भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में आई बड़ी गिरावट,खाली होने लगा आरबीआई का खजाना!कौन है जिम्मेदार?

 भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में आई बड़ी गिरावट,खाली होने लगा आरबीआई का खजाना!कौन है जिम्मेदार?
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शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था की दुनिया में कभी-कभी ऐसे आंकड़े आते हैं जो सबको चौंका देते हैं. इस बार भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से जारी ताजा आंकड़ों ने कुछ ऐसा ही किया है. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, जिसे हम देश का रक्षा कवच भी कहते हैं, उसमें एक ही हफ्ते के भीतर 9.8 अरब डॉलर की बड़ी सेंध लग गई है.यह कोई मामूली गिरावट नहीं है. पिछले एक साल से भी ज्यादा समय में यह सबसे बड़ा झटका है. अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो इससे पहले नवंबर 2024 में ऐसी बड़ी गिरावट देखी गई थी. आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार 686.80 अरब डॉलर पर सिमट गया? चलिए, इसके पीछे की कहानी और इसके असर को आसान भाषा में समझते हैं.विदेशी मुद्रा भंडार में आई इस कमी को अगर हम टुकड़ों में बांटकर देखें, तो समझ आता है कि नुकसान कहां-कहां हुआ है. भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा ‘विदेशी मुद्रा संपत्ति’ (FCA) होता है, जिसमें 7.6 अरब डॉलर की गिरावट आई है. अब यह घटकर 552 अरब डॉलर रह गया है.लेकिन सिर्फ डॉलर ही नहीं, सोने ने भी इस बार साथ छोड़ दिया. रिपोर्ट के मुताबिक, सोने के भंडार की वैल्यू में भी 2.1 अरब डॉलर की कमी आई है. इस दौरान सोने की वैश्विक कीमतों में 4.43 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, जिसका सीधा असर भारत के कुल खजाने की वैल्यू पर पड़ा।अब सवाल उठता है कि यह पैसा गया कहां? दरअसल, जब बाजार में विदेशी निवेशक अपना पैसा निकालकर बाहर ले जाने लगते हैं, तो भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ जाता है. रुपये की वैल्यू गिरने लगती है. ऐसे में रुपये को संभालने की जिम्मेदारी आरबीआई की होती है.इस रिपोर्ट वाले हफ्ते के दौरान रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.38 फीसदी तक गिर गया था. रुपये को और ज्यादा गिरने से रोकने के लिए केंद्रीय बैंक को बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा और डॉलर बेचने पड़े. इसी वजह से हमारे भंडार में यह बड़ी कमी दिखाई दे रही है. शुक्रवार को बाजार बंद होने तक रुपया 90.16 के स्तर पर पहुंच गया था.रुपये की इस कमजोरी के पीछे कई बड़े कारण हैं. बाजार के जानकारों का कहना है कि अमेरिका के साथ होने वाली ट्रेड डील (Trade Deal) में देरी की वजह से कंपनियों के बीच डॉलर की मांग अचानक बढ़ गई है. इसके अलावा, विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं.साल 2025 में रुपया पहले ही करीब 4.74 फीसदी गिर चुका था, जो पिछले तीन साल की सबसे बड़ी गिरावट थी. साल 2026 की शुरुआत भी कुछ खास नहीं रही है और जनवरी के शुरुआती दिनों में ही इसमें 0.32 फीसदी की और गिरावट आ चुकी है. आने वाले दिनों में अमेरिकी पाबंदियों की आशंका और वैश्विक चुनौतियों की वजह से यह दबाव बना रह सकता है.इतनी बड़ी गिरावट सुनकर मन में डर लग सकता है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है. याद रहे कि सितंबर 2024 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 705 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था.

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भले ही अभी इसमें 10 अरब डॉलर की कमी आई है, लेकिन हमारे पास अब भी 686.80 अरब डॉलर का विशाल भंडार मौजूद है.यह भंडार किसी भी वैश्विक झटके से निपटने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच की तरह है. आरबीआई अपनी रणनीति के तहत इस भंडार का इस्तेमाल रुपये में होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए करता रहता है. इसलिए, गिरावट बड़ी जरूर है, लेकिन फिलहाल स्थिति नियंत्रण से बाहर नहीं है.आसान भाषा में आपको समझाएं तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में आई यह गिरावट वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और डॉलर की बढ़ती मजबूती का नतीजा है. आरबीआई पूरी मुस्तैदी से रुपये को बचाने की कोशिश कर रहा है, भले ही इसके लिए उसे अपने खजाने का एक हिस्सा खर्च करना पड़े.आने वाले कुछ हफ्ते भारतीय मुद्रा के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं, खासकर तब जब अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों और वैश्विक प्रतिबंधों को लेकर स्थिति साफ नहीं हो जाती. हालांकि, हमारे पास मौजूद मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार हमें एक सुरक्षित स्थिति में रखता है।

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