चीन-अमेरिका में टेक्नोलॉजी की टक्कर,चीन ने अमेरिका को पछाड़ा
दुनिया में ताकतवर देश वही नहीं है, जिसके पास सबसे ज्यादा हथियार हों या जिसकी अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी हो. आज के दौर की बात करें, तो असली ताकत इस बात से भी तय होती है कि कौन-सा देश विज्ञान, नई तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है. इसी दौड़ में चीन ने अमेरिका को कड़ी टक्कर दी है.

कभी विज्ञान और रिसर्च के मामले में अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा नाम माना जाता था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है.नेचर इंडेक्स के आंकड़े बताते हैं कि रिसर्च के क्षेत्र में चीन ने अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है और दोनों देशों के बीच अंतर भी बढ़ रहा है. इसका मतलब है कि चीन अब सिर्फ सामान बनाने वाला देश नहीं, बल्कि नई खोज करने और दुनिया की तकनीक को प्रभावित करने वाला देश भी बन रहा है. इस बदलाव को समझने के लिए सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें सुनना काफी नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि चीन ने विज्ञान में अपनी जगह बनाने के लिए लंबे समय तक काम किया है.चीन में रिसर्च, विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिकों को तैयार करने पर जोर दिया गया है. इसका असर शोधपत्रों, नई खोजों और तकनीकी विकास में दिखाई देता है. दूसरी तरफ, अमेरिका आज भी कई क्षेत्रों में मजबूत है, खासकर स्वास्थ्य विज्ञान और जैविक विज्ञान में. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि चीन ने विज्ञान और तकनीक के हर क्षेत्र में अमेरिका को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया है.आइए, पांच अहम आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि चीन की वैज्ञानिक ताकत कितनी तेजी से बढ़ी है और इस बदलाव का दुनिया पर क्या असर पड़ सकता है.नेचर इंडेक्स की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में चीन का रिसर्च स्कोर 32,122 था, जबकि अमेरिका का स्कोर 22,083 था. 2026 के आंकड़ों में चीन की बढ़त और बड़ी दिखाई देती है. साल 2025 में चीन का स्कोर बढ़कर 52,735 हो गया, जबकि अमेरिका का स्कोर 26,006 रहा. यानी चीन की बढ़त सिर्फ बनी नहीं हुई है, बल्कि तेजी से बढ़ भी रही है.चीन की इस कामयाबी के पीछे लंबे समय से वैज्ञानिक शिक्षा और रिसर्च पर दिया जा रहा जोर भी एक वजह है. जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिक्योरिटी एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी की 2021 की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि 2025 तक चीन हर साल विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) में करीब 77,000 पीएचडी तैयार करेगा. इसके मुकाबले अमेरिका में यह संख्या करीब 40,000 रहने का अनुमान था.आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI दुनिया की सबसे अहम तकनीकों में शामिल है. इसका इस्तेमाल मोबाइल फोन, अस्पताल, कार, खेती और उद्योगों में तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में AI के जानकारों की संख्या और उनकी क्षमता किसी भी देश के लिए बहुत मायने रखती है. सितंबर 2026 में सामने आए कार्नेगी से जुड़े अध्ययन के मुताबिक, दुनिया के प्रमुख AI शोधकर्ताओं में चीन में पढ़ाई करके निकले लोगों की हिस्सेदारी 2022 के 46.4% से घटकर अमेरिका में 2025 तक 34.2% रह गई. जबकि चीन में काम करने वाले प्रमुख AI शोधकर्ताओं की हिस्सेदारी 27.1% से बढ़कर 40.6% हो गई.चीन की बढ़त केवल AI तक सीमित नहीं है. नेचर इंडेक्स के 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में चीन का स्कोर 25,358 था, जबकि अमेरिका का स्कोर 12,228 रहा. प्राकृतिक विज्ञान में भौतिकी, रसायन विज्ञान और पर्यावरण से जुड़े कई विषय शामिल हैं. रिसर्च में यह बढ़त दिखाती है कि चीन कई वैज्ञानिक क्षेत्रों में बड़े स्तर पर काम कर रहा है. वहां विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों का योगदान अहम है.चीन की तेजी से बढ़ती ताकत के बावजूद अमेरिका को पूरी तरह पीछे मानना सही नहीं होगा. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की AI इंडेक्स रिपोर्ट 2026 के मुताबिक, 2025 में अमेरिका में निजी AI निवेश 285.9 अरब डॉलर था, जबकि चीन में यह 12.4 अरब डॉलर दर्ज किया गया.यह अंतर बताता है कि AI कंपनियों और नई तकनीकों में निजी निवेश के मामले में अमेरिका अब भी बहुत आगे है. अमेरिका के पास बड़ी तकनीकी कंपनियां, उन्नत कंप्यूटर चिप और AI मॉडल बनाने के लिए मजबूत संसाधन हैं. वहीं अमेरिका में एआई एक्सपर्ट की संख्या 4 हजार है, वहीं चीन में इसकी संख्या 7 हजार के आसपास है।
