फिर से मुश्किल में आनंद मोहन,निकलने वाली है सारी हेकड़ी!समझिए कैसे?
पूर्व सांसद आनंद मोहन की रिहाई और खड़े कर दिए कई बड़े सवाल. सवाल ये कि क्या कोई राज्य सरकार किसी दोषी को समय से पहले रिहा करने के लिए कानून में संशोधन कर सकती है? यदि कर सकती है तो उसकी संवैधानिक सीमा क्या होगी? क्या सरकार का रिमिशन देने का अधिकार पूरी तरह विवेकाधीन है या फिर उस पर भी न्यायपालिका की निगरानी लागू होती है?बिहार के पूर्व सांसद और बाहुबली नेता आनंद मोहन की समयपूर्व रिहाई ने इन्हीं सवालों को देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंचा दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है, लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत ने बिहार सरकार से जिस तरह के सवाल पूछे, उसने पूरे मामले को फिर से राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है.

यह विवाद केवल एक व्यक्ति की रिहाई का नहीं है. अदालत के सामने मूल प्रश्न यह है कि क्या राज्य सरकारें जेल नियमों में बदलाव कर किसी दोषी को समयपूर्व रिहा कर सकती हैं और यदि ऐसा करती हैं तो उस प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता क्या होगी. यही वजह है कि इस मामले पर केवल बिहार ही नहीं, बल्कि देशभर के कानूनी विशेषज्ञों और राज्य सरकारों की भी नजर है.इस पूरे विवाद की जड़ करीब तीन दशक पुरानी है. पांच दिसंबर 1994 को मुजफ्फरपुर में गैंगस्टर छोटन शुक्ला की शवयात्रा निकाली जा रही थी. उसी दौरान तत्कालीन गोपालगंज के जिलाधिकारी जी. कृष्णैया सरकारी वाहन से वहां से गुजर रहे थे. आरोप है कि उग्र भीड़ ने उनकी गाड़ी रोक ली, उन्हें बाहर निकाला और पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी. ड्यूटी पर तैनात एक आईएएस अधिकारी की इस तरह हत्या ने पूरे प्रशासनिक ढांचे को झकझोर दिया था.जांच के दौरान कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ और आनंद मोहन पर भी भीड़ को उकसाने का आरोप लगा. ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी मानते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई. बाद में पटना हाईकोर्ट ने इस सजा को उम्रकैद में बदल दिया. वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. इसके बाद माना गया कि इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है.करीब ग्यारह साल बाद यह मामला फिर चर्चा में आया. अप्रैल 2023 में बिहार सरकार ने बिहार प्रिजन मैनुअल, 2012 के नियम 481(1)(a) में संशोधन किया. इस नियम के तहत पहले ड्यूटी पर तैनात लोक सेवक की हत्या के दोषियों को सामान्य रिमिशन का लाभ नहीं मिल सकता था. संशोधन के दौरान इस प्रतिबंध को हटा दिया गया.संशोधन के कुछ ही दिनों बाद आनंद मोहन की समयपूर्व रिहाई हो गई. सरकार ने इसे अपनी जेल नीति के तहत लिया गया निर्णय बताया, लेकिन विपक्ष, कई पूर्व अधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों ने सवाल उठाए कि क्या यह संशोधन किसी व्यापक नीति सुधार का हिस्सा था या फिर किसी एक व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया था. यहीं से यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया.दिवंगत आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया ने बिहार सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. उनका कहना है कि सरकार ने नियमों में संशोधन केवल आनंद मोहन को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया. उनका यह भी तर्क है कि ड्यूटी पर तैनात एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी की हत्या जैसे गंभीर अपराध को सामान्य अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता.दूसरी ओर बिहार सरकार ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि राज्य सरकार को जेल नीति बनाने और उसके अनुरूप रिमिशन देने का अधिकार है. सरकार का दावा है कि संशोधन किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि नीति के तहत किया गया था. अब सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि इन दोनों पक्षों में कानून किसके साथ खड़ा है.आनंद मोहन मामले में सबसे अधिक जिस शब्द की चर्चा हो रही है, वह है ‘रिमिशन’. सामान्य भाषा में इसे सजा में कमी कहा जाता है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि दोषी बरी हो गया या उसकी सजा समाप्त हो गई. दोषसिद्धि बरकरार रहती है, केवल जेल में बिताई जाने वाली अवधि कम हो सकती है.रिमिशन देना सरकार का अधिकार जरूर है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है. सरकार को यह साबित करना होता है कि उसने कानून, संविधान और तय प्रक्रिया का पालन करते हुए निष्पक्ष निर्णय लिया है. यदि अदालत को लगता है कि प्रक्रिया में मनमानी हुई है या किसी विशेष व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए नियम बदले गए हैं, तो ऐसे निर्णय की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है.सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केवल आनंद मोहन की रिहाई पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि पूरी रिमिशन प्रक्रिया को कानूनी कसौटी पर परखा. अदालत का जोर इस बात पर रहा कि क्या बिहार सरकार ने अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल निष्पक्ष और कानून के अनुरूप किया या फिर नियमों में बदलाव कर किसी एक व्यक्ति को लाभ पहुंचाया गया. अदालत के सवालों से यह संकेत मिला कि वह केवल अंतिम आदेश नहीं, बल्कि निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया की वैधता की जांच कर रही है.सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि क्या आनंद मोहन ने वास्तविक कारावास की आवश्यक अवधि पूरी की थी. क्या रिमिशन देने से पहले उनके पूरे आपराधिक रिकॉर्ड, जेल में आचरण और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट पर विचार किया गया. अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या पैरोल, उम्र और अन्य तथ्यों का सही तरीके से परीक्षण हुआ था.सबसे अहम सवाल यह था कि क्या बिहार प्रिजन मैनुअल में संशोधन किसी व्यापक नीति का हिस्सा था या उसका उद्देश्य किसी एक व्यक्ति को लाभ पहुंचाना था. इन सवालों ने इस पूरे मामले को केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि संवैधानिक परीक्षण का विषय बना दिया. भारतीय कानून में रिमिशन का प्रावधान सरकार को कुछ परिस्थितियों में सजा की अवधि कम करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 और 433 राज्य सरकार को विशेष परिस्थितियों में सजा कम करने या उसके स्वरूप में बदलाव का अधिकार देती हैं. वहीं धारा 433A गंभीर अपराधों में न्यूनतम वास्तविक कारावास की अवधि से जुड़ी महत्वपूर्ण शर्तें निर्धारित करती है. संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल को भी क्षमादान संबंधी विशेष अधिकार प्राप्त हैं.सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि रिमिशन किसी कैदी का मौलिक अधिकार नहीं है. यह सरकार का विवेकाधीन अधिकार है, लेकिन इसका प्रयोग निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुरूप होना चाहिए. सरकार को अपराध की प्रकृति, जेल में कैदी के आचरण, पीड़ित पक्ष की स्थिति, जेल प्रशासन और जिला प्रशासन की रिपोर्ट तथा रिमिशन बोर्ड की सिफारिश जैसे सभी पहलुओं पर विचार करना होता है. यदि इनमें से किसी भी प्रक्रिया की अनदेखी होती है तो अदालत उस निर्णय की समीक्षा कर सकती है. वरिष्ठ अधिवक्ता दीनू कुमार का कहना है कि रिमिशन किसी दोषी का अधिकार नहीं, बल्कि सरकार का विवेकाधीन निर्णय होता है. इसलिए यह जरूरी है कि सरकार हर मामले में समान कानूनी मानकों का पालन करे. अदालत को यह लगता है कि नियमों में बदलाव किसी विशेष व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया, तो ऐसे निर्णय को निरस्त किया जा सकता है. रिमिशन देते समय जेल में कैदी का आचरण, उसकी वास्तविक सजा की अवधि और प्रशासनिक रिपोर्ट जैसे सभी पहलुओं का गंभीरता से परीक्षण किया जाता है. उसके बाद रिहाई मिलती है.संविधान मामलों के जानकार अरुण कुशवाहा का मानना है कि यह मामला केवल आनंद मोहन तक सीमित नहीं है. उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट पहले भी अपने कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि आजीवन कारावास का सामान्य अर्थ पूरे जीवन तक कारावास है, हालांकि कानून के दायरे में सरकार को रिमिशन देने का अधिकार प्राप्त है. लेकिन यदि उस अधिकार का इस्तेमाल मनमाने तरीके से किया गया हो या नियमों में बदलाव का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति को लाभ पहुंचाना हो, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है.यही वह सवाल है जिसका जवाब पूरे बिहार के साथ-साथ देशभर के लोग जानना चाहते हैं. फिलहाल इसका सीधा उत्तर देना संभव नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी अपना अंतिम फैसला नहीं सुनाया है. लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत ने जिस तरह के सवाल उठाए हैं, उससे इतना स्पष्ट है कि वह बिहार सरकार के फैसले की गहराई से जांच कर रही है.यदि अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि जेल मैनुअल में संशोधन निष्पक्ष नीति का हिस्सा था और रिमिशन की पूरी प्रक्रिया कानून के अनुरूप अपनाई गई, तो आनंद मोहन की रिहाई बरकरार रह सकती है. लेकिन यदि अदालत को यह लगता है कि नियमों में बदलाव किसी एक व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया या कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो बिहार सरकार का फैसला रद्द हो सकता है. ऐसी स्थिति में आनंद मोहन की रिहाई भी प्रभावित हो सकती है.यह मामला अब केवल एक दोषी की रिहाई का विवाद नहीं रह गया है. सुप्रीम कोर्ट आने वाले दिनों में अपने फैसले में यह तय करेगा कि राज्य सरकारें समयपूर्व रिहाई के मामलों में अपने विवेकाधिकार का प्रयोग किस सीमा तक कर सकती हैं?यदि शीर्ष अदालत इस मामले में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करती है, तो भविष्य में सभी राज्यों की रिमिशन नीति की समीक्षा करनी पड़ सकती है. गंभीर अपराधों में समयपूर्व रिहाई के मानदंड अधिक स्पष्ट होंगे और सरकारों के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा भी और मजबूत होगी.इसी कारण कानूनी विशेषज्ञ इस मुकदमे को आने वाले वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक सुनवाइयों में से एक मान रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल आनंद मोहन के भविष्य का रास्ता तय करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि कानून के शासन में सरकार के विवेकाधिकार और न्यायपालिका की निगरानी के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाएगा. फिलहाल फैसला सुरक्षित है, लेकिन इतना तय है कि इसका असर बहुत व्यापक होने वाला है.
