‘ईगो’ नहीं मुद्दों की लड़ाई बन चुकी है झारखंड छात्र आंदोलन,युवाओं ने शिबू सोरेन को किया याद
दिल्ली के जंतर-मंतर की तरह की झारखंड में भी हजारों छात्र आंदोलन पर उतर आए हैं, लेकिन इस आंदोलन को जंतर-मंतर वाले आंदोलन से अलग बताया जा रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दोनों छात्र आंदोलनों में क्या अंतर है? इसके कई पहलू हैं. पहला तो ये कि झारखंड में जंतर-मंतर जैसा टकराव वाला माहौल नहीं दिख रहा. यहां अब तक आंदोलन में गाली-गलौज या व्यक्तिगत हमलों की भाषा देखने को नहीं मिली बल्कि प्रदर्शन का फोकस अपनी मांगों पर ही है.दूसरा पहलू ये है कि झारखंड में मुख्यमंत्री या शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग नहीं की गई है बल्कि छात्र आंदोलन का केंद्र कथित परीक्षा अनियमितताओं की जांच, पारदर्शिता और न्याय है. इसमें सरकार गिराने या किसी मंत्री के इस्तीफे को मुख्य मुद्दा नहीं बनाया गया है. तीसरा पहलू ये है कि इस आंदोलन में भाषा में संयम और मांगों में स्पष्टता नजर आ रही है.

प्रदर्शनकारी अपनी बात आक्रामक नारों से नहीं, बल्कि तय मांगों के साथ रख रहे हैं यानी आंदोलन का स्वर अपेक्षाकृत संतुलित है.झारखंड में आंदोलन की रणनीति शांतिपूर्ण है. यहां धरना अब तक शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा है, किसी बड़े हिंसक टकराव या तोड़फोड़ की घटना सामने नहीं आई है. दिलचस्प बात ये है कि प्रदर्शनकारी पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि को भी याद कर रहे हैं और हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी हो रही है यानी साफ है कि छात्रों का विरोध सरकार की नीतियों और कार्रवाई को लेकर है.इस आंदोलन की एक और खास बात ये है कि राजनीतिक दल इससे दूरी बना रहे हैं. हालांकि अलग-अलग दलों के कुछ नेताओं ने आंदोलन को नैतिक समर्थन जरूर दिया है, लेकिन अधिकांश नेता मंच साझा करने से बच रहे हैं. इससे आंदोलन अपनी छात्र-केंद्रित पहचान बनाए रखने की कोशिश करता दिख रहा है.झारखंड का यह छात्र आंदोलन ‘ईगो’ की लड़ाई नहीं बल्कि मुद्दों की लड़ाई है. इसमें बातचीत और समाधान की गुंजाइश खुली रखी गई है और आंदोलन का रुख फिलहाल टकराव से ज्यादा समाधान पर केंद्रित दिखाई देता है. जंतर-मंतर पर जिस तरह से आंदोलन स्थल एक तरह से पिकनिक स्पॉट की तरह बन गया था, ऐसा झारखंड में नहीं दिख रहा. यहां प्रदर्शन स्थल पर आने वाले लोगों का मुख्य उद्देश्य आंदोलन में भागीदारी है और इसे मनोरंजन या सोशल मीडिया इवेंट जैसा माहौल बनाने से बचाने की कोशिश दिख रही है.CID की जांच में उसे इस पूरे नेटवर्क की एक अहम कड़ी माना जा रहा है. जांच एजेंसी उसके संपर्कों, परीक्षा प्रक्रिया में कथित भूमिका और अन्य आरोपियों से संबंधों की पड़ताल कर रही है. हालांकि उसके खिलाफ लगे आरोपों पर अंतिम फैसला अदालत को करना है.जैसे-जैसे मामले की जांच आगे बढ़ी, कथित नेटवर्क का दायरा भी बढ़ता गया. अरविंद कुमार को अभय तिवारी का करीबी सहयोगी बताते हुए गिरफ्तार किया गया. इसके बाद हाल के दिनों में उमेश कुमार, बुद्धेश्वर भगत, रमेश कुमार और अमित कुमार को भी गिरफ्तार किया गया. इन चारों की विस्तृत भूमिका पर CID अभी सार्वजनिक रूप से ज्यादा जानकारी साझा नहीं कर रही है, लेकिन एजेंसी का कहना है कि जांच लगातार आगे बढ़ रही है.जांच यहीं नहीं रुकी. CID ने JPSC के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांगते के आवास पर भी तलाशी ली और उनसे पूछताछ की. हालांकि उन्हें अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है. इससे यह संकेत जरूर मिला कि जांच केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े हर स्तर की जांच की जा रही है.इस पूरे मामले की सबसे अहम बात यह है कि अब तक की गिरफ्तारियां 3 अलग-अलग परतों को सामने लाती हैं. पहली परत JPSC के भीतर की है, दूसरी परीक्षा संचालित करने वाली निजी एजेंसी TDPL की और तीसरी उन लोगों की, जिन्हें CID कथित बाहरी नेटवर्क का हिस्सा मानकर जांच कर रही है।
