सोमनाथ मंदिर पर क्यों आमने-सामने हुए थे नेहरू और डॉ राजेंद्र प्रसाद?जानिए इनसाइड स्टोरी

 सोमनाथ मंदिर पर क्यों आमने-सामने हुए थे नेहरू और डॉ राजेंद्र प्रसाद?जानिए इनसाइड स्टोरी
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1026 में महमूद गजनी के पहले हमले से लेकर 1706 में औरंगजेब के इसे नेस्तनाबूद करने के आखिरी फरमान बीच सोमनाथ का पवित्र मंदिर कितनी बार तोड़ा गया, इसकी तादाद तय करने में इतिहासकार भले मतभेद रखें लेकिन विदेशी आक्रांताओं की तलवारें, हिन्दुओं की इसमें श्रद्धा-आस्था को कभी खंडित नहीं कर सकीं. खंडहरों बीच भी अनवरत पूजा-अर्चना चलती रही. आस्था के दीप जलते रहे और घंटियां बजती रहीं. आजादी के बाद लौह पुरुष सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प किया. प्रारंभ में सब ठीक रहा. महाम्त्मा गांधी ने भी सहमति दी. लेकिन निर्माण पूर्ण होने तक गांधी जी और पटेल का निधन हो चुका था.प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू अपनी सरकार की धर्मनिरपेक्ष छवि को लेकर फिक्रमंद थे. उन्हें मंदिर के पुनर्निर्माण और प्राणप्रतिष्ठा का यह माकूल समय नहीं लग रहा था. उन्होंने पहले निर्माण कार्य की अगुवाई कर रहे मंत्री के.एम.मुंशी को रोका. प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के 11 मई 1951 को प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम में हिस्सेदारी पर लिखा-पढ़ी में ऐतराज किया. मुख्यमंत्रियों और अन्य को इससे दूर रहने के लिए कहा.कार्यक्रम की रेडियो पर कवरेज प्रतिबंधित की. ये कार्यक्रम प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच अप्रिय टकराव की वजह बना. उस ऐतिहासिक कार्यक्रम के 11 मई 2026 को 75 वर्ष पूरे हो गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस महत्वपूर्ण अवसर पर वहां उपस्थित रहेंगे. पढ़िए इतिहास के पन्नों से- पटेल के संकल्प से पुनर्निर्मित मंदिर के लोकार्पण तक की कहानी.सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को आज (11 मई) 75 वर्ष पूर हो गए हैं.13 नवंबर, 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल जूनागढ़ पहुंचे. एक विशाल जनसभा को संबोधित करने के बाद वे सोमनाथ मंदिर गए. मंदिर के खंडहरों को देखकर वे भावुक हो उठे और वहीं इसके पुनरुद्धार का संकल्प लिया. पटेल का यह निर्णय किसी पूर्व नियोजित राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था. उनके सहयोगी वी. पी. मेनन ने अपनी चर्चित किताब Integration Of The Indian States में लिखा है कि वहां जो कुछ हुआ, वह पूरी तरह स्वतःस्फूर्त था.सभा में उपस्थित जाम साहब ने तत्काल एक लाख रुपये दान देने की घोषणा की, जबकि सामलदास गांधी की अंतरिम सरकार ने इक्यावन हजार रुपये देने का संकल्प लिया. असलियत में पटेल की जूनागढ़ की यह यात्रा रियासत के भारत में विलय के विवाद के बीच हुई थी. मुस्लिम नवाब द्वारा शासित जूनागढ़ की बहुसंख्य आबादी हिंदू थी. नवाब ने जनभावनाओं के विपरीत रियासत के पाकिस्तान में विलय का प्रस्ताव किया था. जिन्ना ने इसे मंजूरी भी दे दी थी. नवाब के फैसले के खिलाफ जनता की जबरदस्त नाराजगी के बीच सरदार पटेल की पहल पर भारत ने पहल की और 8 नवंबर 1947 को जूनागढ़ का भारत में औपचारिक विलय हुआ. पवित्र सोमनाथ मंदिर इसी पूर्व रियासत के भूक्षेत्र में स्थित है.