जिन्ना ने चालाकी से बुना था बलूचिस्तान पर नियंत्रण का जाल,जानें कैसे चली थी दांव?
भारत को 15 अगस्त, 1947 को आजादी मिल गई थी, लेकिन यह विभाजन के साथ आई थी. पाकिस्तान 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है और आधी रात को मिली आजादी का जश्न भारत 15 तारीख को मनाता है. लेकिन पाकिस्तान के ही बलूचिस्तान प्रांत में बड़ी संख्या में ऐसे विद्रोही हैं, जो 11 अगस्त को अपना अलग स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं. वे मानते हैं कि बलूचिस्तान अलग मुल्क है और फिलहाल पाकिस्तान ने उस पर नियंत्रण कर रखा है. बलूचिस्तान में ही आने वाले कलात क्षेत्र के शासकों ने अंग्रेजों से एक संधि 11 अगस्त 1947 को की थी, जिसमें उन्हें स्वतंत्र रखने पर सहमति बनी थी. फिर पाकिस्तान ने धोखे से नियंत्रण कर लिया. लेकिन आज भी बलूच विद्रोही 11 अगस्त की वह तारीख नहीं भूले हैं और इसी के चलते आज भी उसी दिन अपना स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं.बलूचिस्तान के इस हाल के पीछे पाकिस्तान निर्माण कराने वाले मोहम्मद अली जिन्ना की वादाखिलाफी है. दिलचस्प तथ्य यह है कि मोहम्मद अली जिन्ना कलात के शासकों जिन्हें कलात के खान कहा जाता था के कानूनी सलाहकार थे. 1946 में कैबिनेट मिशन के समक्ष जिन्ना ने ही कलात के खान का पक्ष रखा था और कहा कलात को एक स्वतंत्र एवं संप्रभु राज्य बताया था. यह भी कहा था कि कलात राज्य स्वतंत्र है, इसलिए उसे भारतीय संघ में शामिल करने पर सहमति नहीं बन सकती.

तीसरी और सबसे अहम बात जिन्ना ने यह कही थी कि ब्रिटिश सरकार से संधि खत्म होने के बाद कलात राज्य अपनी पूर्ण स्वतंत्रता की स्थिति में आ जाएगा. यही नहीं स्वतंत्रता से कुछ दिन पहले ही 4 अगस्त, 1947 को एक गोलमेज सम्मेलन हुआ था. इसमें कलात के खान, ब्रिटिश प्रतिनिधि और पाकिस्तान की मांग करने वाले जिन्ना और लियाकत अली खान मौजूद थे. इसमें सहमति बनी थी कि कलात को 5 अगस्त, 1947 को ही स्वतंत्रता मिल जाएगी और उसे वही दर्जा मिल जाएगा, जो उसे 1838 में प्राप्त था. लेकिन चीजें बदलती चली गईं. 5 अगस्त को कलात को आजादी नहीं मिली और उसने पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद 15 अगस्त को अपनी स्वतंत्रता का ऐलान किया था. उससे पहले 11 अगस्त को उसने अंग्रेजों के साथ एक संधि की थी. लेकिन पाकिस्तान बनाने वाले जिन्ना और लियाकत अली खान की नीयत बदल चुकी थी. पाकिस्तान ने कहा कि कलात के संबंध में रक्षा, विदेश और संचार के मामलों में हम फैसले लेंगे. इस संबंध में कोई विवाद है तो कराची में वार्ता होगी. यहीं से चीजें बदलने लगीं और कहा जाता है कि ऐसा अंग्रेजों के चलते ही हुआ. उनकी राय पाकिस्तान को यह थी कि कलात को यदि स्वतंत्र रखा तो वह भारत के करीब जा सकता है और ऐसी स्थिति पाकिस्तान के अनुकूल नहीं होगी. इसको लेकर बलूचिस्तान के तत्कालीन नेता गौस खान बिजेंजो ने महत्वपूर्ण बात कही थी. उनका कहना था कि पाकिस्तान आर्थिक रूप से खुद को बनाए नहीं रख सकता. हमारे पास पेट्रोलियम, खनिज और बंदरगाह हैं. इसलिए हमारे ऊपर नियंत्रण चाहते हैं. सवाल यही है कि हमारे बिना पाकिस्तान कहां होता?मोहम्मद अली जिन्ना ने बलूचिस्तान के साथ अपने धोखे को बहुत चालाकी से बुना था. बलूचिस्तान की सबसे बड़ी रियासत पर नियंत्रण से पहले उन्होंने धीरे-धीरे खारन, लासबेला और मकरान जैसे इलाकों का विलय कराया. फिर मार्च 1948 में कलात पर सैन्य कार्रवाई की धमकी देकर नियंत्रण करने की बात कही. अंत में हालात भांपते हुए कलात के खान ने 30 मार्च, 1948 को पाकिस्तान के साथ संधि कर ली. हालांकि बलूचों ने इसे स्वीकार नहीं किया. बलूच विद्रोहियों का कहना है कि उनका इतिहास 3,500 साल पुराना है. उनके इस इतिहास में किसी ने इस तरह का धोखा नहीं दिया था. पाकिस्तान ने समझौते के पहले ही दिन से रंग दिखाना शुरू कर दिया. पाकिस्तान ने ऐलान कर दिया कि कलात की अपनी कोई संप्रभुता नहीं होगी. कलात पर उतने ही अधिकार अब पाकिस्तान के होंगे, जितने कभी अंग्रेजों के होते थे. इस तरह बलूचिस्तान का सबसे बड़ा हिस्सा कलात पाकिस्तान का हिस्सा बन गया. बलूचिस्तान के इतिहास और उसकी आबादी से ज्यादा अहमियत उसके भूगोल की है. एक तरफ इसका लंबा समुद्री तट है तो वहीं जमीन तमाम कीमती खनिजों से भरपूर है. पूरे पाकिस्तान की महज 5 फीसदी आबादी ही यहां बसती है, लेकिन इसका क्षेत्रफल पाकिस्तान के कुल एरिया के 44 फीसदी के बराबर है. ईरान और अफगानिस्तान से सीधी सीमा लगती है और यहां से सीधे ईरान और मिडल ईस्ट तक जमीनी संपर्क बनता है. पाकिस्तान और चीन मिलकर ग्वादर पोर्ट यहीं तैयार कर रहे हैं. जो पाकिस्तान के साथ ही चीन के लिए भी अहम है. इसी से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान ने कैसे बलूचिस्तान के संसाधनों का दोहन किया है और पहले दिन से ही उसे इसी लालच के कारण अपने साथ विलय किया था.
