आखिर केरल का नाम बदलकर क्यों किया गया केरलम?जानिए नाम बदलने के पीछे की पूरी प्रक्रिया

 आखिर केरल का नाम बदलकर क्यों किया गया केरलम?जानिए नाम बदलने के पीछे की पूरी प्रक्रिया
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केरल का नाम बदलकर केरलम करने को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है।बीते दिन मंगलवार को कैबिनेट की बैठक में इससे जुड़े एक प्रस्ताव पर मुहर लगाई। केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने इस मुद्दे पर तंज कसते हुए सवाल खड़े किए। हालांकि, भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने इस फैसले को बड़े बदलाव वाला बताया। इस बीच ‘केरलम’ नाम को लेकर भी लोगों के मन में सवाल हैं। मसलन- केरल के अलग राज्य बनने की कहानी क्या है? केरल का नाम बदलकर केरलम करने की वजह क्या है? इसकी मांग कब से उठ रही थी? बीते वर्षों में इसे लेकर क्या-क्या हुआ? इसके अलावा केंद्रीय कैबिनेट के फैसले के बाद अब कैसे संविधान में केरल का नाम केरलम किया जा सकता है। आइये जानते हैं…आधुनिक केरल का इतिहास भाषाई आंदोलन से जुड़ा है। दरअसल, अंग्रेजों के शासनकाल में भारत को भाषाई आधार पर नहीं बांटा गया था। हालांकि, मद्रास प्रेजिडेंसी में भाषाई तौर पर अलग-अलग राज्य बनाने की मांग धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगी। 1920 के दशक में एक संयुक्त मलयालम भाषी राज्य बनाने की मांग तेज हुई। इसका मकसद त्रावणकोर और कोचीन की रियासतों और मद्रास प्रेजिडेंसी के मालाबार जिले को एक साथ लाना था। उस दौरान शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे आग पकड़ता रहा। आखिरकार 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद 1 जुलाई 1949 को दो प्रमुख मलयालम भाषी रियासतों- त्रावणकोर और कोचीन को मिलाकर त्रावणकोर-कोचीन राज्य की स्थापना की गई। बाद में राज्य पुनर्गठन आयोग ने भाषाई आधार पर राज्यों के निर्माण का प्रस्ताव बढ़ाया। सैयद फजल अली की अध्यक्षता वाले आयोग ने अलग केरल राज्य के गठन की सिफारिश की। मालाबार जिले और कासरगोड तालुका को नए मलयालम भाषी राज्य में शामिल किया गया।

त्रावणकोर के चार दक्षिणी तालुकाओं (तोवला, अगस्त्येश्वरम, कालकुलम और विलायनकोड) और शेनकोट्टई के कुछ हिस्सों को बाहर कर दिया गया। यह अब तमिलनाडु का हिस्सा हैं।आखिरकार 1 नवंबर 1956 को आधुनिक केरल राज्य अस्तित्व में आया।राष्ट्रपति की सिफारिश के बाद यह विधेयक लोकसभा या राज्यसभा में पेश किया जाएगा। खास बात यह है कि राज्य का नाम बदलने के लिए किसी विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती। इसे साधारण बहुमत यानी सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले 50% से अधिक सांसदों की सहमति से पारित किया जा सकता है। अनुच्छेद 4 के मुताबिक, इसे अनुच्छेद 368 के तहत औपचारिक संविधान संशोधन नहीं माना जाता है। दोनों सदनों से विधेयक के पारित होने के बाद, विधेयक को राष्ट्रपति के पास अंतिम सहमति के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलते ही इसे भारत के गजट में अधिसूचित किया जाएगा।इस प्रक्रिया के पूरा होते ही संविधान की पहली अनुसूची (राज्यों के नाम) और चौथी अनुसूची (राज्यसभा सीटों का आवंटन) खुद अपडेट हो जाएंगी। इसके बाद सभी आधिकारिक कानूनी दस्तावेजों, अंतरराष्ट्रीय संधियों और रिकॉर्ड्स में केरल की जगह केरलम अधिकारिक नाम बन जाएगा।

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