पाकिस्तान ने बलूच विद्रोह को भारत से जोड़ा,नैरेटिव की लड़ाई हुई शुरू
पाकिस्तान एक बार फिर बलूचिस्तान में जारी हिंसा और अलगाववादी आंदोलन को भारत से जोड़ने की कोशिश कर रहा है. इसके लिए पाकिस्तान ने एक नया नैरेटिव तैयार किया है, जिसमें बलूच विद्रोही संगठनों को फितना अल-हिंदुस्तान यानी भारत से जुड़ा खतरा बताया जा रहा है.24 अगस्त को बलूच लिबरेशन आर्मी यानी BLA ने बलूचिस्तान के मस्तुंग में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर हमले की जिम्मेदारी ली. BLA का दावा है कि IED हमले में 13 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए. ये हमला ऐसे समय हुआ, जब पाकिस्तान बलूचिस्तान में बड़े स्तर पर आतंकवाद विरोधी अभियान चलाने का दावा कर रहा है.पाकिस्तान लंबे समय से बलूचिस्तान में हिंसा के लिए भारत पर आरोप लगाता रहा है. लेकिन अब फर्क ये है कि इस आरोप को सरकारी भाषा का हिस्सा बनाया जा रहा है. मई 2025 में पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने सरकारी संस्थानों को निर्देश दिया था कि बलूचिस्तान में सक्रिय विद्रोही संगठनों के लिए फितना अल-हिंदुस्तान शब्द का इस्तेमाल किया जाए. इसके बाद पाकिस्तानी सेना और सरकार के बयानों में भी यह शब्द लगातार दिखाई देने लगा.21 अगस्त को पाकिस्तान की सेना के जनसंपर्क विभाग ISPR ने दावा किया कि खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में कार्रवाई के दौरान 49 आतंकवादी मारे गए. इनमें से 37 को फितना अल-हिंदुस्तान से जुड़ा बताया गया. यानी पाकिस्तान अब सिर्फ यह नहीं कह रहा कि किसी खास हमले के पीछे भारत का हाथ है, बल्कि बलूचिस्तान के पूरे विद्रोही आंदोलन को भारत से जोड़ने की कोशिश कर रहा है.बलूचिस्तान का संकट पुराना है हालांकि, बलूचिस्तान में विद्रोह और राजनीतिक असंतोष कोई नया मामला नहीं है.

पाकिस्तान बनने के शुरुआती वर्षों से ही इस इलाके में अलगाववाद और केंद्र सरकार के खिलाफ असंतोष देखने को मिलता रहा है.बलूच नेताओं की शिकायतों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्रांतीय स्वायत्तता, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार, विकास में असमानता और सुरक्षा बलों की कार्रवाई जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं.इसलिए बलूचिस्तान की समस्या को सिर्फ भारत की कथित साजिश के तौर पर देखना पूरे विवाद की जटिलता को नजरअंदाज करना होगा. इसका मतलब यह भी नहीं है कि बलूच विद्रोही संगठनों द्वारा किए गए हमलों को सही ठहराया जाए. आम नागरिकों या सुरक्षा बलों पर आतंकवादी हमले किसी भी स्थिति में जायज नहीं हो सकते।पाकिस्तान के लिए फितना अल-हिंदुस्तान शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक तौर पर काफी उपयोगी हो सकता है. इससे बलूचिस्तान की आंतरिक समस्या को एक बाहरी दुश्मन से जोड़ने का मौका मिलता है. यानी सवाल यह कम हो जाता है कि बलूचिस्तान में दशकों से अस्थिरता क्यों बनी हुई है और पाकिस्तान की सुरक्षा नीति वहां समस्या को खत्म क्यों नहीं कर पाई. पाकिस्तान को इस नैरेटिव से भारत के खिलाफ एक नया मोर्चा भी मिलता है.अक्सर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP और उससे जुड़े आतंकियों के लिए फितना अल-खवारिज शब्द का इस्तेमाल करता है. वहीं बलूचिस्तान के मामले में सीधे भारत का नाम जोड़कर फितना अल-हिंदुस्तान कहा जा रहा है.नैरेटिव पाकिस्तान अब इस आरोप को सिर्फ अपने देश तक सीमित नहीं रख रहा. वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी यह दावा कर रहा है कि जिस तरह भारत पाकिस्तान पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाता है, उसी तरह पाकिस्तान भी भारत पर अपने यहां आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप लगा सकता है.भारत ने पाकिस्तान के इस नैरेटिव का विरोध किया है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने फितना अल-हिंदुस्तान जैसे शब्दों को पाकिस्तान की ओर से फैलाया जा रहा भ्रामक प्रचार बताया है.भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारत का कूटनीतिक अभियान और तेज हुआ है. ऐसे में पाकिस्तान की कोशिश है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर कहानी को इस तरह पेश किया जाए कि दोनों देश एक-दूसरे पर आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप लगा रहे हैं.बलूचिस्तान सिर्फ पाकिस्तान का एक प्रांत नहीं है, बल्कि रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है. इसकी सीमा ईरान और अफगानिस्तान से लगती है और इसके पास अरब सागर में लंबा समुद्री तट है.यहीं चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC और ग्वादर पोर्ट भी स्थित हैं. बलूचिस्तान में चीनी नागरिकों और चीन से जुड़ी परियोजनाओं पर पहले भी हमले होते रहे हैं. ऐसे में यहां की अस्थिरता चीन के लिए भी बड़ी चिंता है. इसका असर ईरान-पाकिस्तान सीमा और अफगानिस्तान से जुड़े व्यापक आतंकी नेटवर्क पर भी पड़ता है.भारत के सामने चुनौती यह है कि वह पाकिस्तान के इस नैरेटिव का जवाब देते हुए बलूचिस्तान के आतंकी हमलों का समर्थन करता हुआ नजर न आए.नई दिल्ली के लिए तीन मुद्दों को अलग-अलग रखना महत्वपूर्ण है—पहला, बलूचिस्तान में राजनीतिक और सामाजिक असंतोष का अपना इतिहास है.दूसरा, आतंकवाद और आम नागरिकों पर हमले किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हैं.तीसरा, भारत पर बलूचिस्तान में आतंकवाद को समर्थन देने के पाकिस्तान के आरोपों को सबूतों के आधार पर ही परखा जाना चाहिए. यानी किसी भी संगठन के नाम में ही भारत को जोड़ देना अपने आप में सबूत नहीं बन जाता.फितना अल-हिंदुस्तान सिर्फ एक शब्द नहीं है. पाकिस्तान इसे सरकारी बयानों, सैन्य अभियानों और अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए लगातार इस्तेमाल कर रहा है. पाकिस्तान की कोशिश है कि बलूचिस्तान की दशकों पुरानी आंतरिक समस्या को भारत-पाकिस्तान संघर्ष के एक और अध्याय के रूप में पेश किया जाए.भारत के लिए चुनौती यह है कि वह इस नैरेटिव का जवाब तथ्यों और सबूतों के आधार पर दे और पाकिस्तान की उस कोशिश को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उजागर करे, जिसमें बलूचिस्तान की जटिल राजनीतिक और सुरक्षा समस्या की पूरी जिम्मेदारी भारत पर डालने की कोशिश की जा रही है.कुल मिलाकर, फितना अल-हिंदुस्तान पाकिस्तान की सिर्फ नई शब्दावली नहीं, बल्कि बलूचिस्तान संकट को भारत से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नया नैरेटिव बनाने की कोशिश है।