दिल्ली वापसी पर सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार का औपचारिक प्रस्ताव कैबिनेट के सामने रखा. तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की राय थी कि मंदिर को पुरातत्व विभाग के संरक्षण में दे दिया जाए और उसे ऐतिहासिक स्मारक की तरह संरक्षित किया जाए. लेकिन पटेल के प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दी.महात्मा गांधी भी इससे सहमत थे. हालांकि उनका सुझाव था कि मंदिर निर्माण में सरकारी धन का उपयोग न किया जाए और पूरा कार्य जनसहयोग से संपन्न हो. पटेल ने गांधी की सलाह को सहर्ष स्वीकार किया. इसके बाद पुनरुद्धार समिति गठित हुई और सरदार पटेल ने अपने विश्वस्त सहयोगी तत्कालीन खाद्य एवं कृषि मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी को उसका अध्यक्ष बनाया. मुंशी केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि साहित्यकार, संस्कृति प्रेमी और भारतीय इतिहास-बोध के प्रबल समर्थक थे. उन्होंने सोमनाथ पुनर्निर्माण कार्यक्रम को राष्ट्रीय सम्मान से जोड़ दिया.देश का राजनीतिक घटनाक्रम आगे तेजी से बदला. 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या से देश हिल गया. 15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल के निधन के साथ जरूरत पड़ने पर प्रधानमंत्री नेहरू को चुनौती देने की शक्ति रखने वाली आवाज शांत हो गई. इस समय तक सोमनाथ मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हुआ था. वामपंथी और तथाकथित प्रगतिशील वर्ग शुरू से ही सोमनाथ पुनर्निर्माण को हिन्दू पुनरुत्थानवाद के रूप में देख रहा था.नेहरू स्वयं आधुनिक, वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को लेकर अत्यंत सजग थे. उन्हें आशंका थी कि यदि सरकार से जुड़े लोग मंदिर निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएंगे, तो इससे भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान पर प्रश्न उठेंगे.

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कैबिनेट की एक बैठक के बाद नेहरू ने के. एम. मुंशी से कहा—आप सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार की कोशिश करें, यह मुझे पसंद नहीं है. यह हिन्दू पुनर्जागरणवाद है.नेहरू के एतराज के बावजूद के. एम. मुंशी पीछे नहीं हटे. वे मानते थे कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण किसी सांप्रदायिक राजनीति का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना का प्रश्न है. 24 अप्रैल 1951 को मुंशी ने इसे एक पत्र में दर्ज किया और लिखा कि वे यह कार्य पूरा करेंगे. यह भी लिखा कि सोमनाथ भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है और उसका पुनर्निर्माण राष्ट्र के आत्मविश्वास से जुड़ा हुआ है. दिलचस्प है कि पहले मुंशी द्वारा मौखिक रूप से और फिर पत्र के जरिए इनकार से नेहरू अप्रसन्न थे, लेकिन फिर भी नेहरू ने मुंशी को कैबिनेट से इस्तीफे के लिए नहीं कहा. जाहिर है कि उस समय के राजनीतिक माहौल में वैचारिक मतभेदों के बीच असहमति के स्वरों को साथ रखने का धैर्य शेष था.के.एम.मुंशी यहीं नहीं थमे. मंदिर पुनर्निर्माण पश्चात लोकार्पण कार्यक्रम के लिए उन्होंने राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को निमंत्रित किया. राजेंद्र प्रसाद भारतीय संस्कृति और परंपराओं से गहरे जुड़े हुए व्यक्ति थे. वे धर्मनिरपेक्षता को सर्वधर्म समभाव के रूप में देखते थे, न कि अपनी सभ्यतागत पहचान से दूरी बनाने के रूप में. उन्होंने निमंत्रण स्वीकार कर लिया. नेहरू को एतराज था . 