बीजेपी की आंधी रहेगी बरकरार,जान लीजिए कैसे बन गई नंबर 1?
2024 के लोकसभा चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई, तो राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि क्या गठबंधन सरकार के दौर में पार्टी का दबदबा घटने लगा है? लेकिन इसके बाद हुए राज्यों के विधानसभा चुनावों ने सारे राजनीतिक अनुमानों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।यह कहानी सिर्फ चुनाव जीतने भर की नहीं है. 1984 में महज 2 सीटों पर सिमटने वाली बीजेपी आज चार दशक बाद भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बन चुकी है. पार्टी का मौजूदा ‘पॉलिटिकल प्रोजेक्ट’ चुनावी जीत से कहीं आगे का है. बीजेपी अब राज्यों की जीत, क्षेत्रीय दलों के बिखराव और विपक्षी खेमे की बगावत को दिल्ली (संसद) में एक ऐसी स्थायी विधायी ताकत में बदल रही है, जिससे उसके लंबे समय से लंबित बड़े एजेंडे बिना किसी अड़चन के पास हो सकें.पिछले एक दशक में पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने संसद में प्रचंड बहुमत का स्वाद चखा।2014 में 282 सीटें और 2019 में रिकॉर्ड 303 सीटें जीतकर बीजेपी ने तीन दशकों में पहली बार पूर्ण बहुमत की गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई.2024 में बीजेपी 240 सीटों पर अटक गई, जिससे वह टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू और जेडीयू के नीतीश कुमार जैसे सहयोगियों पर निर्भर हो गई.बीजेपी लीडरशिप यह बखूबी जानती है कि सरकार चलाने के लिए सामान्य बहुमत काफी है, लेकिन ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’, महिला आरक्षण का क्रियान्वयन, यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) और भविष्य में होने वाले परिसीमन जैसे ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधनों के लिए संसद में भारी संख्या बल की जरूरत है. इसी नंबर गेम को साधने के लिए राज्यों में जीत बेहद जरूरी है।294 सदस्यों वाली विधानसभा में बीजेपी ने 208 सीटें जीतकर ममता बनर्जी की टीएमसी (TMC) के 15 साल पुराने शासन का अंत कर दिया. 2021 में महज 77 सीटों पर रहने वाली बीजेपी ने सीधे 130 से ज्यादा सीटें जोड़ीं, जबकि टीएमसी घटकर लगभग 80 सीटों पर आ गई.इस हार ने विपक्षी खेमे में बड़ा संकट पैदा कर दिया.

ऋताब्रत बनर्जी के बागी गुट की तरफ 58 से ज्यादा विधायक चले गए और लोकसभा में 19 से ज्यादा टीएमसी एनडीए के पाले में आने की चर्चाएं तेज हो गईं. इससे बीजेपी ने न केवल एक बड़ा राज्य जीता, बल्कि दिल्ली में विपक्ष की एक सबसे मुखर आवाज को कमजोर कर दिया।दशकों तक बिहार में बीजेपी, नीतीश कुमार की जेडीयू की जूनियर पार्टनर के रूप में काम करती रही. लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव ने इस समीकरण को पूरी तरह पलट दिया।एनडीए ने 243 सीटों वाली विधानसभा में आराम से 200 का आंकड़ा पार किया. इस चुनाव में बीजेपी ने जेडीयू के बराबर ताकत से चुनाव लड़ा और राज्य में अपनी मुख्य भूमिका तय की.परिसीमन के बाद संसद में बिहार जैसे राज्यों की राजनीतिक अहमियत और बढ़ने वाली है, ऐसे में पटना पर मजबूत पकड़ रखना दिल्ली के लिए दूरगामी स्ट्रैटेजी का हिस्सा है।भले ही बीजेपी और डीएमके के बीच वैचारिक रूप से बड़ा अंतर है, लेकिन राजनीति में मुद्दों के आधार पर सहयोग की संभावनाएं हमेशा खुली रहती हैं. संसद के दोनों सदनों में डीएमके का बड़ा प्रभाव है. ऐसे में बड़े संरचनात्मक सुधारों (महिला आरक्षण, वन नेशन वन इलेक्शन) को पास कराने के लिए बीजेपी भविष्य में डीएमके के साथ ‘मुद्दों के आधार पर’ बातचीत के चैनल खुले रख सकती है।2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के साथ-साथ महाराष्ट्र वह राज्य था जिसने बीजेपी को 300 सीटों के नीचे धकेलने में बड़ी भूमिका निभाई थी. वहां महाविकास अघाड़ी (MVA) ने बीजेपी-महायुति को कड़ी टक्कर दी थी।इस जीत के बाद उद्धव ठाकरे की सेना (UBT), शरद पवार की एनसीपी और कांग्रेस के कई नेताओं के पाला बदलने से जमीनी स्तर पर विपक्षी खेमा बेहद कमजोर हुआ है।
