सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान का तेवर गर्म,भारत के फैसले से आगे किसे होगा नुकसान?

 सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान का तेवर गर्म,भारत के फैसले से आगे किसे होगा नुकसान?
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आजादी के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुए, तनाव बढ़ा और आतंकी हमलों ने कई बार राजनयिक संबंधों को खराब कर दिया. दोनों देशों के बीच दुश्मनी कई बार बढ़ी, सरकारें बदलीं, सैन्य नेतृत्व बदला लेकिन एक समझौता हमेशा बरकरार रहा और वो था सिंधु जल संधि. लेकिन पिछले साल जब भारत सरकार ने ये जल संधि रोक दी तो पूरी पाकिस्तानी हुकूमत बौखला गई. पाकिस्तान के कई इलाकों में पानी की कमी हो गई. यह केवल जल संधि नहीं है बल्कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए. खासकर भारत में पाकिस्तान-समर्थित आतंकी हमलों के खिलाफ एक कठोर कार्रवाई के तौर पर. यह समझने के लिए कि यह पल इतना अहम क्यों है, हमें उन उथल-पुथल भरे दिनों में वापस जाना होगा जब भारत से अलग होकर पाकिस्तान बना था.अगस्त 1947 की आधी रात को दो देश बने. लेकिन नदियां राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानतीं. विशाल सिंधु और उसकी सहायक नदियां सदियों से इस इलाके में बहती रही थीं और आधुनिक देशों के बनने से बहुत पहले दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक को जिंदा रखे हुए थीं.सिंचाई की कई नहरों को कंट्रोल करने वाले हेडवर्क्स भारत में थे, जबकि लाखों एकड़ खेती की जमीन तक पानी पहुचाने वाला नहरों का बड़ा नेटवर्क पाकिस्तान में था. नए पड़ोसियों को एक ऐसा नदी तंत्र मिला जिसे कोई भी अकेले कंट्रोल नहीं कर सकता था.

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तुरंत रुकावट को रोकने के लिए, दोनों देशों ने एक अस्थायी ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ पर दस्तखत किए, जिससे पानी पहले की तरह बहता रहा.सिंधु नदी तंत्र पर कंट्रोल का असली महत्व अप्रैल 1948 में हुई घटनाओं से समझा जा सकता है, जब यह समझौता खत्म हो गया. तत्कालीन पूर्वी पंजाब राज्य सरकार, जिसकी अगुवाई मुख्यमंत्री गोपीचंद भार्गव कर रहे थे ने कुछ नहरों से पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोक दिया. कई हफ्तों तक, भारत ने अपर बारी दोआब नहर को पानी देने वाले हेडवर्क्स को बंद रखा, जो ब्रिटिश शासन से मिले आपस में जुड़े सिंधु नदी तंत्र का एक अहम हिस्सा थी. जाहिर है, इस कदम से पाकिस्तान सरकार घबरा गई.हालांकि, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इससे सहमत नहीं थे और उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री भार्गव को पत्र लिखा कि भारत द्वारा पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) को पानी की सप्लाई रोकने से कोई समझौता नहीं होगा, बल्कि इससे हालात बेकाबू हो सकते हैं और शायद युद्ध भी हो सकता है. पंजाब के मुख्यमंत्री भार्गव को लिखे एक पत्र में उन्होंने सुझाव दिया कि मौजूदा हालात में हमारे इंजीनियर जितनी जल्दी उन तरीकों से समस्या को हल करेंगे जो पहले ही सुझाए जा चुके हैं, उतना ही बेहतर होगा.आखिरकार, भारत और पाकिस्तान दोनों 4 मई 1948 के इंटर-डोमिनियन समझौते पर सहमत हुए. इस समझौते के तहत, भारत को बेसिन के पाकिस्तानी हिस्सों को पानी देना था और इसके बदले में सालाना पेमेंट मिलना था. यह एक अस्थायी उपाय था और मकसद आगे बातचीत करके कोई स्थायी समाधान निकालना था.बातचीत और सीजफायर के बाद मई 1948 में पानी की सप्लाई फिर से शुरू हो गई, लेकिन इस घटना ने कुछ ऐसा दिखाया जिसने दशकों तक दक्षिण एशिया की जियोपॉलिटिक्स को प्रभावित किया.1951 में अमेरिकी राजनेता डेविड लिलिएंथल ने सुझाव दिया कि भारत और पाकिस्तान नदियों के मामले को राजनीतिक विवाद के तौर पर देखने के बजाय एक इंजीनियरिंग चुनौती के तौर पर देखें और इसमें वर्ल्ड बैंक मध्यस्थ की भूमिका निभाए. वर्ल्ड बैंक ने दोनों देशों के इंजीनियर, इकोनॉमिस्ट, डिप्लोमैट और पानी के एक्सपर्ट इकट्ठा किए. इसके बाद लगभग नौ साल तक मेहनत से बातचीत चली. हर नदी, हर नहर, हर स्टोरेज स्ट्रक्चर और हर इंजीनियरिंग डिजाइन टेक्निकल बहस का विषय बन गया.आखिरकार 19 सितंबर 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रेसिडेंट अयूब खान ने कराची में सिंधु जल संधि पर साइन किए, जिसमें वर्ल्ड बैंक ब्रोकर था. हर नदी को बांटने के बजाय, संधि ने नदी सिस्टम को बांट दिया. भारत को तीन पूर्वी नदियां रावी, ब्यास और सतलुज पर खास अधिकार मिले. पाकिस्तान को तीन पश्चिमी नदियां सिंधु, झेलम और चिनाब मिलीं.भारत को दी गई पूर्वी नदियां हर साल लगभग 33 मिलियन एकड़-फीट (MAF) पानी ले जाती हैं. पाकिस्तान को दी गई पश्चिमी नदियां लगभग 135 MAF पानी ले जाती हैं. असल में पाकिस्तान को सिंधु नदी सिस्टम का लगभग 80 परसेंट पानी मिला, जबकि भारत ने लगभग 20 परसेंट पानी अपने पास रखा.आम सोच के उलट, भारत को इस संधि से और पानी नहीं मिला. जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों का बिना रोक-टोक इस्तेमाल करने दिया. भारत को अपने इलाके में उन पश्चिमी नदियों का सिर्फ लिमिटेड इस्तेमाल करने की इजाजत थी. इस संधि ने परमानेंट सिंधु कमीशन भी बनाया, जिससे यह पक्का हुआ कि दोनों देशों के अधिकारी रेगुलर मिलते रहेंगे, भले ही दूसरी जगहों पर डिप्लोमैटिक रिश्ते खराब हों.इस संधि का सबसे कम चर्चा वाला प्रावधान ही सबसे अजीब था. नदी के बंटवारे के बाद भारत पाकिस्तान को नहरें और पानी का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करने के लिए लगभग 62 मिलियन पाउंड देने पर राजी हुआ. यह इंटरनेशनल डिप्लोमेसी में सबसे कम उदाहरणों में से एक है, जहां नदी के ऊपरी हिस्से पर रहने वाले देश ने न सिर्फ नदी सिस्टम का बड़ा हिस्सा दे दिया, बल्कि निचले हिस्से पर रहने वाले देश के लिए उस पानी का इस्तेमाल करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को भी फाइनेंस किया. जब इस पर साइन हुए, तो भारत के कई विपक्षी दलों ने इस संधि की आलोचना की और इसे अलग-अलग और गलत बताया.

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