ममता बनर्जी की हार का कारण बनेगी SIR?जानिए TMC को कैसे हो रही है बड़ी नुकसान
पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल की सुनवाई के माध्यम से 27 लाख स्वीकृत नामों को सूची में शामिल करने का आदेश दिया था, लेकिन जमीनी रिपोर्टों से पता चलता है कि ट्रिब्यूनल काम नहीं कर रहे हैं. सुनवाई के लिए आने वाले लोगों को दस्तावेजों की चल रही जांच का हवाला देकर वापस भेजा जा रहा है.मतदाता समावेशन को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद 27 लाख बहिष्कृत नामों को फिर से शामिल करने के लिए गठित ट्रिब्यूनल अभी भी निष्क्रिय है. दक्षिण 24 परगना जैसे केंद्रों पर आवेदकों को वापस भेज दिया जाता है और बताया जाता है कि जांच जारी है और बाद में पत्र भेजे जाएंगे.जिल्लू नाहर मोल्लाह, जो कि आशा कार्यकर्ता हैं. 2002 की मतदाता सूची में नाम होने के बावजूद उनका नाम हटा दिया गया.मीडिया से बात करते हुए उन्होंने इसे अपने परिवार के लिए घोर उत्पीड़न बताया. जिल्लू नाहर ने कहा कि यह मेरे और मेरे परिवार के लिए घोर उत्पीड़न है.हावड़ा के शिबपुर की वकील नजरीन मोल्लाह ने कहा कि 300 साल पुराने पारिवारिक इतिहास और जन्म प्रमाण पत्र से लेकर पासपोर्ट तक के दस्तावेज़ों के बावजूद, एसआईआर प्रक्रिया में उनका नाम गायब हो गया. उन्होंने इसे घोर उत्पीड़न बताया और कहा कि ट्रिब्यूनल काम नहीं कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल काम नहीं कर रहा है और हमें समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें.वकील सुकमल करार ने कहा कि मां, पत्नी और भाई जैसे परिवार के सदस्यों के मतदाता होने के बावजूद उनका नाम एसआईआर से हटा दिया गया है. कोई कारण नहीं बताया गया. सुसंता मंडल ने कहा कि एसआईआर के एक और पीड़ित हैं, जो ट्रिब्यूनल से कोई जानकारी न मिलने से परेशान हैं.वहीं बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने चुनाव आयोग से सवाल किया कि 27 लाख मतदाता क्यों छूट गए? उन्होंने कहा कि हम एसआईआर प्रक्रिया से खुश नहीं हैं. चुनाव आयोग को जवाब देना चाहिए कि 27 लाख मतदाता क्यों छूट गए और चुनाव क्यों हो रहे हैं?टीएमसी नेता और कैबिनेट मंत्री शशि पांजा ने इसे ममता बनर्जी की लड़ाई की जीत बताया और इसका श्रेय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दिया. टीएमसी नेता कुणाल घोष का आरोप है कि बीजेपी ने जानबूझकर वैध मतदाताओं के नाम हटाए. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ट्रिब्यूनल पूरी तरह से काम नहीं कर रहे हैं. कुणाल घोष ने कहा कि ट्रिब्यूनल पूरी तरह से काम नहीं कर रहा है. बीजेपी ने जानबूझकर नाम हटाने की कोशिश की है. ट्रिब्यूनल के ज़रिए कितने लोगों को वोट का हक मिलेगा, यह एक बड़ा सवाल है।इन 91 लाख में से 63 लाख से ज़्यादा वोटरों के नाम फ़रवरी में चुनाव आयोग की जारी सूची में ही हटा दिए गए थे. इन लोगों को “अनुपस्थित, कहीं और चले गए, मृत या डुप्लीकेट” बताया गया.इसके अलावा 60.06 लाख वोटरों को “अंडर एडजुडिकेशन” यानी जांच के दायरे में रखा गया है.

चुनाव आयोग के मुताबिक़ इन लोगों के रिकॉर्ड में “तार्किक गड़बड़ियां” थीं, जैसे नाम की स्पेलिंग, जेंडर में ग़लती, माता-पिता से उम्र का असामान्य अंतर आदि.सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद, लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों को “अंडर एडजुडिकेशन” हर वोटर की योग्यता को उनके जमा किए गए पहचान के दस्तावेज़ों के आधार पर वेरिफ़ाई करने का काम सौंपा गया था.एसआईआर की शुरुआत बीते साल सबसे पहले बिहार में विधानसभा चुनावों से पहले हुई थी और बाद में इसे अन्य राज्यों तक बढ़ाया गया. नवंबर और फ़रवरी के बीच एसआईआर की प्रक्रिया नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में हुई.लेकिन किसी भी राज्य में सबसे ज़्यादा विवाद पश्चिम बंगाल से अधिक नहीं हुआ.एक ओर राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी बीजेपी का कहना है कि यह प्रक्रिया ज़रूरी थी ताकि बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों से आए “घुसपैठियों” के नाम हटाए जा सकें.हालांकि दूसरी ओर सत्तारुढ़ टीएमसी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के ज़रिए मुस्लिम वोटरों को निशाना बनाया गया, जो ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी का बड़ा समर्थन आधार हैं.यहां तक कि मंगलवार को ममता बनर्जी और बीजेपी नेता अर्जुन सिंह ने अपने-अपने दावों को दोहराया.कोलकाता के राजनीतिक विश्लेषक शुभमॉय मैत्रा बीबीसी बांग्ला से कहते हैं कि राज्य सरकार, चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के बीच अनबन का एसआईआर एक मुख्य कारण था.जब मामला कोर्ट में पहुंचा, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश ने भी राज्य और केंद्र सरकारों के बीच “भरोसे की कमी” और “चल रहे विवाद” पर ध्यान दिया और प्रक्रिया को पूरा करने की ज़िम्मेदारी ज्यूडिशियल अधिकारियों को सौंप दी।
