तर पर अधिकतर सक्रिय है।

यही मान्यवर कांशीराम जी द्वारा पार्टी व मूवमेन्ट के हित में स्थापित परम्परा भी है।इसीलिये ब्राह्मण समाज व अन्य सभी समाज के जो भी लोग अभी तक पार्टी से निकाले गये हैं या निकाले जा रहे हैं या वे अपने निजी स्वार्थ में दूसरी पार्टियों में चले गये हैं या फिर वे अपने गलत कारनामों की वजह से उनसे बचने के लिये खासकर सत्ताधारी पार्टी में शामिल हो गये हैं, तो उनका पार्टी के प्रति समर्पण भाव लोगों की निगाह में भी उनके कार्यों के आकलन के आधार पर काफी सशंकित व निराशाजनक बना रहा है, क्योंकि खासकर बीएसपी सरकार के दौरान भी ऐसे लोगों ने अपने निजी व पारिवारिक स्वार्थ के लिए ही पार्टी से फायदा ज्यादा उठाया है और अपने समाज व पार्टी के हित के लिए वे लोग अधिकतर निष्क्रिय व उदासीन ही बने रहे हैं।इतना ही नहीं बल्कि इन्हीं सब कारणों से उन लोगों ने अपने समाज को भी सही से बीएसपी में नहीं जोड़ा है, जो कि पार्टी की अपेक्षा के विरुद्ध इनका यह सब कृत्य होने की वजह से पिछले कई लोकसभा व विधानसभा आमचुनावों में पार्टी को काफी नुकसान भी उठाना पड़ा है, जो किसी से भी छिपा हुआ नहीं है।किन्तु उसके बाद से पार्टी में लम्बे अरसे से ईमानदार व हर मामले में पार्टी के प्रति लगातार समर्पित एवं निष्ठावान चले आ रहे पार्टी के वरिष्ठ लोगों द्वारा आए दिन नये कर्मठ व ईमानदार लोगों व खासकर युवाओं को पार्टी की नर्सरी में तैयार किया जाता रहा है, जो यह अभियान पूरी तरह से जारी है।और अब वे लोग काफी हद तक पार्टी की अपेक्षा के अनुसार जी-जान से लगातार लगे हुये हैं। पार्टी को पूरी उम्मीद है कि ये सभी नये व पुराने लोग हर मामले में ज्यादा बेहतर, साफ-सुथरे व मिशनरी मानसिकता के बनकर उभरेंगे और वे सच्चे अम्बेडकरवादी एवं संविधानवादी संघर्ष के भरपूर तौर पर काम आयेंगे। इसके साथ ही, पार्टी खासकर ब्राह्मण समाज को यह भी विश्वास दिलाना चाहती है कि वे अपनी पूरी मज़बूती के साथ पार्टी से जुड़े रहें और उन्हें हर चुनाव में उनकी तैयारी के आधार पर उनकी भागीदारी यानी चुनावी उम्मीदवार बनाने तथा सरकार बनने पर सन 2007 की तरह ही इनको व अन्य सभी समाज को भी पूरा-पूरा उचित मान-सम्मान जरूर दिया जाता रहेगा। और सर्वसमाज आधारित ऐसी अपनी बीएसपी पार्टी को जमीनी स्तर पर तैयार करने के मामले में अब विशेषकर दलित समाज को ही अपनी अह्म भूमिका निभानी है। वैसे बीएसपी की नर्सरी, सर्वसमाज के हसीन गुलदस्तों से ही, अधिकतर हरी-भरी व सजी रहती है।दरअसल में पार्टी के कई कद्दावर ब्राह्मण नेता लगातार उनका साथ छोड़ते गए हैं। अंटू मिश्रा का निष्कासन इसकी ताजा कड़ी है। बीते एक दशक में कई ऐसे नेता बसपा से दूर हुए, जिन्होंने अपनी राजनीति का ककहरा हाथी पर सवार होकर सीखा था। यह कहना गलत न होगा कि बसपा की सियासी नर्सरी कद्दावर ब्राह्मण नेताओं से खाली होती जा रही है।वर्ष 2007 में बसपा ने 80 से अधिक ब्राह्मणों को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा था। इनमें 41 जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। पार्टी की यह सोशल इंजीनियरिंग इतनी सफल रही कि दूसरे दलों ने भी इसका अनुसरण किया। मगर वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव आते-आते ब्राह्मण नेताओं का पार्टी से मोहभंग शुरू हो गया। मौजूदा भाजपा सरकार के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक इसका प्रमुख उदाहरण हैं। बसपा ने उन्हें सांसद बनाया था लेकिन चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। बाद में यह फैसला उनके राजनीतिक भविष्य के लिए मुफीद साबित हुआ।पूर्व मंत्री नकुल दुबे ने 2022 में बसपा छोड़कर कांग्रेस का रुख किया। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय (अब दिवंगत), रंगनाथ मिश्रा तथा विनय शंकर तिवारी और उनका पूरा कुनबा भी बसपा से दूर हो गया। पूर्व विधान परिषद सभापति गणेश शंकर पांडेय समेत सरकार में उच्च पद पाने वाले कई अन्य ब्राह्मण नेता भी समय के साथ दूसरे दलों में चले गए।अंबेडकरनगर से बसपा सांसद व विधायक रहे राकेश पांडेय और उनके बेटे व बसपा सांसद रहे रितेश पांडेय भी पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं।अंटू मिश्रा समेत कई प्रमुख ब्राह्मण नेताओं के अलग होने से बसपा की इस समुदाय को जोड़ने की मुहिम को झटका लगा है। अब इसकी पूरी जिम्मेदारी राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के कंधों पर है। संगठन में वही प्रमुख ब्राह्मण चेहरा रह गए हैं। वह लंबे समय से ब्राह्मण सम्मेलनों की अगुवाई करते रहे हैं। उनके बेटे कपिल मिश्रा और अन्य परिजन भी इन अभियानों में सहयोग करते रहे हैं। वर्ष 2007 से पहले सतीश चंद्र मिश्रा के कई परिजन भी बसपा में शामिल हुए थे।ब्राह्मणों का समर्थन हासिल करने के लिए बसपा ने बिकरू कांड की आरोपी खुशी दुबे का मुकदमा लड़ने की कवायद की थी। वर्ष 2021 में पार्टी ने ब्राह्मण सम्मेलन भी किया। मायावती समय-समय पर भाजपा सरकार पर ब्राह्मणों की उपेक्षा का आरोप लगाती रही हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी ने पहला प्रत्याशी भी ब्राह्मण बनाया और इसके बाद सादाबाद सीट से भी ब्राह्मण उम्मीदवार घोषित किया। इसके बावजूद दूसरे दलों के बड़े ब्राह्मण नेता बसपा में आने से कतरा रहे हैं।अंटू मिश्रा दो वर्ष पूर्व अचानक भाजपा प्रदेश कार्यालय आए थे, जिसके बाद हड़कंप मच गया था। वह मार्च, 2024 में भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने वाले बसपा के एक नेता के साथ पहुंचे थे, हालांकि उनको सदस्यता ग्रहण नहीं कराई गई थी। उस दौरान भाजपा नेताओं ने अंटू मिश्रा को दिल्ली में सदस्यता ग्रहण कराए जाने का बयान दिया था। हालांकि उन्हें भाजपा में शामिल करने का फैसला नहीं हो सका।
