विदेश से सोना मंगाने की जरूरत होगी कम?पुराने सोने से बदलेगी भारत की तस्वीर
भारत में सोने की कीमतें लगातार उतार-चढ़ाव दिखा रही हैं. ऐसे में लोग सोने की खरीदारी से पूरी तरह दूरी बनाने के बजाय एक नया तरीका अपना रहे हैं. कई ग्राहक अपनी पुरानी ज्वेलरी देकर नए डिजाइन के गहने खरीद रहे हैं. इससे उनका बजट भी नहीं बिगड़ता और देश में पहले से मौजूद सोने का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है.भारत दुनिया में चीन के बाद सोने का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है. देश हर साल करीब 700 से 900 टन सोना आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय तनाव और रुपये पर दबाव के बीच सोने का भारी आयात देश की अर्थव्यवस्था पर ज्यादा बोझ डालता है. इससे व्यापार घाटा बढ़ने का खतरा भी रहता है. लेकिन भारतीय घरों में जमा सोना अब इस निर्भरता को कम करने में मदद कर रहा है. अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक, भारतीय परिवारों के पास करीब 25,000 से 50,000 टन सोना मौजूद है.वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, अगस्त 2026 में भारत का सोने का आयात घटकर 2.3 अरब डॉलर रह गया. यह जुलाई के मुकाबले 45% और एक साल पहले की तुलना में 58% कम था. इस दौरान आयात की मात्रा करीब 15 से 20 टन रहने का अनुमान था.क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कुछ बड़ी ज्वेलरी कंपनियों की ज्वेलरी बिक्री से होने वाली आय में पुराने और रिसाइकिल किए गए सोने की हिस्सेदारी 40% से ज्यादा थी.

जॉयअलुक्कास के चेयरमैन जॉय अलुक्कास के मुताबिक, अगस्त 2026 में कंपनी की करीब 73% बिक्री में पुराने सोने का एक्सचेंज शामिल था. एक साल पहले इसी अवधि में यह आंकड़ा 57% था. टाइटन के स्टोर पर अब 50% से ज्यादा लेनदेन में एक्सचेंज शामिल है. वहीं, कल्याण ज्वेलर्स में वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में रिसाइकिल सोने की हिस्सेदारी 46% से ज्यादा थी.मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोगों से अगले एक साल तक सोना खरीदने से बचने की अपील की थी. इसके बाद पुराने सोने के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया. हालांकि, ज्वेलरी कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि यह बदलाव सिर्फ महंगाई के कारण नहीं है. ग्राहक अब अपने बजट के हिसाब से गहनों का वजन, शुद्धता और डिजाइन चुन रहे हैं. पुरानी ज्वेलरी देकर वे कम खर्च में नए गहने खरीद पा रहे हैं.पुराने सोने का दोबारा इस्तेमाल होने से ज्वेलरी कंपनियों को हर बार नया सोना आयात करने की जरूरत कम पड़ती है. इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटाने में मदद मिलती है. हालांकि, उद्योग के जानकारों का कहना है कि नई ज्वेलरी बनाने और सभी तरह की मांग पूरी करने के लिए नए सोने की जरूरत बनी रहेगी. पुराने सोने के एक्सचेंज से कंपनियों की नकद कमाई और मुनाफे के मार्जिन पर भी असर पड़ सकता है. इसके बावजूद, घरों में रखे पुराने सोने का दोबारा इस्तेमाल भारत के लिए एक अहम विकल्प बनकर उभर रहा है।रिपोर्ट के मुताबिक, Gen Z यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा सोने को केवल गहने या परिवार की विरासत के तौर पर नहीं देखते। उनके लिए सोना एक निवेश का विकल्प भी है। यही वजह है कि डिजिटल गोल्ड और सोने से जुड़े दूसरे ऑनलाइन निवेश विकल्पों में युवाओं की दिलचस्पी बढ़ रही है।इस पीढ़ी के लिए सोना खरीदते समय आसान प्रक्रिया, जरूरत पड़ने पर पैसे में बदलने की सुविधा, अपनी पसंद के हिसाब से खरीदारी और सोने की जिम्मेदारी से होने वाली खरीद जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। युवा पहले ऑनलाइन जानकारी जुटाते हैं और फिर जरूरत के हिसाब से ऑनलाइन या ऑफलाइन खरीदारी करते हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2035 तक Gen Z की कुल उपभोक्ता खर्च क्षमता करीब 2 ट्रिलियन डॉलर हो सकती है। ऐसे में यह पीढ़ी भारत के गोल्ड मार्केट के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने सुझाव दिया है कि भारत में गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम, सोने की रीसाइक्लिंग, इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट, डिजिटल गोल्ड, बुलियन बैंकिंग और गोल्ड-बैक्ड वित्तीय उत्पादों को एक-दूसरे से जोड़ना चाहिए।
