चंद्रशेखर आजाद के वजह से हुई भाजपा प्रत्याशी की हार,दतिया सीट पर ऐसे जीती कांग्रेस
मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव में बीजेपी उम्मीदवार आशुतोष तिवारी चुनाव हार गए हैं. कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने उन्हें चुनाव हराया है. तीसरे राउंड के बाद घनश्याम सिंह लगातार बढ़त बनाए हुए थे. लगातार 15 राउंड तक घनश्याम बढ़त बनाए रहे हैं और अंत में जीत हासिल करते हुए बीजेपी प्रत्याशी को हरा दिया. दतिया से चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव मंडल को 22527 वोट मिले हैं. वे तीसरे नंबर पर रहे.चुनाव में कांग्रेस को 42.39 प्रतिशत, भाजपा को 38.57 प्रतिशत तो तीसरे प्रत्याशी दामोदर यादव को 14.3 प्रतिशत वोट मिले. कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह दतिया से तीसरी बार विधायक बने हैं. वह पहले भी दो बार विधायक रह चुके हैं. उन्हें 66757 हजार से अधिक वोट मिला है. कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह 6016 वोटों से जीत हासिल की है. दतिया से इस बार बीजेपी उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को 60741 वोट मिले हैं. उन्हें 6016 वोटों से हार का सामना करना पड़ा है.इससे पहले दतिया सीट से नरोत्तम मिश्रा से जीतते रहे हैं. लेकिन इस बार उनका टिकट काटकर बीजेपी ने आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी बनाया था. लेकिन बीजेपी को दतिया सीट पर नरोत्तम मिश्रा दरकिनार करने का खामियाजा भुगतना पड़ा. सूत्रों के मुताबिक, नरोत्तम के समर्थक इसे बीजेपी की हार बता रहे हैं. उनका कहना है कि नरोत्तम अगर चुनाव लड़ते तो आराम से जीत जाते थे.इस चुनाव में कुल 21 उम्मीदवार मैदान में थे.

बीजेपी ने मौजूदा विधायक नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को टिकट दिया था, जबकि कांग्रेस की तरफ से घनश्याम सिंह ने चुनाव लड़ा. इनके अलावा, 19 और उम्मीदवार भी अपनी किस्मत आजमा रहे थे. दतिया में 71.44 प्रतिशत मतदान हुआ. एक समय ऐसा लगा कि घनश्याम सिंह की अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी पर 12,607 वोटों की बढ़त को पार करना मुश्किल होगा, हालांकि बीजेपी उम्मीदवार ने आखिरी राउंड में इस अंतर को थोड़ा कम कर लिया.दतिया विधानसभा उपचुनाव में जीत के बाद, कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह को जीत का प्रमाण पत्र मिला. उन्होंने दतिया की जनता का आभार व्यक्त किया और उनके भारी समर्थन को स्वीकार किया. उन्होंने कहा कि हालांकि राजेंद्र भारती अकेले चुनाव न तो जीत सकते थे और न ही हार सकते थे, लेकिन पार्टी के भीतर हुई गड़बड़ी ने वोटों के अंतर को कम कर दिया, वरना जीत और भी बड़ी होती.उन्होंने इस जीत का श्रेय लोगों के स्नेह को दिया और कहा कि इससे पूरे देश में यह संदेश जाएगा कि दतिया से ही बीजेपी के पतन की शुरुआत हो रही है. उन्होंने 2028 के चुनावों में जीत का भरोसा जताते हुए कहा कि दतिया में बना राजनीतिक माहौल पूरे राज्य और देश में गूंजेगा.नरोत्तम मिश्रा वर्षों से दतिया की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं.टिकट कटने के बाद पार्टी के एक वर्ग में असंतोष देखने को मिला. कई स्थानीय कार्यकर्ताओं और समर्थकों में उत्साह पहले जैसा नहीं दिखा, जिसका असर चुनावी अभियान और मतदान दोनों पर दिखाई दिया.भाजपा ने इस बार आशुतोष तिवारी पर दांव लगाया, लेकिन वे चुनाव में अपेक्षित जनस्वीकार्यता हासिल नहीं कर सके. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्र में उनकी पहचान और प्रभाव नरोत्तम मिश्रा जैसे स्थापित नेता के मुकाबले सीमित रहा. ऐसे में उम्मीदवार की व्यक्तिगत लोकप्रियता भी भाजपा के लिए चुनौती बन गई.भाजपा की हार का एक बड़ा कारण अंदरूनी गुटबाजी भी माना जा रहा है. टिकट वितरण के बाद पार्टी के कई स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रियता पहले जैसी नहीं रही. संगठनात्मक स्तर पर एकजुटता की कमी का असर बूथ प्रबंधन से लेकर मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति पर पड़ा. चुनाव में यह संदेश भी गया कि भाजपा का पूरा संगठन एकजुट होकर मैदान में नहीं उतर पाया.मतदान प्रतिशत और भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक का प्रदर्शन भी पार्टी के लिए चिंता का विषय रहा. माना जा रहा है कि भाजपा के कोर वोटरों का एक हिस्सा मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचा या अपेक्षित उत्साह नहीं दिखा. इसका संकेत इस बात से भी मिलता है कि पार्टी के कुछ मजबूत बूथों पर भी प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा. इससे भाजपा को सीधा चुनावी नुकसान हुआ.जातीय और सामाजिक समीकरणों ने भी चुनाव परिणाम को प्रभावित किया. नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिलने से सवर्ण वर्ग के एक हिस्से में नाराजगी की चर्चा रही. इसके अलावा स्थानीय सामाजिक संतुलन और विभिन्न समुदायों के मतदान पैटर्न ने भी भाजपा की चुनावी संभावनाओं को कमजोर किया. उपचुनाव में स्थानीय समीकरण अक्सर निर्णायक भूमिका निभाते हैं और इस बार भी ऐसा ही देखने को मिला।
