भारत बनेगा दुनिया की फैक्ट्री का हब,सिर्फ मुनाफा ही नहीं बल्कि जीडीपी को भी लगेंगे पंख
भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक नया और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है. हाल ही में हुई द्विपक्षीय व्यापार डील (Trade Deal) भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ‘गेम चेंजर’ साबित होने वाला है. एसबीआई रिसर्च की ताजा रिपोर्ट बताती है कि इस डील में अमेरिका ने भारत के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह खोल दिए हैं. अब गेंद भारत के पाले में है कि वह इस मौके को कैसे भुनाता है. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो भारतीय निर्यातकों और आम कारोबारी के लिए आने वाले दिन मुनाफे से भरे हो सकते हैं.इस डील का सबसे बड़ा असर हमारी और आपकी जेब से जुड़ी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है. एसबीआई के विश्लेषण के मुताबिक, इस समझौते से भारत का अमेरिका के साथ व्यापार सरप्लस (Trade Surplus) 45 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है. आसान भाषा में समझें तो हम अमेरिका से जितना सामान खरीदेंगे, उससे कहीं ज्यादा उन्हें बेचेंगे. यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि इससे भारत का कुल सरप्लस 90 अरब डॉलर सालाना के पार जा सकता है.सबसे खास बात यह है कि भारतीय सामानों पर लगने वाले टैक्स (Tariff) में भारी कटौती की गई है. रेसिप्रोकल टैरिफ 18% तक कम हो गया है. इसका सीधा मतलब है कि अब अमेरिका के बाजारों में भारतीय सामान वियतनाम और अन्य एशियाई देशों के मुकाबले सस्ता और प्रतिस्पर्धी होगा. इसका सीधा असर देश की जीडीपी पर दिखेगा, जिसमें करीब 1.1% की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है.अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है, जहां हर साल 3 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का सामान आयात होता है. अभी तक भारत इसमें केवल 3% की हिस्सेदारी रखता था, लेकिन अब यह बदलने वाला है.

रिपोर्ट में ‘अनमेट डिमांड’ यानी ऐसी मांग का जिक्र है जिसे अब तक पूरा नहीं किया गया था. अब भारत उस खाली जगह को भरेगा.एसबीआई का मानना है कि सिर्फ टॉप 15 प्रोडक्ट कैटेगरी ही भारत की किस्मत बदल सकती हैं. इनमें इलेक्ट्रिकल मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयां), इंजीनियरिंग के सामान, रत्न-आभूषण और टेक्सटाइल शामिल हैं. इन क्षेत्रों में अमेरिका की मांग और भारत की सप्लाई के बीच एक बड़ा अंतर है, जिसे अब पाटा जाएगा. अनुमान है कि निर्यात क्षमता 100 अरब डॉलर सालाना को पार कर जाएगी. यह न केवल बड़ी कंपनियों के लिए, बल्कि इन सेक्टर्स में काम करने वाले छोटे और मझोले उद्योगों (MSMEs) के लिए भी विस्तार का सुनहरा मौका है.अक्सर बड़ी ट्रेड डील्स का फायदा कॉर्पोरेट जगत तक सीमित माना जाता है, लेकिन यह समझौता भारत के कृषि क्षेत्र के लिए भी अच्छी खबर लाया है. इस डील के तहत भारत के करीब 75% कृषि निर्यात पर अब अमेरिका में कोई अतिरिक्त शुल्क (Zero Additional Tariff) नहीं लगेगा.इसका सीधा लाभ हमारे किसानों, मछुआरों और बागान मालिकों को मिलेगा. चावल, मसाले, चाय, कॉफी, काजू और समुद्री भोजन (Seafood) जैसे उत्पादों का निर्यात अब और आसान होगा. अमेरिका पहले से ही भारत से अपने जरूरत का 25% चावल खरीदता है, और अब कम शुल्क होने से भारतीय उत्पादों की मांग वहां और बढ़ेगी. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ेगा, जिससे जमीनी स्तर पर खुशहाली आने की उम्मीद है.चीन का गेम ओवर? भारत बनेगा दुनिया की फैक्ट्रीयह डील सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक जीत भी है. इसे ‘चीन+1’ रणनीति के तहत देखा जा रहा है. दुनिया भर की कंपनियां अब अपनी सप्लाई चेन के लिए चीन पर निर्भरता कम करना चाहती हैं, और भारत उनके लिए सबसे मजबूत विकल्प बनकर उभरा है.भारत ने भी दरियादिली दिखाते हुए अमेरिका से अगले पांच सालों में 500 अरब डॉलर के उत्पाद, जैसे विमान, ऊर्जा और तकनीक खरीदने का इरादा जताया है. इससे अमेरिका की भी भारत में रुचि बनी रहेगी. खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियां अब भारत में निवेश बढ़ा सकती हैं. यह भारत को वैश्विक विनिर्माण (Manufacturing) का हब बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.
