नवंबर में शुरू होंगे नई चीनी मील,बिहार सरकार देने जा रही है किसानों को तोहफा
कभी बिहार की भी गिनती देश के बड़े चीनी उत्पादक राज्यों में की जाती रही है. एक वक्त ऐसा था जब राज्य की अर्थव्यवस्था में गन्ना और चीनी उद्योग की अहम भूमिका थी. लेकिन धीरे-धीरे बिहार में मौजूद चीनी मिलें बंद होती गईं. इसका बुरा असर बिहार की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ गन्ना किसानों और स्थानीय रोजगार पर भी पड़ा.अब बिहार सरकार एक बार फिर इन बंद चीनी मिलों को पुनर्जीवित करने की तैयारी में है. ऐसे में सवाल उठता है कि बिहार में कितनी चीनी मिलें बंद हैं, कितनी को फिर से खोला जाएगा. सरकार के इस कदम से राज्य के युवाओं और किसानों को क्या फायदा मिलेगा.बिहार में आजादी से पहले राज्य में 33 चीनी मिलें थीं. लेकिन 1980 के दशक तक आते-आते यह 28 रह गईं. फिर धीरे-धीरे इनमें से भी तकरीबन 18 चीनें बंद हो गईं. बिहार सरकार के शुगर इंडस्ट्री डिपार्टमेंट के पोर्टल के मुताबिक अब प्रदेश में चल रहे चीनी मिलों की संख्या सिर्फ 10 रह गई हैं.

एक समय बिहार देश के कुल चीनी उत्पादन में करीब 40% योगदान देता था, लेकिन अब यह घटकर करीब 4% रह गया है.इन चीनी मिलों के बंद होने के पीछे सरकारी उपेक्षा, नई और आधुनिक तकनीकों को ना अपनाने बढ़ती उत्पादन लागत, वित्तीय संकट जैसी वजहें रहीं. राज्य के अर्थव्यस्था का रीढ़ कहलाने वाला यह उद्योग धीरे-धीरे कमजोर होता चला गया. गन्ना और चीनी उद्योग में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य बिहार से काफी आगे निकल गए. हालांकि, अब राज्य सरकार बंद पड़े चीनी मिलों में 9 को फिर पुनर्जीवित करने जा रही है.इसके पहले चरण की शुरुआत नवंबर महीने से होने जा रही है. तीन बंद चीनी मिलों को दोबारा शुरू किया जाएगा. इनमें मधुबनी की सकरी, दरभंगा की रैयाम और गोपालगंज की सासामूसा चीनी मिल शामिल हैं. इन चीनी मिलों में गन्ना पेराई की शुरुआत करने का लक्ष्य भी नवंबर 2026 को ही रखा गया है.चनपटिया शुगर मिल (पश्चिम चंपारण)बारा चकिया शुगर मिल (पूर्वी चंपारण)मोतिहारी शुगर मिल (पूर्वी चंपारण)सासामुसा शुगर मिल (गोपालगंज)मरहौरा शुगर मिल (सारण)मोतीपुर शुगर मिल (मुजफ्फरपुर)समस्तीपुर शुगर मिल सकरी शुगर मिल(दरभंगा) रैयाम शुगर मिल (दरभंगा-मधुबनी क्षेत्र)इन चीनी मिलों को दोबारा शुरू करने में सबसे बड़ी दिक्कत राज्य सरकार का इसको लेकर 1985 का अधिनियम था. 1985 के अधिनियम के कारण मिलों का संचालन केवल राज्य सरकार ही कर सकती थी. यह वजह थी अब तक बंद चीनी मिलों की जमीन का स्वामित्व बिहार राज्य चीनी विकास निगम के पास था.1985 के अधिनियम के चलते इन चीनी मिलों की जमीन के हस्तांतरण की प्रक्रिया भी अटकी हुई थी.अब गन्ना उद्योग विभाग ने कानून में संशोधन कर यह बाधा दूर कर दी है. ऐसे में सरकार अब बंद चीनी मिलों के संचालन के लिए निवेशकों को भी आमंत्रित कर रही है. इसका साफ अर्थ यह है अब बिहार में चीनी मिलों का संचालन निजी क्षेत्रों की कंपनियां भी कर सकती हैं.बिहार में 9 चीनी मिलों की शुरुआत का सबसे ज्यादा फायदा उत्तर और मध्य बिहार के गन्ना उत्पादक किसानों को मिलेगा.पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी जैसे जिलों को भरपूर लाभ होगा. 2011 की जनगणना के अनुसार इन आठ जिलों की कुल जनसंख्या लगभग 3.37 करोड़. इन जिलों की तकरीबन 75 प्रतिशत जनसंख्या खेती पर निर्भर है. इन किसानों के बीच गन्ने की खेती का रकबा बढ़ सकता है और उनकी आय में भी पहले के मुकाबले बेहद सुधार हो सकता है.बिहार में गन्ने की खेती करने वाले किसानों को बंद चीनी मिलों के चलते अपने गन्ने की फसल को दूर-दराज के जिलों या दूसरे राज्यों की मिलों तक ले जानी पड़ती थी. इससे उनके परिवहन लागत में इजाफा होता था. लेकिन अब उनके आसपास चीनी मिल खुलने से गन्ने की स्थानीय खरीद बढ़ेगी, परिवहन लागत कम होगी.सरकार ने अभी रोजगार का कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है. लेकिन उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक एक मध्यम क्षमता वाली चीनी मिल में 500 से 1000 लोगों को रोजगार मिलता है. वहीं,3,000 से 5,000 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना रहती है. ऐसे में 9 चीनी मिलों के दोबारा खुलने से तकरीबन 9000 लोगों को डायरेक्ट एम्पलॉयमेंट और करीबन 45000 लोगों इनडायरेक्ट एम्पलॉयमेंट मिल सकता है. मिल कर्मचारियों के अलावा ट्रांसपोर्ट, मशीनरी, मरम्मत, पैकेजिंग, कृषि सेवाओं और छोटे कारोबारों में भी रोजगार बढ़ने की संभावना रहेगी.देश में एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा देने की केंद्र सरकार की नीति के चलते भी चीनी मिलों की अहमियत बढ़ गई है. अब यह एथेनॉल, बिजली उत्पादन (को-जनरेशन), बायो-सीएनजी और अन्य शुगर आधारित उद्योग का भी बड़ा केंद्र बन रहा है. यही वजह है कि इसके अलावा 25 नई शुगर आधारित औद्योगिक यूनिट स्थापित करने की योजना पर भी काम कर रही है, जो किसानों की आय में इजाफे लिए अहम वजह साबित हो सकती है.बिहार सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना अगर सफल हो पाती है, तो किसानों, ग्रामीण रोजगार और राज्य की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा लाभ होगा. लेकिन सरकार को इसे जमीन पर उतारना होगा. कई मिलों की मशीनें वर्षों से बंद हैं और उनका आधुनिकीकरण करना होगा. इसके अलावा पर्याप्त गन्ना उत्पादन सुनिश्चित करना, निजी निवेश आकर्षित करना और किसानों को समय पर गन्ने के मूल्य का भुगतान करना होगा.
