क्या हटाए जा सकते हैं ज्ञानेश कुमार?जानिए संविधान का पूरा प्रावधान

 क्या हटाए जा सकते हैं ज्ञानेश कुमार?जानिए संविधान का पूरा प्रावधान
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों के बीच ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ के मुद्दे पर उभरे गहरे मतभेदों ने विपक्ष को सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ एक बड़ा हथियार दे दिया है. इंडिया (INDIA) ब्लॉक के नेताओं ने ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें पद से हटाने के लिए मोर्चा खोल दिया है. विपक्ष अपनी इसी मांगों को दोहराने के लिए 1 नवंबर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक “विशाल” रैली करने वाला है.इस राजनीतिक विवाद के बीच, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बड़ा बयान देते हुए साफ किया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग करने वाले किसी भी नए प्रस्ताव पर संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं के तहत ही विचार किया जाएगा. स्पीकर के इस रुख के बाद, देश के जाने-माने संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचार्य ने शुक्रवार को इस मुद्दे पर विस्तार से बात की.पी.डी.टी. आचार्य ने बताया, “संवैधानिक रूप से इसका मतलब है कि यदि आप कानून या संविधान के खिलाफ जा रहे हैं, और कई सारी अनियमितताएं कर रहे हैं, तो आप दुराचार के दोषी हैं.

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यदि आप भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, तो आप दुराचार के दोषी हैं. इसलिए यह एक बहुत बड़ा क्षेत्र है. मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ आरोप इसी प्रावधान के तहत आते हैं. अक्षमता का मतलब शारीरिक अक्षमता या मानसिक अक्षमता से है- यानी यदि कोई व्यक्ति अपनी कुछ शारीरिक समस्याओं के कारण पद पर बने रहने में असमर्थ है.”विपक्ष द्वारा पहले किए गए प्रयासों का जिक्र करते हुए आचार्य ने कहा, “प्रक्रिया वही रहेगी. प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता क्योंकि इसे कानूनों के अनुसार ही किया जाना है. तीन महीने के भीतर राजनीतिक स्थिति बदल गई है. लेकिन, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि आरोप क्या हैं, और वे (विपक्ष) इन आरोपों को किस तरह तैयार करते हैं.”कानूनों का हवाला देते हुए संविधान विशेषज्ञ ने कहा, “कानून के तहत अध्यक्ष के पास शक्ति होती है. अध्यक्ष के पास प्रस्ताव को स्वीकार करने या न स्वीकार करने की शक्ति है. यदि अध्यक्ष प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करते हैं, तो पूरा प्रस्ताव ही खत्म हो जाता है. मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग चलाने के सारे प्रयास विफल हो जाएंगे.”उन्होंने आगे कहा, “यदि अध्यक्ष प्रस्ताव को खारिज कर देते हैं, तो विपक्ष सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है. एक सामान्य प्रस्ताव और महाभियोग के प्रस्ताव में यह एक बड़ा अंतर है. इसलिए कानून यह व्यवस्था देता है कि अध्यक्ष का फैसला कानूनी रूप से सही था या नहीं, इसका निर्णय देश की शीर्ष अदालत करेगी. इसलिए विपक्ष के पास अदालत जाने और इसे चुनौती देने का अधिकार है.”यह पूछे जाने पर कि यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो क्या होगा, आचार्य ने कहा, “अगर प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो अध्यक्ष को एक जांच समिति का गठन करना होगा. यह तीन सदस्यों वाली एक बेहद उच्च-स्तरीय समिति होगी. इसमें एक सदस्य सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या कोई जज होंगे. दूसरे सदस्य, देश के किसी भी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों में से एक होंगे. वहीं, तीसरे सदस्य एक प्रतिष्ठित कानूनविद होंगे, जो किसी भी व्यक्ति के प्रभाव में न आएं.”उच्च सदन (राज्यसभा) में विपक्ष द्वारा लाए गए प्रस्ताव पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “यदि इस मामले को राज्यसभा में उठाया जाता है और वहां इसे विशेष बहुमत से पास कर दिया जाता है, तो यह प्रस्ताव लोकसभा में जाएगा. फिर लोकसभा में इस पर चर्चा होगी और वोटिंग कराई जाएगी. अगर वहां भी इसे दो-तिहाई यानी विशेष बहुमत मिल जाता है, तो मामला राष्ट्रपति के पास जाएगा. इसके बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश जारी करेंगे.” बता दें कि देश के इतिहास में अब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग नहीं चलाया गया है, यानी उन्हें इस प्रक्रिया से नहीं हटाया गया है.इससे पहले इसी साल, ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने ज्ञानेश कुमार को हटाने के प्रस्ताव पर इंडिया (INDIA) ब्लॉक के नोटिस को खारिज कर दिया था. बाद में, विपक्ष ने इसी मुद्दे पर राज्यसभा में एक नया नोटिस जमा किया था, और यह मामला अभी भी उच्च सदन में लंबित है.

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