2 मार्च 1951 को उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि वे समारोह में न जाएं.आगे लिखा कि दुर्भाग्यजनक रुप से इसके कई मतलब निकाले जाएंगे. व्यक्तिगत रुप से मैं सोचता हूं कि सोमनाथ में विशाल मन्दिर बनाने पर जोर देने का यह उचित समय नही है. इसे धीरे-धीरे किया जा सकता था. बाद में ज्यादा प्रभावपूर्ण ढंग से किया जा सकता था. फिर भी मैं सोचता हूँ कि बेहतर यही होगा कि आप उस समारोह की अध्यक्षता न करें. लेकिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने निर्णय पर अडिग रहे. उनका मानना था कि राष्ट्रपति होने के नाते वे सभी धर्मों और परंपराओं का सम्मान कर सकते हैं.आजादी के शुरुआती वर्षों में देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच यह खुला टकराव था, जिसकी चर्चा संसद से सड़कों तक हुई और इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए सुरक्षित हो गई. राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री दोनों में कोई पीछे हटने को तैयार नहीं थे. 2 मई 1951 को नेहरू ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को संबोधित एक पत्र में लिखा कि ये सरकारी कार्यक्रम नही है. नेहरू ने सिर्फ इस कार्यक्रम नहीं बल्कि इस जैसे कार्यक्रमों से दूरी बनाने की राज्य सरकारों को नसीहत दी. अपनी बहुचर्चित किताब India from Curzon to Nehru and After में मशहूर पत्रकार दुर्गादास ने लिखा कि इस कार्यक्रम में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की हिस्सेदारी से पंडित नेहरू इस हद तकअसहमत थे कि उन्होंने सूचना प्रसारण मंत्रालय को राष्ट्रपति के कार्यक्रम की कवरेज की मनाही कर दी थी.नेहरू के एतराज को दरकिनार करते हुए डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद 11मई 1951 को सोमनाथ मंदिर के ऐतिहासिक लोकार्पण कार्यक्रम में सम्मिलित हुए थे. इस अवसर पर उन्होंने कहा था,” सभी लोग धर्म के महान तत्वों को समझने की कोशिश करें. सत्य और ईश्वर तक पहुंचने के कई रास्ते हैं. जैसे सभी नदियां विशाल सागर में मिल जाती हैं, उसी तरह अलग-अलग धर्म ईश्वर तक पहुंचने में लोगों की मदद करते हैं. यद्यपि मैं एक हिन्दू हूं लेकिन मैं सारे धर्मों का आदर करता हूं. मैं कई अवसरों पर चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारा और दरगाह जाता रहता हूं. मेरा विश्वास है कि सोमनाथ मन्दिर का पुनरुद्धार उस दिन पूर्ण होगा, जब इस आधारशिला पर नकेवल एक भव्य मूर्ति खड़ी होगी, बल्कि उसके साथ ही भारत की वास्तविक समृद्धि का महल भी खड़ा होगा. वह समृद्धि जिसका सोमनाथ का प्राचीन मन्दिर प्रतीक रहा है, अपने ध्वंसावशेषों से पुनः-पुनः खड़ा होने वाला यह मन्दिर पुकार-पुकार कर दुनिया से कह रहा है कि जिसके प्रति लोगों के हृदय में अगाध श्रद्धा है, उसे दुनिया की कोई शक्ति नष्ट नही कर सकती. आज जो कुछ हम कर रहे हैं, वह इतिहास के परिमार्जन के लिए नही है. हमारा एक मात्र उद्देश्य अपने परम्परागत मूल्यों, आदर्शों और श्रद्धा के प्रति अपने लगाव को एक बार फिर दोहराना है, जिनपर आदिकाल से ही हमारे धर्म और धार्मिक विश्वास की इमारत खड़ी है.”

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