बेगमों की अंग्रेजों से पेंशन की मांग से बादशाह हुए थे नाराज़,वाज़िद अली शाह की इनसाइड कहानी
अवध के बादशाह वाज़िद अली शाह अब लखनऊ से दूर कलकत्ते के गार्डन रिज में मिनी लखनऊ बसाये हुए थे. आमदनी का जरिया अंग्रेजों से मिलने वाली सालाना बारह लाख पेंशन थी. लेकिन शौक- रंगारंग महफिले और शाही शानशौकत के खर्चे बदस्तूर थे. इधर पुरानी बेगमों बीच घमासान था. उधर बादशाह की नई शादियों का सिलसिला जारी था. 1860 में बादशाह को खुशखबरी मिली कि गदर के दौरान अंग्रेजों द्वारा छिपाया कैसरबाग का खजाना उन्हें मिलने वाला है. रत्नों-आभूषणों से भरे लकड़ी के 13 मजबूत बक्से उन्हें सिपुर्द हुए. लेकिन उनके बड़े खर्चों के लिए इनकी नीलामी से जुटी राशि जो आज के दौर के लिहाज से तकरीबन तीन सौ करोड़ थी, खास मददगार साबित नहीं हुई. पढ़िए अवध के रंगीले आख़िरी बादशाह वाज़िद अली शाह के कुछ दिलचस्प किस्से.13 मार्च 1856 को लखनऊ से रवाना होते समय वाज़िद अली शाह के साथ दो निकाहशुदा और एक मुताह बेगम थी. हज़रतमहल सहित नौ तलाकशुदा बेगमों के अलावा कितनी बेगमें वे लखनऊ में छोड़ गए थे, इसके बारे में सिर्फ अनुमान लगाए जाते हैं. इसकी बड़ी वजह यह थी कि मुताह शादियों में हमेशा गवाहों की जरूरत नहीं होती थी. वैसे बादशाह की अपनी किताब “परीखाना” बताती है कि 1848 तक उनकी बेगमों की तादाद पचास के ऊपर पहुंच चुकी थी.

ब्रिटिश रिकॉर्ड के मुताबिक, बादशाह के घनिष्ठ आश्रितों में 2 निकाहशुदा बीवियां, महल में रहने का अधिकार रखने वाली 33 महल्लात, बेगमें 176 बेगमें, 14 रखैलें थीं. उसके अलावा 1880 से 1887 के बीच शादी की नई 27 बेगमें उनके हरम में जुड़ीं. बेटे 22, बेटियां 17, पौत्र और भांजे 10,पौत्रियां 7 और बहुएं 6 भी उनके साथ थीं.1857 की क्रांति से वाज़िद अली शाह का कोई संबंध नहीं था, लेकिन फिर भी आशंका में अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बनाए रखा था. जिला मैजिस्ट्रेट फर्ग्यूसन की रिपोर्ट के मुताबिक जून 1858 तक गार्डन रिज में बादशाह के लगभग छह सौ निजी सेवकों और बीस खास अमीर अपने परिवारों के साथ आबाद थे. बेगमों और दासियों की तादाद 183 थी. बादशाह से जुड़े रिज में रहने वालों की तादाद लगभग छह हजार थी. वहां बेगमों के लिए 170 मकान थे. फर्ग्यूसन की गणना में वहां तब 250 बंगले थे.बेगमों के लिए बंगलों के साथ छप्परों और झोपड़ियों तक के इंतजाम का उसने जिक्र किया है. हालांकि उस वक्त वहां शरणार्थी शिविर जैसे हालात थे. अप्रैल से सितंबर 1859 के बीच अधिक संख्या में बेगमें और दरबारी लखनऊ से गार्डन रिज पहुंचे. जुलाई 1859 में बादशाह की रिहाई हुई. उस समय तक उनकी सालाना बारह लाख पेंशन रिलीज़ नहीं हुई थी. साहूकारों से कर्ज भी लिए गए थे. जाड़े में जब भुगतान शुरू हुआ तो बादशाह के खर्चे पूरी तेजी में आ गए.बादशाह के अपने शौक और खर्चों के साथ ही खासतौर पर बेगमों के लिए पक्के मकानों सहित तमाम मदों के लिए भारी धनराशि की जरूरत थी. इस बीच 1860 की शुरुआत में उन्हें खबर मिली कि ताज के रत्न उन्हें वापस किए जा रहे हैं. 1857 की क्रांति के दौरान अवध के कमिश्नर सर हेनरी लारेंस ने कैसरबाग खजाने को कब्जे में लेकर टीन के कनस्तरों में भर रेजिडेंसी के लॉन में उन्हें गाड़ दिया था.ब्रिटिश सेना और बागी सिपाहियों के बीच लखनऊ में बड़ी जंग लड़ी गई थी. रेजिडेंसी तो सीधे बागियों के निशाने पर थी. तोप के गोले और गोलियों की रेजिडेंसी पर बरसात हुई थी. नवाब की किस्मत से इस रणस्थल पर जमीन में गड़ा उनका खजाना सुरक्षित. क्रांति की विफलता और लखनऊ पर एक बार फिर ब्रिटिश फौजों के कब्जे के बाद इस खजाने को निकाला और रत्नों-आभूषणों को सूचीबद्ध कर लकड़ी के तेरह मजबूत बक्सों में सील किया गया.