नेतन्याहू हारे तो क्या होगा?फिलिस्तीन पर बदलेगी नीति!
इजराइल की राजनीति में होने वाला एक बदलाव पूरे मिडिल ईस्ट की तस्वीर पर असर डाल सकता है. इस महीने इजराइल में नेशनल इलेक्शन होने वाले हैं, जिसके अनुमान बेंजामिन नेतन्याहू के पक्ष में नहीं आ रहे हैं. वहां के पोल्स में बेंजामिन नेतन्याहू की हार दिखा रही है, हालांकि अभी केवल पोल्स से फैसला नहीं किया जा सकता है. लेकिन, इसी बीच ये भी सवाल सामने आ रहा है कि अगर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अगर चुनाव हार जाते हैं, तो क्या फिलीस्तीन और ईरान के लिए इजराइल की रणनीति भी बदलेगी.इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को होने वाले चुनाव को लेकर ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं. नेतन्याहू के सामने विपक्ष के नेता और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट समेत दूसरे नेताओं की चुनौती है.

लेकिन सबसे अहम बात यह है कि इजराइल की राजनीति में नेता बदलने का मतलब जरूरी नहीं कि देश की नीतियां भी पूरी तरह बदल जाएं. 7 अक्टूबर, 2023 को हुए जानलेवा हमास हमले के बाद पहला चुनाव होगा. ये भी कहा जा रहा है कि ये चुनाव काफी मुश्किल हो सकता है.बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से इजराइल की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं. उनकी सरकार की नीतियों को लेकर देश के अंदर और बाहर लगातार बहस होती रही है. 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा में हुई जंग ने इजराइल की राजनीति को और ज्यादा प्रभावित किया. अब चुनाव में नेतन्याहू के सामने विपक्षी दलों की चुनौती है. विपक्ष उनकी सरकार के कामकाज और सुरक्षा से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाता रहा है. लेकिन चुनाव सिर्फ नेतन्याहू को हटाने का मामला नहीं है.ईरान को इजराइल अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मानता है. दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनाव है, जो हाल के युद्ध की वजह से और बढ़ गया है. नेतन्याहू ईरान की सैन्य ताकत और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को कमजोर करना चाहते हैं. जानकारों का मानना है कि अगर नेतन्याहू चुनाव हार भी जाते हैं, तो ईरान के खिलाफ इजराइल की बुनियादी रणनीति में बड़े बदलाव की संभावना कम है. इसकी वजह यह है कि इजराइल के कई प्रमुख नेता ईरान को गंभीर सुरक्षा खतरा मानते हैंफिलिस्तीन का मुद्दा भी इजराइल के चुनाव में बेहद अहम है. गाजा में युद्ध, वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का विस्तार और फिलिस्तीनियों के लिए अलग देश बनाने का सवाल लंबे समय से विवाद की वजह बने हुए हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर नेतन्याहू की जगह विपक्षी नेता सत्ता में आते हैं, तो फिलिस्तीनियों के लिए कुछ मामलों में हालात संभालने की कोशिश हो सकती है. लेकिन फिलिस्तीन को एक अलग देश बनाने के सवाल पर बड़े बदलाव की उम्मीद कम है.हालांकि, नए प्रधानमंत्री के आने पर सैन्य कार्रवाई का तरीका, कूटनीति का इस्तेमाल और अमेरिका के साथ बातचीत की रणनीति बदल सकती है. यानी बदलाव हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दोनों देशों के बीच तनाव खत्म हो जाएगा. इजराइल में सत्ता परिवर्तन का असर सिर्फ ईरान और फिलिस्तीन तक सीमित नहीं रहेगा. इसका असर अमेरिका के साथ उसके रिश्तों और पूरे मिडिल ईस्ट की राजनीति पर भी पड़ सकता है.वहीं अगर नेतन्याहू दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं, तो जानकारों के मुताबिक ईरान के खिलाफ सख्त नीति और सैन्य दबाव बढ़ सकता है. वहीं, विपक्ष की सरकार आने पर इजराइल की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने और कूटनीतिक बातचीत को ज्यादा महत्व देने की कोशिश हो सकती है. हालांकि, नई सरकार के सामने भी वही सुरक्षा चुनौतियां रहेंगी. ईरान के साथ तनाव, हमास का मुद्दा और फिलिस्तीनियों के भविष्य को लेकर विवाद आसानी से खत्म नहीं होंगे.
