चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन आज होगी मां ब्रह्मचारिणी की पूजा,पढ़िए मंत्र,आरती और कथा
आज यानी 20 मार्च, शुक्रवार को चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन है. नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है. मां ब्रह्मचारिणी के एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में जलपात्र होता है. मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी का पूजन करने से मनचाहा वरदान मिलता है. मां भक्तों के दुखों को हरने वाली और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं. आइए जानते हैं नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने की विधि, शुभ मुहूर्त, मां ब्रह्मचारिणी के मंत्र, कथा और आरती।मां ब्रह्मचारिणी से जुड़ा ध्यान मंत्र:
या देवी सर्वभेतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
दधना करपद्याभ्यांक्षमालाकमण्डलू।
देवीप्रसीदतु मयी ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
इस मंत्र का अर्थ है कि, देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप दिव्यता से भरा है. माता के दाहिने हाथ में जप की माला तो बाएं हाथ में कमंडल है.माता ब्रह्मचारिणी की आराधना करने के लिए ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नम: मंत्र का जाप करना चाहिए।

मां ब्रह्मचारिणी की आरती:
जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।
ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।
कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।
रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।
आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।
मां ब्रह्मचारिणी की व्रत कथा:
पौराणिक कथा के अनुसार माता ब्रह्मचारिणी का जन्म पर्वतराज हिमालय के घर में हुआ था। नारद जी के उपदेश को सुनकर माता ने भोलेनाथ को अपने पति के रूप में पाने के लिए माता ने कठोर तप किया। माना जाता है कि तपस्या के पहले हजार वर्षों तक माता ने सिर्फ फल और फूल खाकर जीवन बिताया था। इसके बाद सौ वर्षों तक मां केवल जमीन पर रहीं। इसके बाद धूप, वर्षा आदि की परवाह किए बिना माता ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या जारी रखी। इसके बाद कई वर्षों तक माता ने केवल बिल्वपत्र खाकर जीवन यापन किया और भगवान शिव की आराधना में लीन रहीं। तपस्या के अंतिम पड़ाव में आते-आते माता ने बिल्वपत्र का त्याग भी कर दिया। माता ने पत्तों का त्याग भी तपस्या के दौरान किया था इसलिए उन्हें अपर्णा भी कहा जाता है। इसके बाद निर्जला रहकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए माता ने तपस्या जारी रखी। माता की कठोर तपस्या को देखते हुए ही इन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से पुकारा जाता है। माता ब्रह्माचारिणी की तपस्या से प्रसन्न होकर एक ऋषि का रूप बनाकर भगवान शिव माता के पास पहुंचे और माता की परीक्षा ली। हालांकि, ऋषि के रूप में आए भगवान शिव की बात माता ब्रह्माचारिणी ने नहीं सुनी और अपनी तपस्या जारी रखी। तब ऋषि के रूप में आए शिव जी ने उनसे कहा कि शिव तुम्हें पति के रूप में अवश्य मिलेंगे। अंत में भगवान शिव ने माता को पत्नी के रूप में स्वीकार किया और माता ब्रह्मचारिणी की तपस्या सफल हुई। माता ब्रह्मचारिणी तपस्वी, आत्मसंयमी और दृढ़ संकल्प थीं। यही वजह है कि उनकी आराधना वालों को भी संयम और आत्मबल प्राप्त होता है।
