पतंजलि के 20 साल की मेहनत लाई रंग,भारत के आयुर्वेदिक ज्ञान को मिली वैश्विक पहचान

 पतंजलि के 20 साल की मेहनत लाई रंग,भारत के आयुर्वेदिक ज्ञान को मिली वैश्विक पहचान
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कभी जिस काम को दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य संस्था वर्ल्ड हेल्थ आग्रेनाइजेशन (WHO) ने असंभव मानकर छोड़ दिया था, वही काम भारत में संकल्प, शोध और तपस्या के दम पर पूरा कर दिखाया. यह कहानी है पतंजलि योगपीठ की, जिसने वर्ल्ड हर्बल इनसाइक्लोपीडिया जैसे विशाल ज्ञानकोश को तैयार कर इतिहास रच दिया.और आज हालात यह है कि डिजिटल युग की दिग्गज कंपनी गूगल भी उसी ज्ञान को प्राप्त करने के लिए पतंजलि के दरवाजे पर दस्तक दे रही है.साल 1999 में WHO ने एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया था. इसका मकसद दुनिया भर की औषधीय पौधों और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को एक जगह इकट्ठा करना था. करीब 11 साल की मेहनत के बाद 2010 में WHO ने इसे रोक दिया. वजह थी यह काम बहुत बड़ा, जटिल और लगभग असंभव लगने लगा. आखिरकार यह प्रोजेक्ट सिर्फ तीन वॉल्यूम तक ही सीमित रह गया.इसी दौरान भारत में पतंजलि योगपीठ ने 2003-04 के आसपास इसी दिशा में काम शुरू कर दिया. खास बात यह रही कि संस्थान को WHO के इस प्रोजेक्ट की जानकारी भी नहीं थी. जहां वैश्विक स्तर पर यह काम रुक गया, वहीं भारत में यह लगातार आगे बढ़ता रहा. वजह थी मजबूत संकल्प और लंबी सोच और करीब दो दशकों की निरंतर शोध और संकलन के बाद 2022 में यह कार्य अपने पूर्ण स्वरूप में सामने आया.करीब दो दशकों की लगातार रिसर्च और डेटा कलेक्शन के बाद 2022 में यह प्रोजेक्ट पूरा हुआ.

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इस दौरान 3.60 लाख पौधों में से 50,000 औषधीय पौधों की पहचान, 2000 से ज्यादा जनजातियों के पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण, 964 हीलिंग प्रैक्टिसेस का संग्रह, 9 से ज्यादा चिकित्सा पद्धतियों को शामिल किया गया, 12 लाख से ज्यादा लोकल नाम (वर्नाक्युलर) जुटाए गए और 2200 से अधिक स्रोतों से रिसर्च तैयार किया गया. इन सबको मिलाकर करीब 1.25 लाख पन्नों का वर्ल्ड हर्बल इनसाइक्लोपीडिया तैयार हुआ.आचार्य बालकृष्ण ने देहरादून के दून बुक फेस्टिवल में इस महाग्रंथ के 109 खंड पूरे होने की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि यह सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को सहेजने की बड़ी पहल है.इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि डिजिटल और AI के दौर में Google जैसी बड़ी टेक कंपनी ने पतंजलि से इस डेटा में रुचि दिखाई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, Google इस एविडेंस-बेस्ड डेटा का इस्तेमाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को और बेहतर बनाने के लिए करना चाहता है. यह केवल एक सहयोग नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि भारत का पारंपरिक ज्ञान अब वैश्विक टेक्नोलॉजी के केंद्र में पहुंच चुका है.आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं बल्कि सोच और संकल्प की जीत है. जहां बड़े वैश्विक संस्थान सीमित रह गए, वहीं भारतीय परंपरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने मिलकर इतिहास रच दिया. कुल मिलाकर, विश्व भेषज संहिता इस बात का सबूत है कि अगर इरादा मजबूत हो, तो असंभव दिखने वाला काम भी दुनिया के लिए मिसाल बन सकता है और अब पूरी दुनिया इस ज्ञान को अपनाने की ओर बढ़ रही है.

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