आज से शुरू हुआ नहाय-खाय के साथ चार दिवसीय चैती छठ,जानिए क्या है मान्यता?
लोक आस्था, श्रद्धा और सूर्य उपासना का चार दिवसीय महापर्व चैती छठ रविवार से शुरू हो गया है. नहाय-खाय से शुरू यह पर्व चार दिनों तक चलेगा. इस दौरान व्रति 36 घंटे का निर्जला उपवास भी करेंगी. देश में बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के इलाकों में यह पर्व श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.भरणी नक्षत्र और वैधृति योग में अनुष्ठान शुरू होता है. चार दिवसीय महापर्व प्रकृति को सपमर्पित है. इस दौरान भगवान भास्कर (सूर्य) और छठी मैया की आराधना की जाती है. इसमें व्रत करने वाले श्रद्धालु कड़े नियमों का पालन करते हैं. पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना करते हैं।चार दिवसीय महापर्व में पहले दिन नहा खाय होता है. इस दिन व्रती पवित्र नदी (गंगा, यमुना सहित अन्य नदी), तालाब और कुआं के पानी से स्नान करती हैं. इसके बाद अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी (बिना प्याज-लहसन) बनाती हैं. भगवान को भोग लगाने के बाद व्रती इसी को ग्रहण करती है. इसके बाद अन्य लोगों में भी इस प्रसाद का वितरण किया जाता है.कद्दू-भात सात्विक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक महत्व भी रखता है. कद्दू में 96 प्रतिशत पानी होता है. अगले 36 घंटे के निर्जला उपवास में व्रती के शरीर को हाइड्रेटेड रखता है. शरीर में पानी की कमी नहीं होने देता है. इसके साथ पाचन को संतुलित बनाता है. कद्दू में फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन (A, E, C) और पोटेशियम होता है जो इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है. अरवा चावल कार्बोहाइड्रेट का स्रोत है.

चने की दाल में प्रोटीन और आयरन होते हैं।पर्व के दूसरे दिन खरना का प्रसाद बनता है. इसे लोहंडा भी कहा जाता है. इस दिन व्रती दिनभर निर्जला उपवास करती हैं. शाम में गुड़ की खीर, रोटी और फल का प्रसाद छठी मईया को चढ़ाती हैं. खीर में कहीं-कहीं गन्ने के रस का भी इस्तेमाल होता है. इसके बाद पहले व्रती खुद प्रसाद ग्रहण करती हैं फिर परिवार के सदस्यों के बीच प्रसाद का वितरण होता है. इसी समय से 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है.चिनी के मुकाबले गुड़ को शुद्ध माना जाता है, क्योंकि चीनी को साफ करने के लिए केमिकल का इस्तेमाल होता है. इसलिए गुड़ का इस्तेमाल होता है. गुड़ में आयरन और कार्बोहाइड्रेट प्रचूर मात्रा में होते हैं. इससे शरीर को ऊर्जा मिलती है. दूध शरीर को पोषण देता है. इसके साथ ही व्रती लंबे समय तक पानी में खड़ी रहती है, ऐसे में गुड़ शरीर को गर्मी प्रदान करता है।तीसरे दिन व्रती डूबते सूर्य को अर्ध्य देने के लिए दउरा (बांस के बर्तन) लेकर घाट पर जाते हैं. घी का दिया जलाकर विधिवत छठगीत के साथ पूजन शुरू होती है. जाता है. इसके लिए ठेकुआ, कसार, चावल का लड्डू, गुड़, फल, केला, नारियल, सेव, ईख और अदरक के साथ हल्दी चढ़ाने का विशेष महत्व होता है. ठेकुआ बिहार का मशहूर प्रसाद है।यह महापर्व का अंतिम दिन होता है. इस दिन व्रती उगते सूर्य को अर्ध्य देकर भगवान सूर्य का धन्यवाद कर छठ पर्व संपन्न करती हैं. इसके बाद आस-पड़ोस और परिवार वालों को प्रसाद खिलाकर एक दूसरे को बधाई देते हैं. इस पर्व में 4 दिनों तक स्वच्छता का पूरा ख्याल रखा जाता है.छठ पूजा केवल त्योहार नहीं बल्कि गहरी आस्था, प्रकृति और अनुशासन का प्रतीक है. छठी मईया को ब्रह्माजी की मानस पुत्री और सूर्य की बहन मानी जाती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार छठी मईया संतानों की रक्षा और लंबी आयु देने वाली देवी हैं. त्रेतायुग में माता सीता ने भी वनवास के दौरान छठ पूजा की थी. द्वापर युग में द्रौपदी ने भी छठ पूजा की थी।
