संसद में आए नए बिल से समाप्त होगा फ्री यूपीआई वाला सिस्टम,ऑनलाइन पेमेंट करने पर देना होगा चार्ज?

 संसद में आए नए बिल से समाप्त होगा फ्री यूपीआई वाला सिस्टम,ऑनलाइन पेमेंट करने पर देना होगा चार्ज?
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आजकल चाय की टपरी से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक हर जगह लोग यूपीआई (UPI) से पेमेंट करना पसंद करते हैं. जेब में कैश न हो, तो भी मोबाइल से स्कैन करके मिनटों में काम हो जाता है. लेकिन, अब डिजिटल पेमेंट की इस दुनिया में एक बहुत बड़ा बदलाव होने जा रहा है. मंगलवार, 4 अगस्त को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में एक अहम बिल पेश किया है. इस बिल का नाम ‘कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026’ है. यह बिल सीधा आम आदमी की जेब, विदेशी निवेश और देश में कारोबार करने के तरीकों पर गहरा असर डालने वाला है.असल में यह नया कानून आयकर (संशोधन) अध्यादेश, 2026 की जगह लेने के लिए लाया गया है.

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इसके जरिए पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट (2007), इनकम टैक्स एक्ट (2025) और फाइनेंस एक्ट (2027) में कई बड़े संशोधन किए जा रहे हैं. आइए विस्तार से समझते हैं कि इस बिल में क्या-क्या है और आम जनता से लेकर बड़े कारोबारियों तक, किसके लिए क्या नियम बदलने वाले हैं.डिजिटल पेमेंट आज हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. अब तक हम बिना किसी अतिरिक्त चार्ज के धड़ल्ले से यूपीआई लेनदेन करते आए हैं. इसकी मुख्य वजह यह थी कि सरकार ने ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ के सेक्शन 10A के तहत एक सख्त नियम लागू कर रखा था. इस नियम के मुताबिक, किसी भी बैंक या पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर को डिजिटल पेमेंट करने या रिसीव करने पर चार्ज (MDR – मर्चेंट डिस्काउंट रेट) लगाने की पूरी तरह से मनाही थी.नए बिल में इसी जीरो-एमडीआर वाले प्रावधान को खत्म करने का प्रस्ताव रखा गया है. इसका मतलब ये है कि आने वाले समय में बैंक और पेमेंट कंपनियां यूपीआई के जरिए लेनदेन करने पर चार्ज वसूल सकती हैं. सरकार का इसके पीछे तर्क है कि यूपीआई को विकास के अगले स्तर तक ले जाने और इसके बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए फंड की सख्त जरूरत है. इसी ग्रोथ को ध्यान में रखते हुए यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को दोबारा लागू करने का रास्ता साफ किया जा रहा है.अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने और विदेशी निवेशकों को भारत की तरफ आकर्षित करने के लिए सरकार ने टैक्स नियमों में बड़ी राहत दी है. इनकम टैक्स एक्ट, 2025 में संशोधन के जरिए विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) को एक बड़ा मौका दिया जा रहा है. अगर ये विदेशी निवेशक सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities या G-Secs) में निवेश करते हैं, तो उन्हें ब्याज से होने वाली कमाई और कैपिटल गेन पर टैक्स में पूरी तरह से छूट मिलेगी.इसके अलावा ‘बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स’ (BIS) को भी सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश करने पर टैक्स से राहत दी जाएगी. भारत में फंड मैनेजमेंट की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए भी ठोस कदम उठाए गए हैं. एलिजिबल इन्वेस्टमेंट फंड्स और फंड मैनेजर्स के लिए टैक्स ढांचे को काफी सरल बनाया जा रहा है, ताकि देश में निवेश का माहौल ज्यादा पारदर्शी और सुलभ बन सके.भारत को दुनिया का बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में यह बिल कई जरूरी प्रावधान लेकर आया है. मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट, सर्वर और स्मार्ट वियरेबल्स जैसे उपकरणों को ‘स्पेसिफाइड इलेक्ट्रॉनिक गुड्स’ की खास श्रेणी में रखा गया है. इन इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग करने वाली कंपनियों को वित्त वर्ष 2041 तक टैक्स छूट मिलती रहेगी.सिर्फ इतना ही नहीं, जो विदेशी कंपनियां कस्टम बॉन्डेड वेयरहाउस में अपने इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स रखती हैं, उन्हें भी 2041 तक टैक्स में यह राहत दी गई है. इसके साथ ही, भारत में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए एक और कदम उठाया गया है. लीज्ड डेटा सेंटर चलाने वाली भारतीय कंपनियों के लिए भी टैक्स के नियमों को काफी आसान कर दिया गया है. इससे देश के डेटा सेंटर सेक्टर को तेजी से आगे बढ़ने में मदद मिलेगी.डायमंड इंडस्ट्री को वैश्विक स्तर पर मजबूती देने के लिए भी नए बिल में विशेष ध्यान रखा गया है. विदेशी माइनिंग कंपनियों, साइटहोल्डर्स, ब्रोकर्स और ऑक्शन कंपनियों के लिए रफ डायमंड (कच्चे हीरे) की बिक्री पर टैक्स छूट की समय सीमा को काफी आगे बढ़ा दिया गया है. अब यह छूट 31 मार्च 2041 तक लागू रहेगी. वहीं, शेयर बाजार के निवेशकों के लिए भी राहत की खबर है. बिजनेस ट्रस्ट के जरिए रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs) के यूनिट होल्डर्स को मिलने वाले डिविडेंड पर भी टैक्स शर्तों में ढील दी गई है.हालांकि, कॉरपोरेट टैक्स के मोर्चे पर एक सख्त फैसला भी लिया गया है. नई टैक्स व्यवस्था का चुनाव करने वाले ‘स्पेशल पर्पज व्हीकल्स’ (SPVs) के लिए सरचार्ज को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर सीधे 25 प्रतिशत कर दिया गया है. दूसरी तरफ, अन्य घरेलू कंपनियों के लिए यह सरचार्ज पहले की तरह 10 प्रतिशत ही बना रहेगा.

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