भारत को ईरान ने आखिर क्यों दिया न्यौता?समझिए पूरी अंदर की कहानी
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है. यह जानकारी बुधवार को कूटनीतिक सूत्रों ने दी.अंतिम संस्कार की रस्में 5 से 9 जुलाई तक होंगी. पीएम मोदी को न्योता देने के बारे में नई दिल्ली से कोई कन्फर्मेशन नहीं आया है. खामेनेई, जिन्होंने तीन दशकों तक ईरान पर शासन किया, 28 फरवरी को मारे गए, जो तेहरान पर बड़े पैमाने पर अमेरिका और इजराइली हवाई हमलों का पहला दिन था. कूटनीतिक सूत्रों ने बताया कि भारतीय प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने दफनाने की रस्मों में बुलाया है.खामेनेई के सम्मान में 5 से 9 जुलाई के बीच कई धार्मिक और सरकारी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. इनमें 5, 6 और 7 जुलाई को तेहरान और कोम में विशेष समारोह होंगे, जबकि अंतिम श्रद्धांजलि कार्यक्रम 9 जुलाई को मशहद में आयोजित किया जाएगा.खामेनेई करीब तीन दशकों तक ईरान के सर्वोच्च नेता रहे. उनका निधन 28 फरवरी को हुआ था. उनके निधन के बाद यह पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय समारोह होगा, जिसमें दुनिया के कई देशों के नेताओं के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है.

भारत ईरान को अपना विस्तारित पड़ोसी मानता है. साथ ही दोनों देशों के बीच प्राचीन और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं. खामेनेई के निधन पर भारत सरकार ने गहरा शोक जताया था. पिछले साल मई 2024 में जब ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए थे, तब भारत ने एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया था और झंडे आधा झुका दिए गए थे. उस समय उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ईरान भेजे गए थे. हालांकि इस बार यह तय नहीं हुआ है कि भारत की ओर से कौन सा उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल समारोह में शामिल होगा. पश्चिम एशिया में 40 दिनों तक चले संघर्ष के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी नेतृत्व से आपस में लगातार संपर्क बनाए रखा. वहीं हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने नई दिल्ली आए थे. इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और एस. जयशंकर से द्विपक्षीय बैठक की थी.अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में खुलकर साथ नहीं देने पर अपने ही NATO सहयोगियों पर नाराजगी जाहिर की है. व्हाइट हाउस में NATO महासचिव मार्क रुटे के साथ बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को किसी की मदद की जरूरत नहीं थी, लेकिन सहयोगी देशों से कम से कम समर्थन और वफादारी की उम्मीद जरूर थी. ट्रंप ने कहा, ‘हमने ईरान को पहले ही हफ्ते में पूरी तरह तबाह कर दिया था. हमें किसी की मदद की जरूरत नहीं थी, लेकिन अच्छा लगता अगर हमारे सहयोगी कहते कि हम आपके साथ हैं.’ जब उनसे पूछा गया कि क्या यूरोपीय देशों ने अमेरिका का समर्थन किया, तो उन्होंने साफ जवाब दिया, ‘नहीं.’ट्रंप के आरोपों के बाद NATO महासचिव मार्क रुटे ने बचाव किया. उन्होंने कहा कि यूरोपीय देशों ने अमेरिका का पूरा साथ दिया था. रुटे ने ट्रंप के सामने ही कहा कि ईरान के खिलाफ छह सप्ताह तक चले सैन्य अभियान के दौरान यूरोप के सैन्य ठिकानों से 4,000 से 5,000 अमेरिकी विमान उड़ान भरते रहे. उन्होंने बताया कि रोमानिया के बुखारेस्ट एयरपोर्ट तक को कुछ समय के लिए आम उड़ानों के लिए बंद करना पड़ा, ताकि अमेरिकी सैन्य विमान आसानी से उड़ान भर सकें. रुटे ने कहा, ‘कुछ अलग घटनाएं जरूर हुई होंगी, जिनसे आप निराश हैं, लेकिन कुल मिलाकर यूरोपीय सहयोगी आपके साथ खड़े रहे।ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को सहयोगियों के पैसे की जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा, ‘हमारे पास दुनिया की सबसे ताकतवर सेना है. हमें सिर्फ वफादारी चाहिए. हम हमेशा उनके लिए लड़ते हैं, लेकिन बदले में थोड़ा समर्थन भी नहीं मिलता.’ रुटे ने बैठक के दौरान ‘ट्रंप ट्रिलियन’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए दावा किया कि ट्रंप के दबाव के कारण यूरोप और कनाडा ने रक्षा खर्च में करीब 1.2 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी की है. साथ ही अमेरिकी रक्षा कंपनियों को भी अरबों डॉलर के नए ऑर्डर दिए गए हैं।
