यूपी में पूर्वांचल क्यों बना बिहार की पार्टियों का पसंदीदा?JDU ने शुरू की चुनावी तैयारी

 यूपी में पूर्वांचल क्यों बना बिहार की पार्टियों का पसंदीदा?JDU ने शुरू की चुनावी तैयारी
Sharing Is Caring:

बिहार में ‘भारतीय जनता पार्टी’ और ‘जनता दल यूनाइटेड’ एनडीए के दो प्रमुख सहयोगी दल हैं. मुख्यमंत्री की कुर्सी को नीतीश कुमार ने बीजेपी को सौंप दिया है और जेडीयू बिहार सरकार में अहम भागीदार है. केंद्र में भी दोनों दल एक साथ मजबूती से खड़े हैं. ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि जब बिहार में दोनों दल एक-दूसरे के पूरक हैं, तो बीजेपी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जेडीयू के साथ चुनावी गठबंधन करने से क्यों बचती है?2022 के विधानसभा चुनाव में भी जेडीयू ने बीजेपी के साथ गठबंधन की इच्छा जताई थी, लेकिन बात नहीं बनी. इसके बाद पार्टी ने 20 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा और एक भी सीट नहीं जीत सकी. अब 2027 के चुनाव से पहले जेडीयू फिर 25 सीटों पर तैयारी कर रही है और इस बार भी एनडीए के बैनर तले चुनाव लड़ने की उम्मीद लगाए हुए है.सवाल यही है—क्या बीजेपी को यूपी में जेडीयू की जरूरत है? या फिर राजनीतिक गणित जेडीयू से दूरी बनाए रखने के लिए मजबूर करता है? क्या वो अड़चन है जो केंद्र और बिहार के फ्रेंडली पार्टनर को यूपी में एक साथ आने पर दिक्कतें हो रही हैं? इन सभी सवालों के जवाब हम यहां तलाशेंगे.यूपी में कुर्मी मतदाताओं की संख्या 6 फीसदी के लगभग है.

