ट्रंप के सामने पाकिस्तान ने फैलाया हाथ,क्या मदद करेगा अमेरिका?
अमेरिका और ईरान के बीच नाकाम सीजफायर डील कराने वाले पाकिस्तान ने अपनी दलाली की कीमत लगा ली है और उसने ट्रंप के सामने हाथ फैला दिया है. अब नकदी की कमी से जूझ रहे पाकिस्तान ने अमेरिका से 10 अरब डॉलर यानी करीब 96 हजार करोड़ रुपये की एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन फैसिलिटी मांगी है. यह विदेशी मुद्रा को स्थिर रखने के लिए वित्तीय मदद है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार मामले की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने यह जानकारी दी. अगर डोनाल्ड ट्रंप की सरकार की ओर से यह मदद मंजूर हो जाती है, तो इससे आतंकवाद को नेशनल पॉलिसी बनाने वाले पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिल सकती है.रिपोर्ट के अनुसार यह खबर पहली बार सामने आई है. यह मांग ऐसे समय में की गई है, जब ईरान युद्ध में पाकिस्तान ने बिचौलिए की भूमिका निभाई है. डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने के लिए हर सीमा लांघी है और उसने अब अमेरिका से पैसा पाने के सपने देख लिए हैं. यही उम्मीद की जा रही थी कि खुद को शांतिदूत दिखाकर पाकिस्तान अमेरिका और दूसरे साझेदार देशों से आर्थिक मदद मांग सकता है. उसने ठीक यही किया है.

अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट को भेजे गए रिक्वेस्ट में पाकिस्तान ने अमेरिका और पाकिस्तान सरकार के बीच 10 अरब डॉलर की द्विपक्षीय एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन सपोर्ट फैसिलिटी मांगी है. इसकी अवधि 5 साल तक रखने की मांग की गई है. अगर यह फंड मिल जाता है, तो इससे पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ेगा, पाकिस्तानी रुपये पर दबाव कम होगा और उसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से कर्ज लेने पर कम निर्भर रहना पड़ेगा. हालांकि, इसके साथ ही पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कार्यक्रम के तहत सख्त वित्तीय और मौद्रिक नीतियां लागू करता रहेगा.बता दें कि पाकिस्तान के वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने मंगलवार को वॉशिंगटन में स्कॉट बेसेंट से मुलाकात की. वित्त मंत्रालय के बयान के मुताबिक, उन्होंने क्षेत्रीय भू-राजनीतिक घटनाओं से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर का मुद्दा उठाया. हालांकि, बयान में 10 अरब डॉलर की इस मांग का कोई जिक्र नहीं किया गया.एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन फैसिलिटी अमेरिका के वित्त मंत्रालय की एक बेहद कम इस्तेमाल होने वाली व्यवस्था है. इसके तहत किसी देश को डॉलर, मुद्रा अदला-बदली (स्वैप) या सरकारी गारंटी दी जाती है, ताकि उसके विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा मिले और उसकी मुद्रा स्थिर बनी रहे. 2025 में अर्जेंटीना और उससे पहले 2002 में उरुग्वे को अमेरिका ने ऐसी एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन फैसिलिटी दी थी. इसके अलावा मेक्सिको के साथ अमेरिका की पुरानी स्वैप व्यवस्था पहले से मौजूद है, जिसकी शुरुआत 1940 के दशक में हुई थी और अब उसका आकार 9 अरब डॉलर है.बता दें कि 2023 में पाकिस्तान IMF से 3 अरब डॉलर का आपातकालीन कर्ज लेकर दिवालिया (डिफॉल्ट में जाने) होने से बच गया था. इसके बाद उसे 7 अरब डॉलर का एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी कार्यक्रम मिला. साथ ही, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए 1.3 अरब डॉलर का अलग कर्ज भी मिला. इसके बावजूद पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार अब भी सरकारी वित्तीय मदद, पुराने कर्ज को आगे बढ़ाने (रोलओवर) और चीन तथा सऊदी अरब से मिलने वाली जमा राशि पर काफी हद तक निर्भर है.आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तान ने अपनी छवि बनाने पर बहुत जोर दिया है. वहां देश के अंदर अपनी हर बड़ी नाकामी को विदेशी साजिश बताया जाता है, हर प्रदर्शन को सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है और सेना की हर कार्रवाई को देश की मजबूती के तौर पर पेश किया जाता है. लेकिन अब एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने पोल खोलकर रख दी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक शांति स्थापित करने वाले के रूप में पेश किए जाने वाले आसिम मुनीर के कार्यकाल में पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा पिछले एक दशक के सबसे खराब दौर में पहुंच गई है.रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “यह सिर्फ दिखावे का विरोधाभास नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सुरक्षा नीति की बुनियादी समस्या है. विदेशों में पाकिस्तान युद्धविराम, बातचीत और मध्यस्थता की बात करता है, लेकिन अपने देश में दबाव, प्रतिबंध, गिरफ्तारियां, लोगों के गायब होने की घटनाएं, सैन्य अभियान और सामूहिक सजा जैसे तरीके अपनाता है. जो नेतृत्व अमेरिका और ईरान के बीच अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि मजबूत करने की कोशिश करता है, वही अपने बलूच, पश्तून और कश्मीरी नागरिकों (कब्जे वाले कश्मीर) के लिए राजनीतिक जगह नहीं बना पाया।
