अमेरिका में लगातार बढ़ रही है भारतीयों की संख्या,ट्रंप लेंगे कड़ा फैसला!
अमेरिकी कांग्रेस ने रूस और ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने का बिल पास कर दिया है. लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रसिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 नामक यह बिल 16 सितंबर हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में 262-159 वोटों से पास हो गया. सीनेट इसे पहले ही पास कर चुका है.बिल पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साइन होते ही यह कानून लागू हो जाएगा. इसका नुकसान भारत को और चीन को अधिक उठाना पड़ेगा. यूं भी राष्ट्रपति ट्रंप BRICS के दिल्ली में हुए शिखर सम्मेलन से बौखलाए हुए हैं. इसलिए वे चारों तरफ डंडा चलाएंगे. उनकी इस हरकत से लगता है कि ट्रंप अमेरिका को फिर से कोल्ड वार वाले दिनों में ले जाना चाहते हैं. पर यह उनका भ्रम है. क्योंकि दुनिया अब सिर्फ सोवियत संघ और USA जैसी धुरियों पर नहीं टिकी है. आज की दुनिया मल्टी पोलर है.दरअसल रूस और ईरान के तेल पर बंदिशें लगाना तो एक बहाना है. सच तो यह है कि USA, कनाडा, इंग्लैंड, स्वीडन. नीदरलैंड, फ्रांस, इटली, पुर्तगाल, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया आदि श्वेत बहुलता वाले देशों में ब्राउन (दक्षिण एशियाई) लोगों की बढ़ती संख्या उनको परेशान कर रही है.इसके अलावा चीन के भी काफी लोग इन मुल्कों में हैं. ये सब अपने-अपने कार्यों में कुशल और श्वेत समुदाय की तुलना में संपन्न भी हैं.

इससे श्वेत समुदाय के लोग कभी एथिनिक पहचान तो कभी धार्मिक पहचान और कभी रंगभेदी नीतियों का इज़हार करते रहते हैं. जब इन श्वेत लोगों को जरूरत थी तब सस्ते श्रम के लिए दक्षिण एशियाई (भारत, पाकिस्तान, बंगला देशी, नेपाली और श्री लंकाई) लोगों को लालच दे कर ले गए. लेकिन अपनी विद्या, बुद्धि और कौशल से इन लोगों ने जब संसाधनों पर हक जताना शुरू किया तब ये परेशान होने लगे.अभी स्वीडन में मुस्लिम आबादी की बढ़त और उनकी इकतरफा वोटिंग के चलते वहां सेंटर टू लेफ्ट विचारों वाली पार्टी ने मामूली अंतर से सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी पार्टी के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन को पीछे कर दिया है. इससे वहां प्रवासी मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध लोग नाराज हो रहे हैं. इसी तरह पिछले दिनों अमेरिका में किसी उत्सव में भारतीयों की भीड़ देख कर श्वेत अमेरिकन्स अपना द्वेष भाव जताने लगे.उनका कहना है कि भारतीय अमेरिका के अंदर सोशल डेमोग्राफी बदल रहे हैं. यह सच है कि USA में प्रवासी भारतीयों की संख्या काफी है. होटल, डिपार्टमेंटल स्टोर्स, गैस स्टेशन (पेट्रोल पम्प), ट्रांसपोर्ट उद्योग पर उनकी जबरदस्त पकड़ है. इसके अलावा भारत से गए टेक्निकल और कंप्यूटर एक्सपर्ट वहां पर छा गए हैं. क्योंकि भारत के इंस्टीट्यूट्स बेहतर और सस्ती शिक्षा देते हैं. किंतु अच्छी जॉब यहाँ नहीं मिल पाती. इसलिए वे अमेरिका कूच कर जाते हैं.खुद वहां बसे भारतीय भी इस बात को स्वीकार करते हैं. फिलाडेल्फिया में रह रहे कंप्यूटर इंजीनियर अतुल अरोड़ा बताते हैं कि अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की आबादी सन 2000 में लगभग 1.8 मिलियन थी, जो 2023 में लगभग 5.2 मिलियन हो गई (लगभग 174 प्रतिशत की वृद्धि). भारतीय प्रवासी करीब 32 लाख हैं.अर्थात् मैक्सिकन समूह के बाद दूसरे सबसे बड़े विदेशी जन्म वाले समूह हैं. वे कुल अमेरिकी आबादी का सिर्फ एक प्रतिशत से थोड़े ज्यादा हैं, लेकिन कुछ क्षेत्रों (कैलिफोर्निया, टेक्सास, न्यू जर्सी, न्यूयॉर्क) और खासतौर पर टेक, हेल्थकेयर, फार्मा और उच्च शिक्षा में उनका प्रभाव ज्यादा दिखता है. वे औसत से कहीं ज्यादा शिक्षित (लगभग 77-82 प्रतिशत के पास बैचलर या उससे ऊपर की डिग्री) और उच्च आय वाले तथा मीडियम हाउसहोल्ड इनकम लोग हैं.इससे लोकल इकोनॉमी और टैक्स बेस पर सकारात्मक असर पड़ता है. कुछ सबअर्ब्स में Little India जैसे इलाके बढ़ रहे हैं, जहां सांस्कृतिक बदलाव महसूस होता है, लेकिन समग्र राष्ट्रीय डेमोग्राफी पर असर छोटा है. खाड़ी देशों के संकट वाले लोग अमेरिका नहीं जा रहे हैं. अमेरिका जाने वाले ज्यादातर भारतीय उच्च-कौशल वाले हैं. जो H-1B वीजा, स्टूडेंट वीजा या फैमिली रूट से वहां पहुंचे हैं.