1000782771

कुर्मी वोटबैंक में पटेल, वर्मा, चौधरी, सचान, गंगवार जैसे सरनेम वाले लोग आते हैं. ओबीसी की बात करें तो इनकी संख्या 35 फीसदी है. ये संख्या इतनी है कि उत्तर प्रदेश की कुल 10 लोकसभा सीटों पर असर डालती है. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कुल 41 कुर्मी विधायक बने थे जिसमें 27 NDA से थे और 13 सपा गठबंधन के पाले में गया था.उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर जेडीयू ने संगठनात्मक गतिविधियां तेज कर दी हैं. पार्टी के यूपी प्रभारी एवं बिहार सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार लगातार उत्तर प्रदेश का दौरा कर रहे हैं. सदस्यता अभियान की समीक्षा की जा रही है और करीब 25 सीटों पर मजबूत तैयारी का दावा किया जा रहा है.जेडीयू का कहना है कि उसकी पहली प्राथमिकता बीजेपी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ना है. पार्टी का मानना है कि एनडीए के साथ रहकर ही बेहतर परिणाम मिल सकते हैं. हालाकि, जेडीयू ने 2022 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के साथ गठबंधन की भरपूर कोशिश की थी, लेकिन बातचीत सफल नहीं हुई. इसके बाद पार्टी ने 20 सीटों पर उम्मीदवार उतारे.जेडीयू ने अपने उम्मीदवार 2022 के चुनाव में उतार दिए लेकिन नतीजा बेहद निराशाजनक रहा. किसी भी सीट पर जीत तो दूर, लगभग सभी उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा सके. यही कारण है कि इस बार पार्टी अकेले चुनाव लड़ने के बजाय गठबंधन की रणनीति पर अधिक जोर दे रही है.राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में इसकी सबसे बड़ी वजह उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति है. जेडीयू की सबसे बड़ी पहचान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व और कुर्मी समाज में उनकी स्वीकार्यता रही है. बिहार में इसका लाभ पार्टी को मिलता रहा है, लेकिन उत्तर प्रदेश में बीजेपी पहले से ही कुर्मी वोट बैंक को साधने की मजबूत रणनीति बना चुकी है.बीजेपी वर्षों से अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल (एस) के साथ गठबंधन में है. इसके अलावा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी भी ओबीसी और कुर्मी समाज से आते हैं. ऐसे में बीजेपी को लगता है कि कुर्मी वोटों के लिए उसके पास पहले से पर्याप्त सामाजिक प्रतिनिधित्व मौजूद है. इसी वजह से जेडीयू को शामिल करने से राजनीतिक लाभ कम और सीटों का नुकसान ज्यादा हो सकता है.उत्तर प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर कुर्मी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. विशेष रूप से पूर्वांचल और प्रयागराज क्षेत्र की कई सीटों पर यह वोट बैंक जीत-हार तय करता है. इसी सामाजिक समीकरण को देखते हुए जेडीयू लंबे समय से यूपी में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है.उत्तर प्रदेश की बिहार सीमा से लगी करीब 38 विधानसभा सीटें हमेशा बिहार की पार्टियों के लिए आकर्षण का केंद्र रही हैं. पूर्वांचल के इन इलाकों में सामाजिक, भाषाई और पारिवारिक संबंध काफी मजबूत हैं. यही वजह है कि जेडीयू इस क्षेत्र को अपनी राजनीतिक विस्तार की सबसे बड़ी संभावना मानती है. पार्टी फिलहाल 25 से 30 सीटों का आंतरिक चयन कर चुकी है, हालांकि अंतिम सूची समीक्षा के बाद तय होगी. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भी नीतीश कुमार के फूलपुर सीट से चुनाव लड़ने की चर्चा तेज हुई थी, क्योंकि वहां कुर्मी मतदाताओं की संख्या काफी प्रभावशाली मानी जाती है.जेडीयू नेतृत्व लगातार दावा कर रहा है कि इस बार बातचीत सकारात्मक होगी. श्रवण कुमार का कहना है कि पार्टी एनडीए के हिस्से के रूप में ही चुनाव लड़ना चाहती है और बीजेपी के साथ सीट बंटवारे पर बातचीत होगी. लेकिन अंतिम फैसला पूरी तरह बीजेपी के हाथ में है. उत्तर प्रदेश बीजेपी पहले से कई सहयोगी दलों के साथ सामाजिक संतुलन बनाकर चल रही है. यदि जेडीयू को सीटें दी जाती हैं तो इसका सीधा असर सहयोगी दलों की हिस्सेदारी पर पड़ेगा. सबसे अधिक दबाव अपना दल (एस) जैसी पार्टियों पर आ सकता है, जिनका आधार भी कुर्मी समाज ही है. ऐसे में बीजेपी बिना स्पष्ट चुनावी लाभ के नया सहयोगी जोड़ने का जोखिम शायद ही उठाना चाहे.सिर्फ जेडीयू ही नहीं, बल्कि लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी उत्तर प्रदेश चुनाव में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है. पार्टी का दावा है कि पूर्वांचल की कई सीटों पर दलित मतदाताओं के बीच उसका प्रभाव है और वह भी बीजेपी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ना चाहती है. इससे बीजेपी के सामने सहयोगी दलों के बीच सीटों का संतुलन बनाना और चुनौतीपूर्ण हो सकता है. पूर्वांचल के 28 जिलों का सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ता बिहार से जुड़ा हुआ है. भोजपुरी भाषी क्षेत्र होने के कारण दोनों राज्यों के लोगों के बीच पारिवारिक और आर्थिक संबंध भी मजबूत हैं. इसी वजह से बिहार की लगभग सभी प्रमुख पार्टियां समय-समय पर उत्तर प्रदेश के इस क्षेत्र में संगठन विस्तार की कोशिश करती रही हैं.राजनीतिक विश्लेषक अरुण पांडे का कहना है कि बीजेपी केवल उसी सहयोगी को साथ रखती है जिससे उसे चुनावी लाभ मिलता हो. उनके अनुसार उत्तर प्रदेश में बीजेपी पहले से कुर्मी समाज के मजबूत प्रतिनिधित्व के साथ मौजूद है. ऐसे में जेडीयू को शामिल करने की जरूरत तभी महसूस होगी जब पार्टी किसी खास क्षेत्र में बीजेपी को अतिरिक्त राजनीतिक फायदा दिला सके.उत्तर प्रदेश में जेडीयू की राजनीति पूरी तरह नीतीश कुमार की कुर्मी पहचान और पूर्वांचल के सामाजिक समीकरणों पर टिकी है. दूसरी ओर बीजेपी पहले से अपना दल (एस), अपने ओबीसी नेतृत्व और मजबूत संगठन के सहारे इसी वोट बैंक में मजबूत पकड़ होने का दावा करती है.यही वजह है कि 2022 की तरह इस बार भी गठबंधन का फैसला केवल जेडीयू की इच्छा से नहीं होगा. यदि बीजेपी को लगेगा कि जेडीयू को साथ लेने से चुनावी फायदा होगा, तभी सीट शेयरिंग संभव होगी. अन्यथा जेडीयू को एक बार फिर सीमित विकल्पों के साथ चुनावी मैदान में उतरना पड़ सकता है. उत्तर प्रदेश में एनडीए की अंतिम तस्वीर अब पूरी तरह बीजेपी की राजनीतिक रणनीति पर निर्भर करेगी. यूपी में वोट बैंक और सामाजिक समीकरण को लेकर बीजेपी 2017 से ही मैदान में है. ऐसे में इसको लेकर बीजेपी कोई समझौता करना नहीं चाहेगी. इसके पीछे सहयोगियों की पॉलिटिक्स को भी महफूज रखने की गारंटी भी एक वजह हो सकती है. एक ही आधार पर दो पार्टियों का आना दोनों दलों के लिए घातक हो सकता है ऐसे में बीजेपी और उसके सहयोगी दल ये नहीं चाहेंगे कि जमा-जमाया खेल यूपी में बिगड़ जाए. वैसे पूरा फैसला केंद्रीय नेतृत्व और उसके घटक दलों को मिलकर करना है.

Comments
Sharing Is Caring:

Related post