दलितों के नाम पर कांग्रेस करते आई है राजनीति,आंबेडकर से नेहरू और गांधी के नहीं थे अच्छे रिश्ते!
डॉक्टर बी.आर. आंबेडकर हर राजनीतिक दल की जरूरत हैं. आजाद भारत में लोकसभा के दो चुनावों में वे नाकाम रहे. लेकिन दिलचस्प है कि निधन के सात दशक बाद देश के वे इकलौते नेता हैं, जिनके नाम के सहारे एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में खींचने की राजनीतिक दलों को उम्मीद रहती है. आजादी की लड़ाई के दौरान उनके गांधी और कांग्रेस से तीखे मतभेद रहे. लेकिन उन्हीं गांधी की पहल पर संविधान सभा में ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन की जिम्मेदारी और फिर नेहरू मंत्रिमंडल में उन्हें शामिल किया गया.सरकार छोड़ने के बाद बॉम्बे से लोकसभा में प्रवेश की उनकी कोशिश नेहरू के चलते मुमकिन नहीं हो सकीं. लेकिन राज्यसभा में उनका रहना नेहरू ने जरूरी माना. जन्मदिन के मौके पर पढ़िए कि गांधी-नेहरू से कई मसलों में असहमतियों के बीच भी कदम-क़दम पर डॉक्टर आंबेडकर की अहमियत क्यों कायम रही?गांधी और आंबेडकर के रिश्ते बेहद जटिल रहे. कभी सहयोग तो कभी तीखा टकराव हुआ. ब्रिटिश सरकार के दौर में दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की आंबेडकर की मांग का गांधी ने विरोध किया. इसी सवाल पर यरवदा जेल में उन्होंने आमरण अनशन किया. आंबेडकर का कहना था कि दलित समाज सामाजिक ही नहीं, राजनीतिक रूप से भी वंचित है. इसलिए उसे राजनीतिक स्वायत्तता मिलना जरूरी है.उच्च जातियों के प्रभुत्व में दलित अपने प्रतिनिधि स्वतंत्र रूप से नहीं चुन सकते. संयुक्त निर्वाचन में दलित उम्मीदवार सवर्ण वोटों पर निर्भर होंगे और प्रतिनिधित्व से वंचित रहेंगे. आंबेडकर के अनुसार हिंदू समाज गंभीर रूप से विभाजित है. इसलिए एक समाज मानकर संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था दलितों के साथ अन्याय है. उनकी मांग थी कि जैसे मुसलमानों, सिखों को अलग निर्वाचन मिला, वैसे ही दलितों को भी मिलना चाहिए. दलितों को अल्पसंख्यक की तरह राजनीतिक सुरक्षा की मांग के लिए उन्होंने रामसे मैकडोनाल्ड के कम्युनल एवॉर्ड का हवाला दिया था.गांधी उस समय यरवदा जेल में बंदी थे. उन्होंने आंबेडकर की इस मांग का का कड़ा विरोध किया था. गांधी का कहना था कि दलितों को अलग निर्वाचन का मतलब हिंदू समाज को स्थायी रूप से विभाजित करना होगा. वे दलितों को हिंदू समाज का अभिन्न अंग मानते थे. उन्होंने ऐसी कोशिश को राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बताया था. उनका कहना था कि पहले मुस्लिम अलग हुए. अब अगर दलित अलग हुए तो भारतीय समाज और ज्यादा बंट जाएगा. गांधी के अनुसार छुआछूत का अंत हिंदू समाज के भीतर के सुधार से होगा.