जान लीजिए कैसी है फिल्म ‘ओ रोमियो’,शाहिद कपूर का बरकरार रहेगा जलवा या फ्लॉप होगी फिल्म

 जान लीजिए कैसी है फिल्म ‘ओ रोमियो’,शाहिद कपूर का बरकरार रहेगा जलवा या फ्लॉप होगी फिल्म
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विशाल भारद्वाज और शाहिद कपूर की जोड़ी वैसी ही है जैसे गरम समोसे के साथ तीखी चटनी, कॉम्बिनेशन एकदम डेडली है. पर सवाल ये था कि ‘कमीने’ और ‘हैदर’ के बाद उम्मीदें तो बुर्ज खलीफा जितनी ऊंची हैं, पर क्या ये ‘रोमियो’ उस ऊंचाई को छू पाया है? तो आपको बता दें, ओ रोमियो में क्राइम का तड़का है, रोमांस की चाशनी है और एक्शन ऐसा कि आपकी पलकें झपकना भूल जाएं.विशाल भारद्वाज का विजन और नाडियाडवाला का पैसा मिलकर स्क्रीन पर तबाही तो मचा रहे हैं, लेकिन क्या इस ‘रोमियो‘ की कहानी में वो दम है जो आपको थिएटर की कुर्सी से बांधे रखे? क्या ये फिल्म आपके इस वीकेंड और पॉपकॉर्न के पैसे को वसूल कर पाएगी? जानने के लिए अंत तक ये रिव्यू जरूर पढ़ें.उस्तरा (शाहिद कपूर) एक खूंखार और बेरहम गैंगस्टर है. शरीर पर बने टैटू और हाथों में हथियार रखने वाला ये रोमियो इश्क के तराने नहीं गाता, बल्कि गैंगलैंड के नेटवर्क में मौत का खेल खेलता है.

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लेकिन जैसा कि कहते हैं, हर शिकारी का एक कमजोर लम्हा होता है, और यहां वो लम्हा बनकर आती हैं तृप्ति डिमरी यानी ‘अफशा’. अफशा मदद मांगने के इरादे से इस खूंखार दुनिया में कदम रखती है, लेकिन फिर शुरू होता है डर, जुनून और कंट्रोल का वो खेल जहां दिल और दिमाग के बीच की जंग छिड़ जाती है. शुरुआत तो एक मजबूरी वाले समझौते से होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह रिश्ता डर, जुनून और कंट्रोल के एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर आ खड़ा होता है, जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं दिखता. सस्पेंस, इमोशन और धोखे की इस बिसात पर आगे क्या खेल होने वाला है, ये जानने के लिए तो आपको अपने नजदीकी थिएटर का रुख करना होगा और खुद पर्दे पर इस रोमांच को महसूस करना होगा!देखिए, अगर आप थिएटर में ये सोचकर आए हैं कि पहले ही सीन से तूफान एक्सप्रेस की तरह दौड़ेगी तो आप थोड़ा निराश हो सकते हैं. फिल्म का पहला घंटा जरा इत्मीनान से चलता है. विशाल भारद्वाज यहां एक पेंटर की तरह धीरे-धीरे किरदारों में रंग भरते हैं. माहौल थोड़ा भारी है, सस्पेंस गाढ़ा है और कहानी की रफ्तार धीमी है. कुछ लोगों को लग सकता है कि गाड़ी रेंग रही है, लेकिन यकीन मानिए, विशाल यहां आपके लिए बिसात बिछा रहे हैं. कैमरा परछाइयों से ऐसा खेल खेलता है कि आपको पर्दे पर किरदारों की बेचैनी साफ महसूस होने लगती है.लेकिन असली ‘भौकाल’ शुरू होता है इंटरवल के बाद. दूसरे हाफ में फिल्म अचानक पांचवें गियर में आ जाती है. यहां देवदास बना अपना जेंटलमैन ‘रोमियो’ अपनी शराफत उतार फेंकता है. एक्शन का ऐसा तांडव मचता है कि आप पलक झपकाना भूल जाएंगे. जब स्क्रीन पर खून और इमोशंस एक साथ बहते हैं, तो समझ आता है कि विशाल भारद्वाज को ‘ट्रैजेडी का उस्ताद’ क्यों कहा जाता है. क्लाइमेक्स तक आते-आते फिल्म आपको अंदर तक झकझोर कर रख देती है.अब बात उनकी जिनके लिए आप पैसा खर्च करेंगे. शाहिद कपूर ने इस रोल में अपनी रूह फूंक दी है. वो एक ऐसे किलर बने हैं जो खूंखार तो है ही, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी बेबसी भी है. जब वो स्क्रीन पर गुस्सा करते हैं तो डर लगता है, और जब खामोश होते हैं तो गहरा दर्द दिखता है. ये उनके करियर की सबसे ‘इंटेंस’ परफॉर्मेंस में से एक है.वहीं तृप्ति डिमरी ने साबित कर दिया कि वो सिर्फ खूबसूरत चेहरा नहीं, बल्कि एक मंझी हुई कलाकार हैं. खतरनाक गैंगलैंड के बीच उनकी संजीदगी फिल्म को बैलेंस करती है. रही बात नाना पाटेकर, राहुल देशपांडे और अविनाश तिवारी की, तो इन दिग्गजों ने अपनी लाजवाब एक्टिंग से इस कहानी को और असरदार बनाया है.ओ रोमियो से विशाल भारद्वाज अपने पुराने ‘ग्रे’ वाले इलाके में वापस लौटे हैं. यहां न तो कोई पूरी तरह दूध का धुला है, न ही पूरी तरह विलेन, क्योंकि किरदारों के हाथ खून से सने होते हैं पर दिल में कविता धड़कती है. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर इतना सटीक है कि वो सीन के तनाव को आपके कानों के रास्ते सीधा दिल तक पहुंचा देता है. हालांकि ये फिल्म ‘हैदर’ जितनी सियासी नहीं है, लेकिन इसमें विशाल का वो सिग्नेचर टच यानी हिंसा के बीच छिपी हुई मासूमियत साफ-साफ झलकती है. फिल्म में एक बहुत खूबसूरत सीन है जहां अल्ला की इबादत करने वाली अफशा बप्पा से कुछ मांगती हैं और कहती हैं कि क्या ये सिर्फ आपकी दुआएं पूरी करते हैं, मेरी भी करेंगे, ऐसे कुछ विशाल भारद्वाज ही सोच सकते हैं.अगर आप पूछें कि क्या यह फिल्म देखने लायक है, तो जवाब है बिल्कुल! ‘ओ रोमियो’ में शाहिद कपूर का वो अवतार देखने को मिलता है, जो आपको ‘कमीने’ वाले दिनों की याद दिला देगा. फिल्म का सेकंड हाफ तो इतना तूफानी है कि आपको संभलने का मौका ही नहीं मिलता, एक्शन और इमोशन का ऐसा हाई-वोल्टेज डोज़ शायद ही हाल फिलहाल में किसी फिल्म में दिखा हो. साथ ही, साजिद नाडियाडवाला के प्रोडक्शन ने फिल्म को ग्रैंड बनाया है. हां, फिल्म की शुरुआत थोड़ी सुस्त है, जो ‘फास्ट-फॉरवर्ड’ के जमाने वाले दर्शकों का सब्र थोड़ा आजमा सकती है. लेकिन अगर आप विशाल भारद्वाज के उस ‘डार्क’ और ‘पोएटिक’ सिनेमा के फैन हैं जहां गोलियां भी कहानी कहती हैं, तो ये फिल्म आपके लिए एक मस्ट-वॉच है.

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