जातिगत भेदभाव मामले में वापस हो सकता है UGC कानून!राजनीतिक तौर पर बढ़ा विवाद
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को नए नियमों को लागू किया है, जिसके खिलाफ सोशल मीडिया में #RollbackUGC ट्रेंड कर रहा है. इसे यूजीसी का काला कानून बताकर विरोध किया जा रहा है.विरोध करने वालों का कहना है कि इस नए नियम के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों को संभावित अपराधी करार दे दिया गया है. लेकिन यूनिवर्सिटी और कॉलेज में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए शुरू हुई ये कवायद कैसे सियासी विवाद की शक्ल ले रहा है. उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत कई राज्यों में इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, हालांकि नए नियम क्या हैं, विरोध की वजहें क्या हैं. जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए यूजीसी के नए नियम क्या हैं? सामान्य वर्ग के छात्र क्यों इसका विरोध कर रहे हैं? क्या सरकार नियमों में संशोधन करने को तैयार होगी. आइए विस्तार से जानते हैं…यूजीसी से मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय और कॉलेजों में 17 दिसंबर 2012 से ही जातीय भेदभाव रोकने के खिलाफ कुछ सलाहकारी नियम लागू हैं. इसे उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने से जुड़े नियम बताया गया है.इसमें कोई सजा का प्रावधान नहीं था.

दरअसल, जनवरी 2016 में तेलंगाना में रोहित वेमुला और मई 2019 को पायल ताडवी के आत्महत्या के मामलों के बाद पीड़ित परिजनों ने 29 अगस्त 2019 को सु्प्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की और जातीय भेदभाव की शिकायतों पर कठोर नियमों की मांग की. जस्टिस सूर्यकांत मिश्रा की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने UGC को जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर डेटा जुटाने और नए नियम बनाने का निर्देश जनवरी 2025 में दिया था.फिर फरवरी 2025 में एक ड्राफ्ट जारी किया गया.अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग छात्र संघ का कहना है कि कि ओबीसी को जातिगत भेदभाव की परिभाषा के दायरे से बाहर रखा गया है. उन्हें समानता समिति में शामिल नहीं किया जाता है. ड्राफ्ट में झूठी शिकायतों के लिए सजा का भी प्रावधान था. उनका तर्क था कि इससे शिकायतों करने वालों में ऐसे मामलों की जानकारी न देने का डर बैठ सकता है.ओबीसी छात्र संघ के मुताबिक, इसमें जातिगत भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा नहीं बताई गई है, लिहाजा नए नियमों की जरूरत है.शिक्षा, महिला और युवा मामलों की संसदीय समिति ने 8 दिसंबर 2025 को ड्राफ्ट की समीक्षा कर केंद्र सरकार को सिफारिशें प्रस्तुत की थीं. कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली समिति ने जातिगत भेदभाव की परिभाषा को स्पष्ट करने और समानता समितियों में ओबीसी सदस्यों को शामिल करने की सिफारिश की. यूजीसी ने ड्राफ्ट में संशोधन कर 13 जनवरी 2026 को नए नियमों को अधिसूचित किया. 15 जनवरी से यूजीसी की मान्यता प्राप्त सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लागू हो गए.जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान या दिव्यांगता के आधार पर कोई अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यवहार, जो शिक्षा में समानता में बाधा डालता है या मानव की गरिमा का उल्लंघन करता है, उसे जातिगत भेदभाव माना जाएगा. ड्राफ्ट में ऐसी स्पष्ट परिभाषा नहीं थी.जातिगत भेदभाव की परिभाषा में अब एससी-एसटी के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) छात्र भी शामिल किए गए हैं. पहले ओबीसी को शामिल नहीं किया गया था.ड्राफ्ट में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए जुर्माने या सस्पेंड करने का प्रावधान था. लेकिन अधिसूचित नियमों में इन प्रावधानों को हटाया गया है.हर विश्वविद्यालय या कॉलेज में एससी-एसटी या ओबीसी छात्रों को सलाह देने और भेदभाव संबंधी शिकायतों का निपटारा करने के लिए एक समान अवसर केंद्र होगा. जातीय भेदभाव रोकने के लिए उच्च शिक्षा संस्थान समाज, मीडिया, एनजीओ, छात्रों, अभिभावकों और कानूनी विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करेंगे.समानता समिति में कॉलेज प्रमुख की अध्यक्षता में एक समानता समिति होगी, जिसमें एससी-एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग सदस्य होंगे. इसका कार्यकाल 2 साल का होगा.इसमें विशेष आमंत्रित सदस्य भी होंगे.समानता समूह नाम से छोटी टीमें परिसर की निगरानी करेंगी और भेदभाव को रोकेंगी.जातीय भेदभाव की शिकायत समानता समिति से की जा सकती है. इन समितियों को 24 घंटे में कार्रवाई करनी होगी. साथ ही 15 दिनों में कॉलेज प्रमुख को रिपोर्ट देनी होगी. कॉलेज प्रमुख को 7 दिनों के भीतर आगे की कार्रवाई शुरू करनी होगी. समान अवसर केंद्र हर छह महीने में कॉलेज प्रमुख को रिपोर्ट करेंगे. ये कॉलेज यूजीसी को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे.क्या सरकार इन नियमों को वापस ले सकती है या इनमें संशोधन कर सकती है.एक ईमेल अभियान के माध्यम से यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय से इन नियमों को वापस लेने का आग्रह किया जा रहा है. यूजीसी अध्यक्ष विनीत जोशी की ओर से कोई बयान जारी नहीं किया गया है. भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने इस बारे में किसी के साथ भेदभाव नहीं होने की बात कही है. विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नियम या कानून का दुरुपयोग रोकना जरूरी है. सरकार के पास नियमों में संशोधन या उन्हें वापस लेने का पूरा अधिकार है. संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत स्वतंत्रता, समानता का अधिकार है.