राजनीतिक अलगाव से सामाजिक सुधार नहीं होगा. अपनी मांग के समर्थन में गांधी ने जेल में ही आमरण अनशन शुरू किया. अनशन के दबाव और देशव्यापी विरोध के बीच 1932 के पूना पैक्ट में दलितों को आरक्षण मिला लेकिन पृथक निर्वाचन की मांग नहीं मानी गई. प्रांतीय विधानसभाओं में दलितों के लिए सीटें आरक्षित की गईं. सामाजिक-शैक्षिक सुधार और दलितों के उत्थान के लिए विशेष उपाय का वादा किया गया. आंबेडकर खुश नहीं थे. उन्हें लगा कि गांधी ने अपनी नैतिक शक्ति का उपयोग कर उन्हें मजबूर किया आंबेडकर ने बाद में कहा कि पूना पैक्ट दलितों के लिए एक समझौता था, जीत नहीं.आंबेडकर की जो भी असहमतियां रही हों लेकिन कांग्रेस ने उनकी विलक्षण संवैधानिक योग्यता का संविधान निर्माण में भरपूर उपयोग किया. 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन किया. उसी दिन डॉ. आंबेडकर को उसका चेयरमैन चुना गया. बेशक यह संविधान सभा का सामूहिक निर्णय था लेकिन याद रखना चाहिए कि इस सभा में गांधी के अनुयायियों का वर्चस्व था.संविधान निर्माण में अपनी शानदार भूमिका के लिए आंबेडकर का नाम भारत के इतिहास में सदैव के लिए सुरक्षित हो गया. दिलचस्प है कि आंबेडकर का संविधान सभा में प्रवेश बंगाल से जोगेंद्र नाथ मंडल के सहयोग से हुआ,जो कि पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री बने. 1946 के चुनावों में आंबेडकर की पार्टी शैडयूल्ड कास्ट फेडरेशन बुरी तरह पराजित हुई. तब मंडल ने आंबेडकर की मदद की. जिस सीट से आंबेडकर जीते थे, वह इलाका विभाजन में पाकिस्तान चला गया. नतीजतन आंबेडकर की सदस्यता समाप्त हो गईं. लेकिन इस बीच गांधी की पहल और पटेल की कोशिशों से कांग्रेस और आंबेडकर केरिश्ते कुछ सुधरे थे. उसी दौरान डॉक्टर एम. आर.जयकर के इस्तीफे से बम्बई की एक सीट रिक्त हुई. फिर कांग्रेस के सहयोग से वहां से आंबेडकर का निर्वाचन हुआ.संविधान सभा के साथ देश के पहले कानून मंत्री के रूप में भी डॉक्टर आंबेडकर सरकार का हिस्सा थे. यह महात्मा गांधी का सुझाव था, जिसे मानते हुए आंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे गैरकांग्रेसी नेताओं को कैबिनेट में जगह दी गई थी. चार साल से कुछ अधिक समय तक वे सरकार में रहे लेकिन असहमतियों के बीच 27 सितंबर 1951 को उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

इस्तीफे के कारणों का खुलासा उन्होंने 10 अक्टूबर 1951 के अपने वक्तव्य में किया. उनकी शिकायत थी कि महत्वपूर्ण फैसले कमेटियां पहले ही ले लेती हैं और फिर औपचारिकता के लिए कैबिनेट के सामने पेश किया जाता है.सिर्फ कानून मंत्री की भूमिका तक सीमित किए जाने से भी वे असंतुष्ट थे. कैबिनेट की किसी महत्वपूर्ण कमेटी का सदस्य नहीं बनाए जाने की उनकी शिकायत थी. विदेश नीति के मसलों में भी उनकी सरकार से असहमतियां थीं. उन्होंने निराशा के साथ लिखा था कि आजादी के चार साल बाद भी संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की हिमायत में बोलने वाला एक भी देश नहीं है.असलियत में सरकार में रहते हुए भी आंबेडकर की नेहरू और कांग्रेस से दूरियां कायम थीं.