केरलम चुनाव में तेजस्वी का दिखेगा दम,राजद ने भरी हुंकार
बिहार की मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल केरलम में विस्तार की तैयारी कर रही है. पार्टी ने तीन विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं. तेजस्वी यादव राष्ट्रीय कार्यालय अध्यक्ष बनने के बाद दक्षिण में पार्टी का विस्तार चाहते हैं और वह केरल का दौरा भी कर चुके हैं.देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. दक्षिण भारत का एक राज्य केरलम है, जहां विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली पार्टी राष्ट्रीय जनता दल भी केरलम में पांव प्रसार में की तैयारी में है. राष्ट्रीय जनता दल गठबंधन में चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी है. कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव केरलम का दौरा अधिक कर चुके हैं।केरलम विधानसभा चुनाव में इस बार एक दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर सामने आ रही है. बिहार की प्रमुख पार्टी राष्ट्रीय जनता दल केरलम में तीन सीटों पर चुनाव लड़ेगी. राज्य की तीन सीटों कुथुपरम्बा, वडाकरा और कल्पेट्टा विधानसभा सीट से पार्टी ने उम्मीदवार उतारा है. सवाल यह उठता है कि बिहार केंद्रित पार्टी को केरल में किस आधार पर जीत का भरोसा है.पीके अनिल कुमार को कल्पेट्टा सीट से उम्मीदवार बनाया गया है. वह वायनाड दिला कांग्रेस कमेटी के पूर्व सचिव हैं और पांच साल पहले समाजवादी गुट में शामिल हुए थे. वडाकरा से एमके भास्करन मैदान में हैं. वह आरेजडी के कोझिकोड जिला अध्यक्ष हैं और एरामाला ग्राम पंचायत के अध्यक्ष रह चुके हैं. कुथुपरम्बा सीट से पीके प्रवीन को उम्मीदवार बनाया गया है. वह वर्तमान विधायक केपी मोहनन के भतीजे हैं और युवा जनता दल के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं.बता दें कि कुथुपरम्बा विधानसभा सीट पर पिछली बार यानी 2021 के विधानसभा चुनाव में एलडीएफ गठबंधन की ही जीत हुई थी. सीट से केपी मोहनन ने जीत हासिल की थी. उस समय वह लोकतांत्रिक जनता दल (LJD) के उम्मीदवार थे, जो LDF गठबंधन का हिस्सा थी. साल 2023 में एलजेडी का विलय आरजेडी में हो गया. इस वजह से अब यह सीट आरजेडी के पास है. इस बार आरजेडी ने इस सीट से केपी मोहनन के भतीजे पीके प्रवीन को उम्मीदवार बनाया है.राष्ट्रीय जनता दल इस बार केरलम में अकेले लड़ने के बजाय गठबंधन में चुनाव लड़ने की तैयारी में है.राजद केरलम में सत्ताधारी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट का हिस्सा है. पार्टी का केरलम में आधार दरअसल पुराने लोकतांत्रिक जनता दल (LJD) और जनता दल की राजनीति से जुड़ा है, जिसका राज्य में एक सीमित लेकिन संगठित कैडर रहा है. आपको बता दें कि बाद में लोकतांत्रिक जनता दल का राष्ट्रीय जनता दल में विलय हुआ था, जिसके बाद पार्टी के केरलम में एक विधायक थे.जातीय समीकरण की बात करें तो केरलम की राजनीति बिहार से काफी अलग है. वहां चुनाव मुख्य रूप से समुदाय आधारित सामाजिक समीकरण पर टिके होते हैं, जिसमें एझवा (OBC), नायर, मुस्लिम और ईसाई वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाते हैं.उत्तर केरलम के जिन इलाकों में आरजेडी लड़ती है, वहां पार्टी को खासतौर पर पिछड़ा वर्ग, कुछ दलित समुदायों और मुस्लिम मतदाताओं के बीच समर्थन मिलने की उम्मीद रहती है. पार्टी का बिहार में आधार भी एम और वाई समीकरण का है.

इसके साथ ही, एलडीएफ के सहयोगी होने के कारण सीपीएम का कैडर वोट भी आरजेडी उम्मीदवारों को ट्रांसफर हो सकता है.2011 विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने वाम मोर्चा (LDF) के साथ सीमित सीटों पर चुनाव लड़ा था. उस समय पार्टी को सफलता नहीं मिली और विधानसभा में प्रतिनिधित्व नहीं पहुंचे. 2016 के विधानसभा चुनाव में भी राष्ट्रीय जनता दल ने उम्मीदवार खड़े किए थे. इस चुनाव में भी आरजेडी ने गठबंधन के तहत कुछ सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली और विधायक संख्या शून्य रही और वोट शेयर भी 1% से नीचे रहा.2021 विधानसभा चुनाव आरजेडी के लिए अपेक्षाकृत बेहतर चुनाव रहा.पार्टी ने 2 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पार्टी को 511 वोट मिले और राज्य स्तर पर वोट शेयर लगभग 0.00% दर्ज हुआ, क्योंकि पार्टी बहुत सीमित सीटों पर थी. हालांकि कुथुपरम्बा सीट पर पार्टी मजबूत उपस्थिति दर्ज करने में कामयाब रही।2021 में अगर पार्टी के प्रदर्शन की बात करें तो रन्नी सीट से आरजेडी उम्मीदवार जोमोन कोचेथू की हार हुई थी. उन्हें कुल 339 वोट मिले थे, जो कुल वोट शेयर का 0.27% था. वहीं कुंदारा सीट से विनोद बहुलेयन थे. उन्हें मात्र 172 वोट मिले थे, जो कुल वोट शेयर का 0.11% था.केरलम में रातों-रात बिहार जैसी ‘कास्ट पॉलिटिक्स’ का रंग घुलना मुश्किल है, क्योंकि वहां की साक्षरता और राजनीतिक समझ अलग स्तर पर है. लेकिन अगर आरजेडी वहां एक भी सीट जीतने में कामयाब होती है, तो यह तेजस्वी यादव के लिए दक्षिण में प्रवेश का एक बड़ा संदेश होगा. केरलम में आरजेडी का मकसद सिर्फ सीटें जीतना नहीं, बल्कि उत्तर भारतीय ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और ‘कास्ट पॉलिटिक्स’ के मॉडल को दक्षिण में परखने का भी प्रयास माना जा रहा है।
