प्रशांत किशोर के लिए आसान नहीं है बांकीपुर की राह,चौपट हो जाएगा सियासी भविष्य!

 प्रशांत किशोर के लिए आसान नहीं है बांकीपुर की राह,चौपट हो जाएगा सियासी भविष्य!
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प्रशांत किशोर बांकीपुर उपचुनाव के मैदान में उतरे हैं. यह उनका पहला चुनाव है. जीत के लिए पीके ने पूरी ताकत झोंक दी है. एक तरफ पीके डोर टू डोर कैंपेन कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ बांकीपुर उपचुनाव को प्रशांत किशोर सम्राट सरकार के खिलाफ जनमत संग्रह बता रहे हैं. पीके की कोशिश किसी भी तरह से इस उपचुनाव में जीतने की है. ताकि, उनकी सियासत बिहार में आगे बढ़ सके.क्योंकि, बिहार में उपचुनाव में हार के बाद कई ऐसे नेताओं का सियासी करियर खत्म हो गया, जो अपने वक्त में काफी मजबूत माने जाते थे. ऐसे ही नेताओं की कहानी पढ़िए…प्रशांत किशोर शाही यानी पीके शाही की एक वक्त में बिहार की सियासत में तूती बोलती थी. उन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का करीबी माना जाता था. 2010 से 2015 तक पीके शाही बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री रहे, लेकिन एक उपचुनाव में हार ने पीके शाही के सियासी करियर पर ग्रहण लगा दिया.

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दरअसल, 2013 में राष्ट्रीय जनता दल के तत्कालीन सांसद उमाशंकर सिंह के निधन के बाद महाराजगंज सीट पर उपचुनाव कराया गया. लालू यादव ने यहां से उमाशंकर सिंह को उम्मीदवार बनाया. जेडीयू की ओर से इस चुनाव में तत्कालीन शिक्षा मंत्री पीके शाही को मैदान में उतारा गया.प्रभुनाथ सिंह ने इस सीट पर शाही को पटखनी दे दी. इसके बाद शाही सियासत में ज्यादा टिक नहीं पाए. 2015 के बाद से पूरी तरह साइडलाइन हैं. अब पटना में अपनी वकालत पर फोकस कर रहे हैं.वैशाली की पूर्व सांसद सतेंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा का राजनीतिक करियर भी उपचुनाव की वजह से बर्बाद हो गया. दरअसल, बिहार के वैशाली लोकसभा सीट पर साल 1994 में उपचुनाव कराए गए. इस उपचुनाव में आनंद मोहन ने अपनी पत्नी को उतार दिया.उस वक्त बिहार में लालू यादव की सरकार थी. आनंद मोहन ने इस चुनाव को लालू यादव से जोड़ दिया, जिसके बाद लवली आनंद को हराने के लिए लालू ने किशोरी सिन्हा को उम्मीदवार बनाया. हालांकि, इस चुनाव में किशोरी सिन्हा को जीत नहीं मिली. इसके बाद उनके राजनीतिक करियर पर ब्रेक लग गया. राम नरेश पांडे बिहार में कम्युनिष्ट के बड़े नेता माने जाते हैं. 2015 में हरलाखी विधानसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई. यह सीट उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा के विधायक के निधन से रिक्त हुई थी. राम नरेश को यहां से जीत की उम्मीद थी, लेकिन भीतर घात के कारण वे चुनाव हार गए. इसके बाद राम नरेश कोई चुनाव नहीं जीत पाए.नीतीश सरकार में मंत्री रहीं बीमा भारती ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले जेडीयू का दामन छोड़ दिया. 2024 के लोकसभा चुनाव में वह पूर्णिया सीट से आरजेडी के टिकट पर मैदान में उतरीं, लेकिन उनकी जमानत जब्त हो गई. इसके बाद रूपौली विधानसभा सीट के उपचुनाव में भी उन्हें आरजेडी ने सिंबल दिया, लेकिन इस चुनाव में भी उन्हें सफलता नहीं मिली. इसके बाद बीमा भारती साइडलाइन हो गईं.प्रशांत किशोर अभी विपक्ष का हिस्सा भी नहीं हैं. उनके सामने एक ओर एनडीए है, तो दूसरी ओर आरजेडी. बांकीपुर सीट के जरिए पीके की कोशिश आरजेडी को तीसरे नंबर पर धकेलने की है. अगर वे इसमें नाकाम रहते हैं, तो इसका सियासी असर होगा.इतना ही नहीं, चुनाव से पहले केसी सिन्हा जैसे बड़े नेताओं ने पीके का साथ छोड़ दिया है. पीके चुनाव में हारते हैं तो पार्टी में भगदड़ मच सकती है.जनसुराज पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ रहे प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर की राह आसान नहीं है. 2025 के चुनाव में इस सीट पर बीजेपी के नितिन नबीन ने जीत हासिल की थी. नितिन नबीन अब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. 2025 के चुनाव में नितिन नबीन ने आरजेडी उम्मीदवार को हराया था.जनसुराज के उम्मीदवार को इस सीट पर 7700 के करीब मत मिले थे. बीजेपी ने यहां पर पीके के खिलाफ एक साधारण कार्यकर्ता को मैदान में उतारा है. नीरज भारती यहां से पीके के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं. पार्टी की कोशिश एक साधारण कार्यकर्ता से पीके को मात दिलाने की है.

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