पंचायत चुनाव में देरी पर हाईकोर्ट ने दिखाई सख्ती,प्रगति रिपोर्ट जल्द दाखिल करने का मिला निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण लागू करने के लिए अपनाई जा रही प्रक्रिया और इसमें हो रही देरी को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है. कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि पिछड़े वर्ग के आंकड़ों को जुटाने की प्रक्रिया में अत्यधिक देरी नहीं होनी चाहिए. कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण के निर्धारण को लेकर उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण स्थानीय निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा तैयार की गई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) पर सुनवाई करते हुए कहा कि पिछड़े वर्ग की पहचान और आनुभविक आंकड़े (EMPIRICAL DATA) जुटाने की प्रक्रिया ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे चुनावों में ज्यादा देरी हो. जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिविजन बेंच ने दशरथ यादव द्वारा दायर रिट C याचिका पर सुनवाई करते कई अहम बातें कहीं.इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता इम्तियाज हुसैन और संत कबीर नगर के रहने वाले दशरथ यादव ने पंचायत चुनाव समय पर न कराने को लेकर याचिका दाखिल की है. कोर्ट दोनों की याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही है. मामले की सुनवाई के दौरान दशरथ यादव की याचिका पर सुनवाई के दौरान यूपी राज्य ग्रामीण स्थानीय निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के वकील ने कोर्ट के समक्ष आयोग द्वारा तैयार SOP प्रस्तुत की. इस SOP के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा के. कृष्णमूर्ति एंड अन्य बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया एंड अदर (2010) मामले में तय ट्रिपल टेस्ट फ़ॉर्मूले के हिसाब से बैकवर्ड कास्ट की पहचान की जाती है जिसे विकास किशनराव गवली बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र एंड अदर (2021) के फ़ैसले और सुरेश महाजन बनाम स्टेट ऑफ़ मध्य प्रदेश एंड अदर (2022) मामले में दिए गए फ़ैसले में फॉलो किया गया था.सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि आयोग द्वारा जो SOP तैयार की गई है वह दिखने में भले ही प्रभावित करने वाली हो लेकिन जिस समय-सीमा के अंदर आयोग को काम पूरा करने का दायित्व सौंपा गया था यह उसके अनुकूल प्रतीत नहीं होती है. कोर्ट ने चिंता जताई कि इस ढर्रे से प्रक्रिया काफी लंबी खिंच सकती है.

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि इसी प्रकार का अभ्यास अन्य राज्यों द्वारा भी पिछड़े वर्ग के लोगों का व्यापक आंकड़े एकत्र करने के लिए किया गया था. कोर्ट ने जोर देकर कहा कि आयोग की वर्तमान प्रक्रिया से चुनाव काफी लंबे समय के लिए टल सकते है जो कि संविधान के संबंधित प्रावधानों की मूल भावना और जनादेश के खिलाफ है. याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट से गुहार लगाई कि पंचायतों के चुनाव लंबे समय के लिए स्थगित नहीं किए जा सकते और यदि आयोग को इसी गति से काम करने दिया गया तो आयोग गठन की अधिसूचना में तय समय से बहुत अधिक समय लग जाएगा. कोर्ट में कहा गया कि इससे पहले नगर पालिकाओं के लोकल चुनाव के मामले में इस कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने 2022 के वैभव पांडे बनाम यूपी राज्य के मामले में प्रिंसिपल सेक्रेटरी, डिपार्टमेंट अर्बन डेवलपमेंट, सिविल सेक्रेटरी, लखनऊ और अन्य के मामले में ज़रिए निर्देश दिया था कि के. कृष्णमूर्ति और अन्य के फैसले में बताए गए ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला का इस्तेमाल करके पिछड़ी जाति के लोगों का एंपिरिकल डेटा इकट्ठा करने की पूरा अभ्यास किया जाए, जिसके बाद चुनाव हुए. उन्होंने कहा कि जहां तक ग्राम पंचायतों का सवाल है सुरेश महाजन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले को देखते हुए यह अभ्यास ज़रूरी है.सभी पक्षों को सुनने और सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ इस हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने एक व्यापक और समयबद्ध SOP बनाए जाने की जरूरत पर बल दिया. कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो न केवल एक समावेशी और सटीक डेटा एकत्र करने में सक्षम हो बल्कि इसमें गति भी आए ताकि पंचायत चुनाव जल्द से जल्द कराए जा सकें. कोर्ट ने अपर महाधिवक्ता को निर्देश दिया है कि वो महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले के तहत एम्पिरिकल डेटा एकत्र करने के लिए अपनाई गई SOP को अगली सुनवाई पर कोर्ट के समक्ष पेश करें. मामला व्यापक जनहित (LARGER PUBLIC INTEREST) से जुड़ा होने के कारण हाईकोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता विजय कुमार सिंह को इस मामले में सहायता के लिए ‘एमिकस क्यूरी’ नियुक्त किया है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि आयोग अपने स्तर पर हुई आगे की प्रोग्रेस रिपोर्ट भी कोर्ट के सामने रखेगा.कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वो इस आदेश की कॉपी वरिष्ठ अधिवक्ता विजय कुमार सिंह को तत्काल उपलब्ध कराएं ताकि वो कोर्ट को आवश्यक कानूनी सहयोग प्रदान कर सकें. मामले की अगली सुनवाई 14 अगस्त को दोपहर दो बजे तय की गई है. हाईकोर्ट के इस रुख से साफ़ है कि राज्य सरकार और पिछड़ा वर्ग आयोग को अब ओबीसी आंकड़ों के सर्वे की गति तेज करनी होगी ताकि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था के तहत समय पर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराए जा सकें.