दूसरी तरफ अनेक भारतीय प्रोफेशनल्स वीजा अनिश्चितता के कारण अमेरिका से भारत लौट भी रहे हैं. अमेरिकन्स अक्सर साउथ एशियन प्रवासियों को भी इंडियन समझ लेते हैं या भ्रमित होते हैं. यूं अमेरिका में एशियन शब्द ज्यादातर ईस्ट/ साउथईस्ट एशिया (चीनी, जापानी, कोरियाई,वियतनामी आदि) के लिए इस्तेमाल होता है. साउथ एशियन (भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, श्रीलंकाई आदि) को अक्सर Indian कह दिया जाता है.ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि इस समुदाय की एथिनिक और सांस्कृतिक पहचान समान है. कई गैर-भारतीय साउथ एशियन इसे नापसंद करते हैं. भारतीय खुद भी अक्सर साउथ एशियन संबोधन से बचते हैं. वे अपनी अलग सिविलाइजेशनल आइडेंटिटी रखना चाहते हैं. कम आबादी वाले इलाकों में कुछ पाकिस्तानी/ नेपाली और बांग्लादेशी रेस्तरां और दुकानें ‘हिमालयन रेस्तराँ’ लिखते हैं. इससे भ्रम हो जाता है कि ये सब भारतीय हैं.जैसे वहां रेस्तरां अक्सर लखनऊ कुजिन या बनारस कुजिन नाम वाले मिल जाएंगे. किंतु हो सकता है वे पाकिस्तानी या बांग्लादेशी चला रहे हों. शायद यही कारण है कि Pew Research के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में भारत के प्रति अनुकूल राय 2023 में 51 प्रतिशत थी. वह अब 2026 में लगभग 45 प्रतिशत के आसपास है.टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रिका दिनमान के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार सतीश झा, आजकल अमेरिका के बोस्टन शहर में बसे हैं, उन्होंने कई बेस्ट सेलर पुस्तकें भी वहां लिखी हैं. उनका कहना है कि भारतीय अभी अमेरिका का जनसांख्यिकी संतुलन बिगाड़ने की हैसियत में नहीं हैं. लेकिन उनका सामाजिक असर अनुपात से कहीं बड़ा है. भारतीय अब मैक्सिको के बाद अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा विदेश में जन्मा समुदाय हैं. सन् 2010 से 2024 के बीच उनकी संख्या लगभग 78 प्रतिशत बढ़ी.झा कहते हैं, इस असर की वजह केवल आबादी नहीं है. भारतीय डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, प्रोफ़ेसरों, उद्यमियों और निवेशकों की मौजूदगी उन संस्थाओं में है जहाँ अमेरिका का अगला दौर बनता है. न्यू जर्सी, कैलिफ़ोर्निया, टेक्सस, मैसाचुसेट्स और जॉर्जिया के कुछ हिस्सों में भारतीयों ने स्कूलों, कारोबार, धार्मिक संस्थाओं और स्थानीय राजनीति तक का चेहरा बदला है.दिवाली अब केवल घर के भीतर का त्योहार नहीं रही. भारतीय खाना, संगीत, योग, मंदिर और भाषाएँ अमेरिकी जीवन में दिखाई देने लगी हैं. फिर भी भारतीय समुदाय को एक ही सम्पन्न और सफल वर्ग मान लेना ग़लत होगा. सिलिकॉन वैली का इंजीनियर, न्यू जर्सी का डॉक्टर, टेक्सस का होटल-मालिक, विश्वविद्यालय का छात्र, दुकान चलाने वाला परिवार और बिना वैध दस्तावेजों के आया व्यक्ति, इनकी दुनिया एक नहीं है.भारतीय अमेरिका को बदल रहे हैं, लेकिन वे स्वयं भी अमेरिका में आकर बदल रहे हैं. इसलिए सही उत्तर यह है: भारतीय अभी अमेरिका की पूरी जनसांख्यिकी नहीं बदल रहे, लेकिन उसकी पेशेवर, शैक्षिक, उपनगरीय और सांस्कृतिक बनावट को गहराई से बदल रहे हैं. फिर भी युवा अमेरिकन्स और कुछ राजनीतिक समूहों में भारत के प्रति आलोचना ज्यादा है (हिंदू राष्ट्रवाद, व्यापार नीतियां, या चीन के साथ संबंध जैसे मुद्दों पर).न्यूजर्सी के भारतीय मूल के उद्यमी चरण सिंह के अनुसार अमेरिका हमेशा से ही इमिग्रेंट्स से बनता रहा है. आयरिश, इटालियन, मैक्सिकन, चीनी समुदायों की तरह भारतीय समुदाय भी अब अमेरिकी समाज की उसी कहानी का नया अध्याय है. हर समुदाय का प्रभाव पडता है. मगर यह समुदाय अधिकांशतः शांतिपूर्ण, कानून का पालन करने वाला, पढ़ा लिखा, सबके साथ सद्भाव रखता है. मेरा मानना है कि इस वर्ग का यूएसए की प्रगति में जनसंख्या के अनुपात से बड़ा प्रभाव है, विशेषरुप से सभी तकनीकी, मेडिसिन, शिक्षा के क्षेत्र में. यहां भारतीय समुदाय की आबादी 32 लाख और 7 से 8 लाख के बीच पाकिस्तानी हैं. चूंकि दोनों का रंग-रूप, कद काठी समान हें, अतः ऐसे लौगों को भी भारतीय या हिन्दूं आसानी से मान लिया जाता है.