सब कुछ लुटा चुके बादशाह के लिए ये तेरह बक्से आंसू पोंछने वाले थे. ये बक्से उन्हें सिपुर्द किए जाएं, इसके पहले ही उनकी पहली निकाहशुदा पत्नी ख़ास महल ने कुछ रत्नों और गहनों पर अपना दावा पेश किया. बादशाह के मामलों की देख-रेख के लिए तैनात तत्कालीन ब्रिटिश एजेंट मेजर हर्बर्ट को बताया गया कि बेग़म को बादशाह की रजामंदी से ही गहने मिलना मुमकिन हैं.असलियत में इस समय तक ख़ास महल और बादशाह के बीच रिश्ते काफी बिगड़ चुके थे. इसकी वजह ख़ास महल की लार्ड कैनिंग को लिखी वह चिट्ठी थी, जिसमें उन्होंने अपने हजारों रुपए महीनों के खर्चे और अपने बेटे को गद्दी का वारिस बताते हुए बादशाह से अलग पेंशन दिए जाने की मांग की थी. ब्रिटिश हुकूमत ने उनकी अलग पेंशन की मांग ठुकरा दी थी. गहनों की ख़ास महल की मांग भी अनसुनी रही. बादशाह ने रत्नों-आभूषणों के तेरह बक्से पाते ही उन्हें नीलामी के लिए कलकत्ता के मशहूर जौहरी हेनलिटन एंड कम्पनी को सौंप दिया. उस वक्त इनकी नीलामी से पांच लाख की रकम जुटी थी. मौजूदा समय में इस रकम का तकरीबन तीन सौ करोड़ तक आंका जाता है. हालांकि बादशाह की जरूरतों के लिहाज से यह रकम भी नाकाफी थी.10 अप्रैल 1860 को गार्डन रिज में लगी आग ने वहां भारी तबाही ला दी. झोपड़ियों और छप्परों के साथ ही अनेक बंगले भी जल गए. बादशाह के हाथ तंग थे लेकिन खर्च बेकाबू थे. यहां तक कि वे अपने सलाहकार मुंशी सफदर अली के भी चार लाख के कर्जदार थे. बेगमों को जो खर्च मिलता था , उससे वे असंतुष्ट थीं. उनमें कई बादशाह के लिए नियुक्त ब्रिटिश एजेंट के जरिए सरकारी खजाने से सीधे पेंशन की मांग कर रही थीं. उधर ब्रिटिश सरकार बादशाह की एक लाख महीने की पेंशन के अलावा फूटी कौड़ी देने को तैयार नहीं थी.फरवरी 1878 में बादशाह उस समय बिफर पड़े जब उन्हें ढाई हजार काटकर 97,500.00 पेंशन मिली. बताया गया कि ढाई हजार रुपया सीधे बड़े शहजादे फरीदुद्दीन कद्र को दे दिया गया. उस समय तक फरीदुद्दीन को वालिद से नब्बे रुपया महीना मिलता था, जिससे उसका गुजारा नहीं चल पा रहा था.पेंशन से सीधे कटौती के बादशाह के कड़े एतराज के जवाब में सरकार ने उन्हें धमकी दी कि अगर अपने आश्रितों की पेंशन वे खुद नहीं बढ़ाते तो उनके आर्थिक मामले ब्रिटिश एजेंट माउब्रे थॉम्पसन को सौंप दिए जायेंगे. जवाब में बादशाह ने दूसरा रास्ता निकाला. उन्होंने पेंशन बढ़ाने की मांग करने वाली माशूक महल और वाजिद महल को तलाक दे दिया. माशूक महल उस फरीदुद्दीन कद्र की मां थी,जिसे ब्रिटिश सरकार ने बादशाह की पेंशन से ढाई हजार सीधे भुगतान कर दिया था. तलाकशुदा दोनों बेगमों ने थॉम्पसन और सरकार को पत्र लिखकर अपने ऐश्वर्य के पुराने दिनों और फिर दुर्दिनों में भी बादशाह के साथ देने का जिक्र करते हुए मदद की गुहार की.थॉम्पसन की दख़ल की कोशिशों को बादशाह ने अपने मज़हबी और घरेलू मामलों में दखल बताया. थॉम्पसन ने सरकार को लिखा कि अगर नवाब सभी पत्नियों, पूर्व पत्नियों और आश्रितों को उदारता पूर्वक न सही लेकिन बुनियादी जरूरतों का ख्याल रखकर पेंशन दें तो यह रकम चौबीस हजार पांच सौ रुपए महीना ठहरती है. पेंशन में पहली कटौती के बाद ही नवाब चौकन्ने थे. कलकत्ता में गुजारे बीस सालों में बादशाह ने मुताह शादी की पचास बेग़मों को तलाक दिया. लेकिन 31 जुलाई 1878 को मुताह शादी की 27 बेग़मों को एक ही दिन में तलाक देने की ख़बर जब एजेंट थॉम्पसन को मिली तो उसने इसका विरोध किया. कहा कि अलग होने के बाद भी उन्हें गुजारा भत्ता दें. 24 फरवरी 1879 को बादशाह ने थॉम्पसन से कहा कि तेल की थोड़ी सी मात्रा जमीन में कितनी दूर तक फैलाई जा सकती है! जाहिर है कि वाज़िद अली शाह अपनी जरूरतों के लिहाज से पेंशन बढ़ाये जाने की मांग कर रहे थे।
