बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी का खेल बिगाड़ेंगे हुमायूं कबीर!पढ़िए पूरी रिपोर्ट

 बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी का खेल बिगाड़ेंगे हुमायूं कबीर!पढ़िए पूरी रिपोर्ट
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पश्चिम बंगाल पुलिस ने एक नशीले पदार्थ के मामले में कबीर के परिवार से जुड़ी 10 करोड़ रुपए की संपत्ति कुर्क की. फिर तृणमूल ने उन्हें निष्कासित कर दिया. TMC से निष्कासित होने के बाद बंगाल में एक नया राजनीतिक संगठन ‘जनता उन्नयन पार्टी (JUP)’ अस्तित्व में आया. इस नए राजनीतिक दल की एंट्री के बाद बंगाल के मुस्लिम वोटों के लिए 2026 की चुनावी जंग आधिकारिक शुरुआत हो गई।बंगाल में JUP का उदय और मुस्लिम वोटों के जंग का यह मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है? इसे समझने के लिए आंकड़ों से शुरुआत करते हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार बंगाल की जनसंख्या में मुस्लिम लगभग 27 फीसदी हैं.

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हालांकि BJP दावा करती है कि पिछले दशक में बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के कारण बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 फीसदी या उससे अधिक हो गई है.एक्सिस माई इंडिया’ (Axis My India) के 2021 के एग्जिट पोल डेटा के अनुसार, लगभग 75 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने तृणमूल का समर्थन किया. 2024 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 83 फीसदी हो गई. CSDS का डेटा बताता है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), NRC विवाद और राजनीतिक असुरक्षा की व्यापक भावना ने मुस्लिम मतदाताओं को ममता बनर्जी से दूर करने के बजाय उनके और करीब ला दिया. अब देखने वाली बात यह होगी कि इस बार के चुनाव में SIR क्या इस वर्ग को और अधिक संगठित करेगा?मुस्लिम वोटरों की एकजुटता का विपरीत प्रभाव दूसरी तरफ भी दिखता है. 2021 में जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 0-10% थी, वहां भाजपा का सफलता दर करीब 42 फीसदी रहा. 0-10 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले 77 विधानसभा सीटों में 33 सीटें भाजपा ने जीती थी. जैसे-जैसे निर्वाचन क्षेत्र में मुस्लिम आबादी का हिस्सा बढ़ता गया, भाजपा का प्रदर्शन ठीक उसी अनुपात में गिरता गया. 20-30% मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर यह गिरकर 25%, 40-50% वाली सीटों पर 8% और उस सीमा के पार 0% रह गया.बंगाल की राजनीति के केंद्र में यही विरोधाभास है. 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है. 112 मुस्लिम-प्रभावित सीटों में से 106 पहले से ही TMC के पाले में होने के कारण उसे शेष 182 हिंदू-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल 42 और सीटें जीतने की जरूरत है. 2021 में TMC ने उन 182 सीटों में से 109 जीती थीं, सफलता दर 60 फीसदी थी. इस जीत के साथ TMC को 215 सीटों का आरामदायक बहुमत दिलाया. इसके विपरीत BJP ने 72 हिंदू-बहुल सीटें (40% सफलता दर) जीतीं, लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से वह प्रभावी रूप से बाहर रही.हालांकि 54% मुस्लिम उत्तरदाता अभी भी ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री के रूप में चाहते हैं, यह एक बड़ी संख्या है. लेकिन 26% उनकी सरकार के प्रदर्शन को खराब या बहुत खराब मानते हैं. लगभग 16% अभी कोई फैसला लेने की स्थिति में नहीं दिखे. इतने बड़े वोट बैंक में मामूली गिरावट भी सीटों के परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है.विशेष रूप से हुमायूं कबीर पर पोलिंग डेटा काफी दिलचस्प है. 16 फीसदी का मानना है कि वह TMC के मुस्लिम वोटों में सेंध लगाएंगे. लेकिन 34 फीसदी को यह लगता है कि वह बीजेपी के आदमी हैं. 28 फीसदी का मानना है कि वह किसी रणनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए TMC का ही एक गुप्त ऑपरेशन हैं. इन श्रेणियों के बीच का लगभग समान विभाजन एक ऐसे समुदाय की ओर इशारा करता है जो राजनीतिक रूप से परिष्कृत है, थोड़ा संशयी है और केवल व्यक्तित्व की राजनीति से आसानी से प्रभावित होने वाला नहीं है।बंगाल चुनाव 2026 की लड़ाई की रेखाएं स्पष्ट हो रही हैं. TMC खुद को BJP के ‘विभाजनकारी एजेंडे’ के खिलाफ मुस्लिम हितों की एकमात्र विश्वसनीय ढाल के रूप में पेश करने की कोशिश करेगी. इस ढांचा ने 2021 और 2024 में शानदार काम किया था. उसकी चुनौती आंतरिक असंतोष को कम करने, अपने मुस्लिम आधार में 26 फीसदी असंतोष को दूर करने और कबीर को मुर्शिदाबाद और आसपास के जिलों में इतने वोट हासिल करने से रोकने की है, जिससे करीबी मुकाबलों के परिणाम बदल सकें।

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