देश से खत्म होगा क्षेत्रीय दल!देश के 70% हिस्से पर अब भाजपा का शासन

 देश से खत्म होगा क्षेत्रीय दल!देश के 70% हिस्से पर अब भाजपा का शासन
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देश के अंदर 1990 के बाद खासकर मंडल कमीशन के बाद क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ. 30 सालों से अधिक समय तक देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का दबदबा भी रहा लेकिन धीरे-धीरे अब क्षेत्रीय दल सिमटते जा रहे हैं और राष्ट्रीय दलों का फिर से तमाम राज्यों पर कब्जा होने लगा है. हालिया पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे भी इसी तरफ इशारे करते हैं। तीन दशक से अधिक समय तक देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का दबदबा रहा. मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मायावती, ममता बनर्जी, करुणानिधि, जयललिता, प्रकाश सिंह बादल, नवीन पटनायक, के चंद्रशेखर राव और अरविंद केजरीवाल सरीखे नेताओं के कारण उनके राज्यों में क्षेत्रीय दलों का विस्तार हुआ. हालांकि 2014 के बाद से बीजेपी की मजबूती के कारण इन क्षेत्रीय दलों की जमीन खिसकती जा रही है।लोकनायक जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया के सिद्धांतों पर भी क्षेत्रीय दल पुष्पित और पल्लवित हुए. जेपी आंदोलन के गर्भ से जनता दल फिर राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी जैसी पार्टियों का उदय हुआ. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे दलों ने राज्य और केंद्र दोनों स्तर पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई. करीब तीन दशकों तक गठबंधन राजनीति के दौर में इन दलों का केंद्र और राज्य की राजनीति में दबदबा रहा.इन दिनों देश की राजनीति की तस्वीर बदलती दिख रही है. राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस फिर से केंद्र में आ रही हैं, जबकि कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव सीमित होता जा रहा है. राष्ट्रवादी राजनीति के प्रतीक बन चुके भारतीय जनता पार्टी का प्रसार तेजी से हो रहा है।बिहार में नीतीश कुमार की जगह अपना मुख्यमंत्री बनाने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में भी बहुमत हासिल कर लिया है. इससे पहले ओडिशा राज्य में भी भगवा लहराया था. असम में बीजेपी की लगातार तीसरी बार जीत हासिल हुई है. राष्ट्रवादी राजनीति की बदौलत बीजेपी ने झारखंड छोड़कर पूरे उत्तर भारत पर कब्जा जमा रखा है.देश के 22 राज्यों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर बीजेपी की सरकार चल रही है. लगभग 70% हिस्से पर भगवा लहरा रहा है. कांग्रेस पार्टी की चार राज्यों में सरकार है, जबकि क्षेत्रीय दल कुछ राज्यों में सिमट कर रह गए हैं.

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पंजाब, झारखंड और तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों की सरकार है. हालिया पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने तीन राज्यों में जीत हासिल की है।हालिया बंगाल चुनाव में 294 सीटों में ममता बनर्जी की टीएमसी को 80 सीटों पर जीत मिली है. तमिलनाडु में एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके को 234 में 59 सीटों पर जीत मिली है. दोनों पार्टी सत्ता से बाहर हो चुकी है. बंगाल में बीजेपी और तमिलनाडु में अभिनेता विजय की टीवीके सत्ता में आ रही है.बिहार में तेजस्वी यादव को 2025 के विधानसभा चुनाव में महज 25 सीटों पर जीत मिली थी. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की स्थिति थोड़ी मजबूत है. 2022 चुनाव में 111 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि मायावती की बहुजन समाज पार्टी को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली थी.इसी तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी, पंजाब में अकाली शिरोमणि दल, ओडिशा में बीजू जनता दल और तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति से सत्ता से बाहर है और बेहद खराब स्थिति में पहुंच गई है.भारतीय जनता पार्टी की यूएसपी ‘डबल इंजन’ की सरकार है. डबल इंजन सरकार की बदौलत पार्टी ने विकास के नारे को आकार दिया है. मजबूत नेतृत्व, केंद्रीकृत राजनीति, स्पष्ट नैरेटिव और करिश्माई नेतृत्व ने चुनावी राजनीति को प्रभावित किया है. खासतौर पर बीजेपी ने एक केंद्रीकृत नेतृत्व मॉडल के जरिए राज्यों में भी अपनी पकड़ मजबूत की है. सामाजिक समीकरणों के पुनर्गठन के जरिये भी राजनीति को धार दिया है.मंडल राजनीति के आधार रहे जातीय समीकरण अब पहले जैसे स्थिर नहीं रहे और उसकी जगह नए सामाजिक गठजोड़ और कल्याणकारी योजनाओं ने ले लिया है. राष्ट्रीय दलों के पास बेहतर फंडिंग, आईटी सेल, मीडिया मैनेजमेंट और जमीनी संगठन है. इसके मुकाबले क्षेत्रीय दल संसाधनों और विस्तार में पीछे रह गए हैं. नेतृत्व संकट और परिवारवाद नई क्षेत्रीय दलों की मुहिम को कमजोर किया है. कई क्षेत्रीय दलों में नेतृत्व सीमित परिवारों तक सिमटा रहा.विश्व के दूसरे देशों में भी क्षेत्रीय दलों का प्रभाव रहा है. मिसाल के तौर पर स्पेन में कैटेलोनिया और बास्क क्षेत्र के क्षेत्रीय दल काफी ताकतवर हैं. जैसे कैटेलोनियन इंडिपेंडेंस मूवमेंट से जुड़े दल अक्सर राष्ट्रीय संसद में निर्णायक भूमिका निभाने का काम करते हैं. चूंकि स्पेन में अक्सर किसी एक राष्ट्रीय दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता, इसलिए क्षेत्रीय दल ‘किंगमेकर’ की भूमिका में आ जाते हैं.क्षेत्रीय दल सरकार को समर्थन देने के बदले अपने क्षेत्र के लिए अधिक स्वायत्तता, आर्थिक पैकेज और विशेष अधिकारों की मांग करते हैं और दवा भी बनाते हैं. ऐसे में राष्ट्रीय नीतियों में क्षेत्रीय हितों को शामिल करना सरकार की मजबूरी बन जाती है।

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