असलियत में सरकार में रहते हुए भी आंबेडकर की नेहरू और कांग्रेस से दूरियां कायम थीं. सरकार से उनके इस्तीफे की बड़ी वजह हिंदू कोड बिल था, जिसे 11 अप्रैल 1947 को आंबेडकर ने सदन में पेश किया था. इसे सेलेक्ट कमेटी के पास विचार के लिए भेजा गया. लंबे अंतराल पर 5 फरवरी 1951 में यह फिर से सदन के सामने था. विधवा विवाह, बेटे-बेटियों के समान अधिकार और महिलाओं को तलाक मांगने के लिए अधिकृत करने वाले इस बिल का सदन से सड़कों तक व्यापक विरोध था. विरोध करने वालों का सवाल था कि ऐसा कानून सिर्फ हिंदुओं के लिए ही क्यों जरूरी है? देश का पहला आम चुनाव निकट था.पंडित नेहरू ने चुनाव तक इसे स्थगित रखने का फैसला किया. क्षुब्ध आंबेडकर ने नेहरू की कथनी-करनी में फर्क पर तीखा प्रहार करते हुए कहा था कि बिल अगर पास हो जाता तो वे संविधान की स्वीकृति से भी ज्यादा खुश होते.1952 से 6 दिसंबर 1956 को निधन तक डॉ. आंबेडकर राज्यसभा के सदस्य रहे.कांग्रेस से वैचारिक दूरियों और नेहरू की कार्यशैली से इत्तफाक न रखने के बाद भी आंबेडकर ने सरकार में शामिल होना क्यों मंजूर किया? असलियत में दलितों की पैरोकारी उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता थी. समाज की गैरबराबरी के विरुद्ध अपने संघर्ष में इस दिशा में उनकी कोशिशें अंग्रेजों के समय शुरू हुईं.संविधान सभा में जिम्मेदारी संभालते हुए इस सवाल पर वे सचेत रहे. सरकार में शामिल रहते हुए भी उन्होंने इसे हमेशा याद रखा. इस सवाल पर सदन और सड़क दोनों जगह आंबेडकर ने नेहरू सरकार को घेरा. सदन में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का सारा ध्यान मुसलमानों की सुरक्षा के लिए है. उन्हें जरूर सुरक्षा दी जानी चाहिए. लेकिन क्या सिर्फ उन्हीं को सुरक्षा देनी चाहिए? आखिर अनुसूचित जातियों को सुरक्षा क्यों नहीं दी जाती? मुसलमानों को लेकर सरकार की जो चिंता है, उसकी अनुसूचित जातियों से तुलना कर देखें. सरकार को उनकी फिक्र नहीं है.आंबेडकर सरकार से अलग हो चुके थे. नेहरू को घेरने का कोई मौका वे नहीं छोड़ रहे थे. कांग्रेस की मदद से वे लोकसभा में पहुंचे थे. लेकिन आगे उन्हें कांग्रेस से मुकाबला करना था.1952 के लोकसभा के पहले आम चुनाव में वेबॉम्बे नॉर्थ सेंट्रल (आरक्षित सीट) से प्रत्याशी थे. कांग्रेस ने उनके पुराने सहयोगी नारायण काजरोलकर को अपना उम्मीदवार बनाया. पंडित नेहरू ने भी पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में सभाएं कीं. लगभग पंद्रह हजार वोटों के अंतर से आंबेडकर इस चुनाव में पराजित हुए थे. 1954 में भंडारा (महाराष्ट्र) सीट के उपचुनाव के जरिए आंबेडकर ने एक बार फिर लोकसभा में प्रवेश की असफल कोशिश की.इस बार वे कांग्रेस उम्मीदवार भाऊराव बोरकर से लगभग दस हजार वोटों से पीछे थे. चुनावी राजनीति में अपनी नाकामी की वजहों को लेकर आंबेडकर का निष्कर्ष था कि दिखने में भारत में लोकतंत्र है. लेकिन समाज की गहराई में अभी भी बराबरी, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की कमी है. यह लोकतंत्र सिर्फ ऊपर से चढ़ाई परत है. सच में इसकी बुनियाद (मिट्टी) अलोकतांत्रिक है. लोकसभा का चुनाव हारने के बाद भी आंबेडकर की मेधा का देश को लाभ प्राप्त होता रहा. 1952 से 6 दिसंबर 1956 को निधन तक वे राज्यसभा के सदस्य रहे.
