बिहार में किसकी राज्यसभा उम्मीदवारी में कितना है दम,कहां फंस सकता है एनडीए उम्मीदवारों की पेंच?

 बिहार में किसकी राज्यसभा उम्मीदवारी में कितना है दम,कहां फंस सकता है एनडीए उम्मीदवारों की पेंच?
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16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। देशभर में राज्यसभा की कुल 37 सीटों पर चुनाव होने हैं। इनके लिए महाराष्ट्र से लेकर असम और तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक की राज्यसभा सीटें हैं। हालांकि, बिहार में हुए एक हालिया घटनाक्रम ने इन चुनावों में लोगों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। दरअसल, बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संसद के उच्च सदन के चुनाव के लिए नामांकन कर दिया है। राज्यसभा में किस राज्य से कितने सांसद होंगे यह उस राज्य की जनसंख्या के हिसाब से तय होता है। राज्यसभा के सदस्य का चुनाव उस राज्य की विधानसभा के चुने हुए विधायक करते हैं, जिस राज्य से वह उम्मीदवार है। राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया लोकसभा और विधानसभा चुनाव से काफी अलग है, क्योंकि इस सदन के लिए मतदान सीधे जनता नहीं करती, बल्कि जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि करते हैं। राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है। राज्यसभा चुनावों के नतीजों के लिए एक फॉर्मूला भी तय किया गया है।बिहार में विधायकों की कुल संख्या 243 है। इस बार राज्य की कुल पांच राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हो रहा है। हर एक सदस्य को राज्यसभा पहुंचने के लिए कितने विधायकों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए इसके लिए एक तय फॉर्मूला है। यह फॉर्मूला यह है कि कुल विधायकों की संख्या को जितने राज्यसभा सदस्य चुने जाने हैं, उसमें एक जोड़कर विभाजित किया जाता है। इस बार यहां से पांच राज्यसभा सदस्यों का चुनाव होना है। इसमें एक जोड़ने से यह संख्या छह होती है। अब कुल सदस्य 243 हैं तो उसे छह से विभाजित करने पर 40.5 आता है। इसमें एक जोड़ने पर यह संख्या 41.5 हो जाती है। यानी बिहार से राज्यसभा सांसद बनने के लिए उम्मीदवार को 41 प्रथम वरीयता के वोटों की जरूरत होगी। अगर विजेता का फैसला प्रथम वरीयता के वोटों से नहीं होता तो उसके बाद दूसरी वरीयता के वोट गिने जाते हैं। बिहार में मौजूदा समय में भाजपा के पास सबसे ज्यादा 89 सीटें हैं, जबकि 85 सीटों के साथ जदयू दूसरे नंबर पर है। मौजूदा समीकरण के मुताबिक, सत्ताधारी गठबंधन चार सीटें आसानी से जीत सकता है।

वहीं, पांचवीं सीट पर एनडीए का दावा महागठबंधन के मुकाबले ज्यादा मजबूत दिखाई दे रहा है। बिहार में राज्यसभा के लिए पांचवीं सीट को लेकर सियासी दलों में भिड़ंत तय है। हालांकि, इसमें भी एनडीए के पास कुछ बढ़त है। दरअसल, राजद और कांग्रेस के साथ अगर लेफ्ट पार्टियों की सीटें मिला भी दी जाएं तो भी विपक्ष 41 प्रथम वरीयता के वोट हासिल नहीं कर सकता। वह यह आंकड़ा सिर्फ एआईएमआईएम और बसपा के समर्थन से ही हासिल हो सकता है। दूसरी तरफ एनडीए के पास भाजपा और जदयू के बचे हुए 10 प्रथम वरीयता वोट (7 भाजपा+3 जदयू), लोजपा (रामविलास) के 19 प्रथम वरीयता वोट, हम के पांच, रालोमो के चार विधायक हैं। यानी एनडीए के पास कुल 38 प्रथम वरीयता वोट हैं, जो कि महागठबंधन से ज्यादा हैं। ऐसे में अगर एनडीए कुछ विधायकों को क्रॉस वोटिंग के लिए मना लेती है या एआईएमआईएम, बसपा का समर्थन हासिल कर लेती है तो उसके पास जरूरी मत होंगे। चूंकि, राज्यसभा चुनाव में एनडीए के ही सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के मुखिया उपेंद्र कुशवाहा भी मैदान में हैं, इसलिए एनडीए उन्हें राज्यसभा भेजकर सदन में संख्याबल को बढ़ाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाएगी। दूसरी तरफ महागठबंधन एक बार फिर पूरे विपक्ष को एकजुट कर सत्तासीन गठबंधन को चुनौती देने की कोशिश करेगी।

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